शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

न लिखूंगा ओपन लैटर

सुनो डियर,

अपने प्यार का इजहार तुमसे मैं 'ओपन लैटर' लिखकर ही करना चाहता था लेकिन अब नहीं लिखूंगा। जो कहना होगा, वाट्सएप कर दूंगा। यू नो, ओपन लैटर लिखने के बड़े खतरे हैं। ओपन लैटर के पब्लिक होते ही लोग जाने कैसी-कैसी बातें बनाने और क्या-क्या कहने लगते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स ऐसी-तैसी मारते हैं सो अलग। नहीं.. नहीं.. मैं ऐसा कोई भी 'खतरा' मोल नहीं लेना चाहता।

तुम्हें मालूम है, एक बहुत बड़े पत्रकार ने दूसरे बड़े पत्रकार को ओपन लैटर लिख है। हालांकि मैंने पढ़ा नहीं पर बताने वाले बताते हैं कि लैटर में बहुत बड़ी-बड़ी 'क्रांतिकारी' बातें हैं। दुनियाभर की वैचारिक सादगी और ईमानदारी की चटनी लैटर में डाली गई है। न केवल सोशल मीडिया बल्कि समूची धरती पर ओपन लैटर 'धमाल' मचाए हुए है। आलम यह है कि फेसबुक-टि्वटर पर हर दूसरा स्टेटस-ट्वीट ओपन लैटर के संदर्भ में ही होता है। पत्रकार महोदय रातों-रात 'स्टार' बन गए हैं।

किंतु मैं स्टार नहीं होना चाहता। मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं। यों भी, मेरे-तुम्हारे प्यारे की बातें ओपन हों, यह मैं कभी नहीं चाहूंगा। खामखां तमाशा बनने से क्या फायदा। अरे, वो तो बड़े पत्रकार ठहरे झेल जाएंगे मगर मैं नहीं झेल पाऊंगा। इस ओपननेस में कहीं तुम या तुम्हारे परिवार वाले 'बिदक' गए, मेरा तो बंटा-धार हो लेगा। जैसे-तैसी इत्ती मेहनत कर तुम्हें पटाया है। नहीं.. नहीं.. डियर कोई ओपन लैटर नहीं।

वो तो अच्छा हुआ कि हमारा प्यार तकनीक के दौर में परवान चढ़ा। तकनीकी दौर में एक-दूसरे को लैटर लिखना इत्ता जरूरी नहीं। वाट्सएप से सारा काम आसानी से चल सकता है। कित्ती ही प्यार भरी बातें वाट्सएप पर कर लो, कोई खतरा नहीं। अब तो वाट्सएप ने सारे मैसेजस को इनक्रिपटड भी कर दिया है। फिर काहे को ओपन लैटर का झंझट मोल लेना।

फिर आजकल के समय में कौन किसे लैटर लिखता है। भई, जिसके कने 'फालूत टाइम' हो वो ही लिखे लैटर। कित्ती एनर्जी और स्टैमिना वेस्ट होता है लैटर लिखने में। इसीलिए तो आज तलक मैंने तुम्हें कोई लैटर-सैटर नहीं लिखा। और हां तुम भी मत लिखना। कल को अगर किसी वजह से मेरे-तुम्हारे बीच ब्रेक-अप होता है कम से कम लैटर तो परेशान न करेंगे। नहीं तो पहले के प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को लिखे लैटरों को पढ़-पढ़के ही आधी उम्र गुजार दिया करते थे।

बिना लैटर की जिंदगी ज्यादा मस्त और सुकून भरी होती है। मैं तो कहता हूं, सरकार को लैटर लिखने-पढ़ने पर ही 'बैन' लगा देना चाहिए। जहां इत्ते बैन चल रहे हैं, एक और सही। क्यों ठीक है न।

सौ बातों की एक बात। जिसे अपनी जग-हंसाई करवानी हो, वो लिखे ओपन लैटर। कौन-सा ओपन लैटर लिख देने भर से इंसान या दुनिया बदल जाएगी। लैटर अब इतिहास की किताबों में समा चुका है। अतः उसे वहीं रहने दें।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भ्रम का इलाज़ - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !