रविवार, 17 जुलाई 2016

घटिया व्यंग्यकार

मियां बगल में मैगजीन दबाए धड़धड़ाते हुए मेरे कमरे में दाखिल आए। आव देखा न ताव आते ही मुझ पर उबल पड़े। 'अमां, आजकल किस किस्म के घटिया व्यंग्य लिख रहे हो। कुछ तो अपनी उम्र और गंजी होती खोपड़ी का लिहाज किया करो।'

गुस्से में लाल-पीले हुए मियां को मैंने संभाला। करीब बैठाकर कुछ ठंडा-शंडा पिलाया। फिर पूछा- 'मियां क्या हुआ? इत्ते खफा क्यों हो मुझसे? ऐसा क्या भद्दा लिख डाला मैंने?'
मियां ने झट्ट से बगल में दबी मैगजीन को निकालकर मेरी तरफ पटका। दहाड़े- 'यह तुम्हारा ही लिखा व्यंग्य है न!' मैंने कहा- 'हां। जब मेरे नाम से छपा है तो मेरा ही है। क्यों क्या हुआ?' तकरीबन आधा ग्लास ठंडा पानी गटकने के बाद मियां बोले- 'तुम सोशल मीडिया की बढ़ाई में व्यंग्य लिख रहे हो। फ्रैंड-फॉलोइंग को आज का 'अंतिम सत्य' करार दे रहे हो। फेसबुक, टि्वटर को यूथ आइकन बतला रहे हो। क्या सठिया गए हो बैठे-ठाले?'

'तो इसमें गलत क्या है? आजकल हर जगह सोशल मीडिया, फेसबुक-टि्वटर की ही धूम है। यह न केवल यूथ बल्कि अब तो बुर्जुगों की भी पहली पसंद है।' मैंने इत्मिनान से उत्तर दिया। इत्ता सुन मियां फिर से मुझ पर सीधे हो लिए- 'क्या खाक पसंद है। पूरे माहौल का 'कबाड़ा' कर डाला है मुए सोशल मीडिया ने। न भाषा की तमीज है, न बातचीत का सलीका। छोटे-छोटे वाक्यों-शब्दों में जाने क्या-क्या बकवास पेलते रहते हैं सब के सब।'

मैंने समझाया- 'जमाना इसी का है मियां। भाषा और शब्द जित्ते छोटे, आम और सहज होंगे, पढ़ने में उत्ता ही मजा आएगा। भारी-भरकम शुद्ध साहित्यिक भाषा के जमाने अब लद लिए। आजकल की भाषा टेक्नो-ओरियनटिड है। क्या समझे।'

'अच्छा। इसीलिए तुम अपने व्यंग्य की भाषा को बिगाड़ रहे हो। किसी जमाने में तुम कित्ता उम्दा व्यंग्य लिखा करते थे मगर अब 'कूड़ा' लिख रहे हो। एकदम घटिया व्यंग्यकार हो गए हो। अमां, चार-पांच सौ शब्दों में कोई बात कही जाती है भला। फेसबुक-टि्वटर की लत ने तुम्हारी भाषा, तुम्हारे शब्द, तुम्हारे लहजे का बेडा गर्क करके रख दिया है।'

मुझे गरियाते-गरियाते मियां जब थोड़ा शांत हुए। मैंने पुनः उन्हें ठंडा पानी पिलाया। और ध्यान से मेरी बात सुनने को कहा। 'आपने मुझे घटिया व्यंग्यकार होने का खिताब दिया, आपका शुक्रिया। घटिया तो मैं बचपन से हूं। क्योंकि अच्छा लिखना मुझे आता नहीं। न ही शौक है। सो, कोशिश हमेशा यही रहती है कि घटिया ही लिखूं। ताकि लेखन की दुनिया में नाम कम से कम हो। यहां ज्यादा या ऊंचा नाम होने के अपने 'खतरे' हैं। रही बात मेरी भाषा की तो मियां कब तलक साठ-सत्तर के दशक में जीते रहोगे। वहां से बाहर निकलकर देखो कि दुनिया भाषा के स्तर पर कित्ती बदल गई है। दिन-ब-दिन बदल रही है। टि्वटर पर आप मात्र 140 कैरेक्टर में अपनी बात कह-लिख सकते हैं। शब्दों-वाक्यों को अपने हिसाब से सरल और आम बना सकते हैं। इसी दम पर तो सोशल मीडिया में आपकी फ्रैंड-फॉलोइंग घटती-बढ़ती है। लोग आपको व्यक्तिगत तौर पर भले न जानते हों पर भाषा से तो पहचानते हैं न। यही काफी है।'

मेरा लंबा लेक्चर सुनने के बाद मियां थोड़ा नरम पड़े। और उल्हाना दिया- 'यार, तुम चाहे कुछ कह लो लेकिन अपना दिल तो आज भी उन्हीं पुराने लेखकों और भाषा में ही बसता-रमता है। अपना 'एडजस्टमेंट' आजकल के जमाने के साथ बहुत मुश्किल है। मुझे तुम्हारी भाषा और शब्दों में जो 'घटियापन' नजर आया सो बयां कर दिया आगे तुम्हारी मर्जी।'

इत्ता सब कह मियां मेरे यहां से अपने घर को निकल लिए। मैं भी अपने टैबलेट में टि्वटर पर आईं पोस्टें देखने में बिजी हो गया। हां, मियां टाइप यथास्थितिवादी लोगों से यह कहने का मन जरूर हुआ कि वक्त के साथ अगर नहीं बदलोगे तो हाशिए पर खुद-ब-खुद खिसकते चले जाओगे। फिर कुढ़ने-खिझने के अतिरिक्त पास कुछ न होगा। क्या समझे।

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