मंगलवार, 12 जुलाई 2016

ख के नाम क का खुला खत

क ने ख को खुला खत (यानी ओपन लैटर) लिखा है। क का खत सोशल मीडिया पर जैसे ही वायरल हुआ, हर दिशा में 'हंगामा' मच गया। क के खत को हाथों-हाथ लिया गया। किसी को उस खत में 'सच्चाई' के दर्शन हुए तो किसी को 'सांप्रदायिकता' की बू आई। भक्त लोग तो खत पढ़कर ही भड़क उठे। क को टि्वटर पर जमकर 'ट्रोल' किया जाने लगा। बहती गंगा में हाथ धोने अन्य सयाने भी कूद पड़े।

किंतु मैं कुछ और ही सोच रहा हूं। फेसबुक-टि्वटर के जमाने में क का खुला खत लिखना वाकई जिगर का काम है। वरना, आजकल कौन किसको खत लिखा करता है। आलम यह है, अब तो न प्रेमी, न प्रेमिका ही एक-दूसरे को खत नहीं लिखते। मैसेंजर या वाट्सएप पर मैसेज भेज काम चला लेते हैं।

खत लिखने के तमाम झंझट हैं। समय और दिमाग दोनों ही बहुत खर्च होते हैं। खत में अगर कोई बात ऊपर-नीचे हो जाए तो हजार मुसीबतें। जैसे- आजकल क अपने खत के ऐवज में झेल रहा है। लग रहा है, मानो क ने खत लिखकर कोई बहुत बड़ा 'गुनाह' कर दिया हो। मन की बात कहना-लिखना तो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। है न...।

हालांकि क का खुला खत मैंने अभी पढ़ा नहीं है। पढ़ने का कोई विचार भी नहीं। यों भी, खत पढ़ने और लिखने से मैं बचता ही हूं। टि्वटर पर रहकर आदत ऐसी पड़ गई है कि कम से कम शब्दों में ही बात को लिखना-पढ़ना पसंद है। बताते हैं, क का खुला खत काफी क्रांतिकारी टाइप है। मसले और मसाले दोनों का ही तड़का है खत में। काफी बड़ी-ऊंची बातें भी हैं। पत्रकारिता और पत्रकार की भूमिका को लेकर भी कुछ-कुछ है।

होगा क्यों न होगा। आखिर क का लिखा पत्र है। क कोई आम पत्रकार नहीं। बेहद प्रगतिशील और सच्चाई पसंद है! सरकार से क का साढ़े छत्तीस का आंकड़ा हमेशा बना रहता है। सारा जग जानता है।

इत्ती ऊंची और बड़ी बातें मेरे पल्ले वैसे भी नहीं पड़तीं। जहां तक बन पड़ता है, ऊंचे लोगों और बड़ी बातों से उचित दूरी बनाकर ही रहता हूं। खामखां कहीं बुद्धिजीवि या प्रगतिशील न हो जाऊं, इस खतरे से बचता हूं। आज जैसा समय चल रहा है, इसमें जित्ता 'न्यूट्रल' रहो, सेहत के वास्ते अच्छा है। दूसरे के फटे में अपनी टांग घुसेड़ने का जमाना अब न रहा प्यारे।

यह कोई पहली दफा नहीं जो क ने खुला खत लिखा हो। इससे पहले भी कई दफा कई लोगों को क ने खत लिखे हैं। उन खतों का किसकी सेहत पर क्या फर्क पड़ा यह तो क ही बेहतर बता सकता है। मगर सोशल मीडिया पर खत और क खूब ट्रोल हुए। चलो इस बहाने ही सही पब्लिक डोमेन में नाम तो बढ़ा।

मेरी तो क से इत्ती ही गुजारिश है कि वे एक खुला खत जाकिर चचा के नाम भी लिखें। वही सब उन्हें भी समझाएं, जो ख को समझाया था। फिर देखते हैं, क के खत का जाकिर चचा के दिलो-दिमाग पर कित्ता असर होता है या नहीं। साथ-साथ यह भी पता चल जाएगा कि प्रगतिशील मूल्यों में कित्ती ताकत होती है आदमी की सोच को बदल पाने में।

वरना तो लिखते रहिए ऐसे खुले खत कौन तव्वजो देता है यहां।

2 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

ह ह ह...
इतना खुल्ला व्यंग्य अब तक पढ़ने में नहीं आया था. शुक्रिया. आपका व्यंग्य भी वायरल होगा, और तमाम खुला खत लिखने वाले मारे शर्म के अपने अपने खतों को वापस ले लेंगे - पुरस्कार लौटाऊ तर्ज पर :)

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

शुक्रिया सर।
बहुत-बहुत शुक्रिया। आप मुझे पढ़ते रहते हैं।