रविवार, 31 जुलाई 2016

दाल और नाक

मैं हर रोज सुबह उठके अपनी नाक जरूर चैक कर लिया करता हूं। नाक अपने स्थान पर है भी या रातभर में गायब हो ली। नाक है तो इज्जत है वरना बिन नाक की जिंदगी कुत्ते से भी बदत्तर।

इधर जब से दाल के दामों ने आसमान छुआ है तब से मेरी फिकर अपनी नाक के प्रति और बढ़ गई है। चाहे दूध-ब्रैड-बटर में कमी कर दूं किंतु दाल में कतई कमी नहीं करना चाहता। मेरा प्रयास रहता है, दाल चाहे कित्ती ही महंगी क्यों न हो घर में किलो-दो किलो दाल अवश्य रहनी चाहिए। दाल रहेगी तो समाज व परिवार के बीच मेरी नाक भी बची रहेगी।

इन दिनों हमारे मोहल्ले में तो ऐसा सीन बना हुआ है कि लोग बाग अपनी गाड़ियां, फ्रिज, एसी, सोना-चांदी बेचकर दाल खरीद रहे हैं। दाल को वे मुश्किल दिनों का सहारा मान बैठे हैं। घर-परिवार, मोहल्ले में दाल को इत्ती इज्जत दी जाने लगी है, इत्ता तो कोई अपने दामाद को न दे रहा। चाहे सुबह हो या दोपहर, शाम हो या रात गली के नुक्कड़ पर पांच-दस बुर्जुग दाल पर चर्चे करते हुए मिल ही जाते हैं। बेचारों ने दाल को 'भगवान' बना लिया है।

मैंने पत्नी से साफ कह दिया है, घर में दाल की रत्तीभर कमी न होने पाए। घर में जब भी कोई मेहमान आए, उसे यह जरूर बताए कि हमारे यहां अभी दाल का इत्ता स्टॉक बकाया है। इससे अगले पर 'इम्प्रेशन' पड़ता है। कटोरी दो कटोरी अगर कोई पड़ोसी दाल मांगने आ जाए तो मना न करे तुरंत दे दे। जरूरतमंद को दाल को देना सबाब का काम है।

एक मैं ही नहीं किसी को भी अपनी नाक को खतरे में नहीं आने देना चाहिए। नाक की सलामती के साथ ही परिवार व समाज के बीच गर्दन ऊंची रहती है। नाक और दाल के बीच रिश्ता कुछ ऐसा है जैसा नेता और जुमले का रहता है। नेता जुमले गढ़ने के लिए किसी हद तक जा सकता है। उसी प्रकार अपनी नाक को बनाए-बचाए रखने के तईं मैं दाल की कीमत से जरा भी समझौता नहीं कर सकता।

लोग गलत कहते हैं कि दाल को महंगा सरकार और जमाखोर करते हैं। सरकार की जान को कोई एक काम थोड़े न है, जो वो रात-दिन दालों के उतार-चढाव पर ही नजरें गढ़ाए रहेगी। बेचारा जमाखोर मुफ्त में बदनाम हो लेता है। जबकि उससे बड़ा 'दानी' समाज में कोई नहीं! इत्ती टाइप की चीजें निरंतर महंगी होती रहती हैं, एक दाल जरा-सी क्या महंगी हो ली कि लोग बिलबिला उठे। अगर अंटी में नोट नहीं तो कुछ दिन दाल न खाओ। किसी पंडित या डॉक्टर ने थोड़े न बताया है कि दाल खानी ही खानी है।

मैं तो साफ-सीधी सी बात जानता हूं, जिन्हें अपनी नाक की रेप्यूटेशन बनाकर रखनी है वे दाल के दाम पर कोई समझौता न करें। जिन्हें दाल से ज्यादा नोट प्रिय हैं, उनकी वे जानें।

दाल के बहाने ही अगर समाज-परिवार के बीच इज्जत बढ़ रही है तो इसे मेनेटेन करके रखने में क्या बुराई है प्यारे।

गाड़ी-मोटर तो फिर भी पाया जा सकता है किंतु अगर एक दफा नाक कट गई फिर बड़ी मुश्किल हो जाती है। दाल और नाक के बीच रिश्ता कायम करके चलने में ही भलाई है। वरना तो जो है सो है ही।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

प्रेमचंद और फेसबुक

गनीमत रही कि प्रेमचंद के जमाने में फेसबुक नहीं था। अगर होता तो प्रेमचंद कथा-कहानी छोड़के दिन-रात फेसबुक पर ही डटे मिलते। वे भी लाइक-कमेंट और इन-बॉक्स की कहानियों में उलझे रहते। टैगिंग और पोकिंग से दुखी होकर न जाने कित्ती ही दफा फेसबुक छोड़ने की धमकी भी दे डालते। और हर रोज 'चेलैंज एक्सेपटेड' टाइप चेलैंजों को झेल-झेलकर उक्ता गए होते।

वाकई बहुत ही अच्छा रहा कि प्रेमचंद के जमाने में फेसबुक नहीं था।

लेकिन आज हमारे बीच फेसबुक है प्रेमचंद नहीं। फेसबुक के जमाने में प्रेमचंद का न होना कोई बड़ी या गंभीर बात नहीं। हम अपने-अपने तरीके से आज प्रेमचंद को फेसबुक पर याद कर तो रहे हैं। आज हर दूसरी वॉल पर प्रेमचंद की याद या कहानी का तंबू गढ़ा है। कोई प्रेमचंद को महान कहानीकार बता रहा है तो कोई प्रेमचंद की लाठी थामकर सेक्युलरवाद पर भाषण झाड़ रहा है। कोई हैशटैग लगाकर प्रेमचंद पर स्टेटस चिपकाए पड़ा है। सबके अपने-अपने प्रेमचंद हैं आज।

और तो और आज प्रेमचंद को वो लोग भी याद कर रहे हैं, जिनके दादा या बाबा का नाम कभी प्रेमचंद रहा था।

फेसबुक से इतर प्रेमचंद की याद में आज कुछ आयोजन धरती पर मौजूद सभागारों में भी अवश्य होंगे। कोई सम्मानीत होगा। किसी को सम्मानीत किया जाएगा। तो कोई सीट पर बैठा-बैठा यह सोच ही कुढाएमान होगा कि हाय! फलां प्रेमचंद सम्मान-पुरस्कार मुझे न मिला। कुछ देर प्रेमचंद के कथा-साहित्य पर जोर-शोर से बातें-चर्चाएं होंगी। फिर 'रंगीन पानी' का दौर चलेगा। तब न किसी को प्रेमचंद याद रहेंगे न उनका गरीब-बोझिल किसान।

चलिए खैर। ये सब तो आज सभागारों में चलता ही रहेगा। पुनः फेसबुक पर लौटते हैं।

मुझे लगता है, प्रेमचंद को फेसबुक पर याद करना ज्यादा मस्त कॉस्पेट है। दिनभर में चाहे जित्ते स्टेटस पेलो प्रेमचंद की बातों या कथा-साहित्य को लेकर। प्रेमचंद डे होने के नाते आज ऐसी पोस्टों-स्टेटस पर लाइक-कमेंट भी खूब बरसेंगे। फेसबुकिए का भी दिल बहला रहेगा।

गजब यह है, प्रेमचंद पर बने समस्त पेज बीती आधी रात के बाद से इत्ते एक्टिव इत्ते एक्टिव हो लिए हैं कि खुद प्रेमचंद कन्फ्यूजिया गए हैं। बारंबार जुबरबर्ग को फोन लगाकर अपने पेज पर आए लाइक-कमेंटों का हिसाब-किताब ले रहे हैं। क्यों न ले हिसाब-किताब। आखिर प्रेमचंद को भी तो अपनी इंर्पोरटेंस की चिंता है। क्या हुआ, जो वे सशरीर हमारे बीच नहीं, उन पर बने पेज तो हैं न। पेज का होना ही प्रेमचंद के सेलिब्रिटी लेखक होने की निशानी है।

मेरे विचार में प्रेमचंद डे पर फेसबुक को एक पुरस्कार की घोषण करनी चाहिए। यह पुरस्कार उस फेसबुकिए को मिले जिसने प्रेमचंद पर सबसे अधिक लाइक बटोरने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। इससे दो फायदे होंगे- एक प्रेमचंद के कथा-साहित्य मार्केट शेयर उठेगा और दूसरा फेसबुकिया भी पुरस्कार पाके निहाल हो लेगा।

फेसबुक पर प्रेमचंद को सबसे धांसू श्रद्धांजलि यही होगी। क्या नहीं!

राजनीति, सोशल मीडिया और गालियां

पहले के जमाने और थे। तब न ऐसी राजनीति होती थी, न ही ऐसे नेता थे। समय बदला तो राजनीति के साथ-साथ नेताओं का व्यवहार और जुबान भी बदल गई। अब राजनीति दो ही चीजों से चला करती है; एक- वायदे और दूसरा- गालियां। ये दोनों ही अगर राजनीति में न हो तो कतई मजा न आए। या कहूं दोनों ही एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।

हालांकि सभ्य समाज में गालियां स्वीकार्य नहीं फिर भी भला कौन मानता है दिए बिना। कम या ज्यादा सब देते हैं। आजकल तो गालियां राजनीति का जबरदस्त अखाड़ा बनी हुई हैं। हर कोई पिला पड़ा है बहती गंगा में हाथ धोने यानी एक-दूसरे को गरियाने में। कमाल यह है, गरियाने पर लेक्चर वे लोग भी दे रहे हैं, जिनकी सुबह गाली के साथ शुरू और रात भी गाली पर ही खत्म होती है।

सोशल मीडिया पर तो हर किसी के बीच होड़-सी लगी है खुद को गालियों के खिलाफ सबसे बड़ा 'नैतिकतावादी' घोषित करने की। ये वही सयाने हैं, जो जरा-सी राजनीतिक असहमति पर इत्ता उखड़ जाते हैं कि सेकेंड भर की देरी न लगाते गालियों के साथ आपकी ऐसी-तैसी करने में। आज वे सब के सब मिलकर सोशल मीडिया पर हमें नैतिकता और सभ्यता का पाठ पढ़ा रहे हैं। वाह! क्या कहने हैं जनाब।

बुरा न मानिएगा, यह हकीकत है कि हम बिना गाली दिए या सुने समाज में रह ही नहीं सकते। मैंने तो तमाम ऐसे लोग देखे-सुने हैं, जो बेजान चीजों को भी बिंदास गालियां बकते हैं। लोग बाइक तक को गाली दे मारते हैं अगर वो एक किक में स्टार्ट न हो। किसको क्या कहिएगा जनाब, अब तो दुनियादारी के साथ-साथ राजनीति भी गालियों पर आन टिकी है।

चुनावी मौसम में गालियां तो क्या जूते-चप्पलें भी अगर चल जाएं कोई बड़ी बात नहीं। नेताओं के साथ जनता को भी आदत पड़ चुकी है सबकुछ को एंजॉव्य करने की।

राजनीति और नेताओं के खेल निराले हैं दोस्त। यहां कौन किसका सगा है, कौन किसका दुश्मन कहना बहुत मुश्किल है। आज जिन्हें जो गालियों से नवाज रहे हैं, हो सकता है, कल को गलबहियां करने लग जाएं। उसी नेता में उन्हें सच्चाई-ईमानदारी नजर आ जाए।

प्यारे, मैं तो कहता हूं नेताओं और सोशल मीडिया की बातों पर ध्यान देकर एंवई दिमाग पर लोड न बढ़ाओ। ये सब बरसाती मेंढक टाइप हैं, जब तलक मौसम इनके फेवर में रहेगा ये यों ही टर्रे-टर्रोते रहेंगे।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

कबाली का कमाल

यों ही कोई रजनीकांत नहीं हो जाता। रजनीकांत होने के लिए रजनीकांत ही होना जरूरी है। फेक्ट है, जो करिश्में रजनीकांत कर सकता है, दुनिया में कोई नहीं कर सकता। एक्शन और रजनीकांत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इन लाइनों जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि को अब थोड़ा यों कर लें जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे रजनी। यही तो रजनीकांत का जलवा है। रजनी अन्ना जहां खड़े हो जाते हैं, वो रास्ता भी खुद को 'भाग्यशाली' समझने लगता है।

आजकल तो रजनीकांत की कबाली का कमाल लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। मोहल्ले की जिस गली में कदम रखता हूं, कबाली और रजनीकांत के चर्चे ही सुनने को मिलते हैं। कबाली लोग बतौर फिल्म नहीं बल्कि रजनीकांत के 'एवरग्रीन एक्शन' को देखने जा रहे हैं। उनके चलने, बोलने, हाथ घुमने, चशमा पहने के स्टाइल पर लोग फिदा हैं, फिदा। 65 साल की उम्र में जब लोग किस्म-किस्म की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं रजनी सर 'एक्शन' कर रहे हैं। है न कमाल।

खबरें बता रही हैं, कबाली अब तलक 250 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है। क्यों नहीं करेगी। जहां और जिस फिल्म में रजनीकांत का 'स्टारडम' सिर चढ़कर बोलेगा, वहां तो करोड़ों के वारे न्यारे होने ही हैं। लोगों की रजनीकांत के प्रति 'दीवानगी' भी क्या खूब है। फिल्म रिलीज वाले दिन ऑफिसों की छुट्टी रही। चहाने वालों ने अपने रजनी अन्ना की तस्वीरों को दूध से नहलाया। वाह! इसे कहते हैं 'माइंडबिलोइंग पॉपुलेरटी'। इत्ती तो अपने यहां भी किसी हीरो-हीरोइन की न होगी।

इसे कहते हैं, रजनीकांत स्टाइल मार्केटिंग। बिना मार्केट के बीच जाए। बिना तेल-क्रीम-पाउडर, बिना बीमा पॉलिसी बेचे, बिना कोल्ड ड्रिंग को तूफानी बनाए, बिना पंखे-एसी की हवा खाए मार्केट खुद-ब-खुद रजनीकांत के पास हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है, लो सरजी मेरा यूज करो।

यहां तो हीरो को मार्केट में जगह पाने-बनाने के लिए तेल से लेकर च्यवनप्राश तक बेचना पड़ता है। परंतु रजनीकांत के मामले में ऐसा न है। मार्केट खुद चलकर रजनी सर के कदमों में बिछ जाता है। साफ शब्दों में- रजनीकांत मार्केट की वजह से नहीं। उल्टा मार्केट रजनीकांत की वजह से है।

कुछ भी कहो प्यारे, फेम हो तो रजनीकांत जैसा वरना हो ही न। ताकि जिंदगी जी कर लगे कि कुछ खास जी रहे हैं। क्यों है न..।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

पोकेमॉन गो और अरहर की दाल

'भाई साहब, क्या आप अपने मोबाइल से मुझे पोकेमॉन गो शेयर कर सकते हैं?' मैं सुनकर थोड़ा चौंका। चौंका इसलिए क्योंकि यह सवाल किराने की दुकान चलाने वाले मेरे पड़ोसी ने किया था। मैंने उससे कहा- 'यार, तुम कब से पोकेमॉन गो के दीवाने हो गए? अभी तो यह गेम भारत में आया भी नहीं, फिर भला मेरे कने कैसे हो सकता है!'

'हां, वो मुझे मालूम है, यह गेम अभी इंडिया में लॉच नहीं हुआ फिर भी जुगाड़-सुगाड़ से कहीं मिल जाए तो। अगर एपीके फाइल ही मिल जाती तो भी काम बन सकता था।' दुकानदार ने अपना टेक्नो-संपन्न दिमाग दौड़ाया।

मन ही मन मैं सोचने लगा, वाह री टेक्नॉलिजी तेरा जवाब नहीं। एक किराने की दुकान चलाने वाला भी एपीके फाइल के बारे में जानता है। वाकई देश बदल रहा है। तभी दुकानदार ने मेरे कंधे पर हाथ जमाते हुए पूछा- 'भाई साहब, क्या हुआ? कहां खो गए? अगर गेम नहीं है, कोई बात नहीं। जब मिल जाए, तब दे दीजिएगा।'

मैं हां हां में सिर हिलाकर वहां से चलाने को हुआ कि पुनः दुकानदार ने मुझसे रिक्यूएस्ट की- 'सर, ध्यान रहेगा न।' मैंने कहा- 'हां, यार बिल्कुल ध्यान रहेगा। लेकिन इत्ता सुन लो, इस गेम को खेलने के बड़े 'खतरे' हैं। खबरें बता रही हैं कि गेम खेलते-खेलते दो-चार लोग खरच भी हो लिए हैं। गेम के प्रति लोगों में इत्ता पागलपन है कि नौकरी छोड़ने की खबरें भी सामने आने लगी हैं। जिद है, पोकेमॉन को पकड़ने की। कई देशों की सरकारें इस पर 'बैन' लगाने की मांग भी कर रही हैं।'

दुकानदार ने मुझे टोका- 'अरे साहब, कहने वालों का क्या है एंवई कुछ भी कहते रहते हैं। सच तो यह है कि लोग पोकेमॉन गो की कामयाबी से चिढ़ने लगे हैं। इसीलिए ऐसी भद्दी-भद्दी बातें कह-बोल रहे हैं।' बीच में मैं कुछ बोलने को हुआ तो दुकानदार ने मुझे पुनः टोक दिया- 'साहब, मैं तो पोकेमॉन गो की खातिर अरहर की दाल तक मुफ्त देने को तैयार हूं! बस एक दफा मुझे यह गेम खेलने को मिल जाए। अरहर की दाल की भी कोई बिसात नहीं पोकेमॉन के सामने।'

इत्ता सुनते ही मैं 'सकते' में आ गया। 'अमां यार, क्या बोल रहे हो? 200 रुपए किलो की अरहर की दाल तुम एक गेम की खातिर मुफ्त बांटने को तैयार हो? सठिया तो नहीं गए हो सबेरे-सबेरे। ऐसे तो तुम अपनी पूरी दुकान 'चौपट' कर लोगो। कुछ तो अपनी रोजी-रोटी का ख्याल करो।'

शायद मेरा कहा दुकानदार की भीतर तक सुलगा गया। बेहद नाराज होकर बोला- 'दुकान मेरी, अरहर की दाल मेरी, पेट मेरा, रोजी-रोटी मेरी आपको इससे क्या? पोकेमॉन गो मेरी 'जान' बन चुका है। उसके लिए अरहर की दाल तो क्या खुद तक को 'गिरवी' रखने को तैयार हूं। क्या समझे? बड़े आए मुझे ज्ञान देने वाले।'

बिगड़े मूड को देखकर मैंने उसे थोड़ा दुलराते-पुचकारते हुए समझाया- 'अरे नहीं.. नहीं.. वो मतलब नहीं था मेरा। तुम तो खामखां मुझ पर सीधे हुए जा रहे हो। मैंने तो तुम्हारे सामने वही बातें रखीं, जो मैंने यहां-वहां पढ़ी-सुनी थीं। तुम्हारी निगाह में पोकेमॉन की औकात अरहर की दाल से बड़ी है तो रखो बड़ी। इसमें भला मुझे क्या और क्यों 'आपत्ति' हो सकती है?'

इत्ता सुन दुकानदार का पारा थोड़ा नीचे को लुढ़का और बोला- 'सॉरी भाई साहब, गुस्से में कुछ अधिक बोल गया। वो क्या है न पोकेमॉन गो की 'बुराई' मुझसे 'बर्दाशत' नहीं होती। मैंने आपको भी यह ऑफर देने को तैयार हूं अगर आप मुझे पोकेमॉन गो लाकर देते हो तो जित्ती चाहो उत्ती अरहर की दाल मुझसे मुफ्त ले जा सकते हो। दे दूंगा।'

मैं मन ही मन सोचने लगा, वाह क्या कमाल का दुकानदार है। इत्ती महंगी अरहर की दाल को 'हल्के' में ले रहा है, वो भी एक गेम की खातिर। यहां तो कोशिश रहती है कि एक दफा बनी अरहर की दाल अगले दिन भी खींच जाए। हम जैसों के लिए तो आजकल अरहर की दाल 'सोने' समान है।

वाकई इंसान की 'दीवानगी' का कोई ठौर नहीं। कब, कहां, किस पर 'मेहरबान' हो जाए। एक तरफ लोगों में पोकेमॉन गो को लेकर क्रेज है तो दूसरी तरफ रजनीकांत की तस्वीरों को दूध से नहलाया जा रहा है।

फिलहाल, मैं पोकेमॉन गो के बदले मुफ्त अरहर की दाल पाने के इंतजार में हूं। देखना है, कब तक नसीब होती है।

रविवार, 24 जुलाई 2016

बिन चड्डी चिंतन

मेरी चिंतन से परहेज वाली बात सुनकर हमारे मोहल्ले के एक वरिष्ठ सज्जन ने मुझे 'बिन चड्डी चिंतन' करने की सलाह दी।

'बिन चड्डी चिंतन, भला यह कैसे संभव है?' मैंने पूछा। उन्होंने फरमाया- 'दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं प्यारे। सब संभव है। चिंतन बिन चड्डी के भी हो सकता है। जैसे- जीवन की नीरसता को दूर करने के लिए अक्सर हम कुछ न कुछ डिफरेंट करते रहते हैं। ठीक उसी तरह चिंतन को भी कभी-कभार बिन चड्डी के भी कर लिया जाना चाहिए। चिंतन और दिमाग दोनों का हाजमा दुरुस्त रहेगा।'

'चलिए, मानी आपकी बात। पर बिन चड्डी चिंतन हो कैसे सकता है, जरा विस्तार से समझाएं।' मैंने वरिष्ठ महोदय से आग्रह किया।

'ठीक है। जब तुम विस्तार से जानना ही चाहते हो, तो बता रहा हूं।' सुनो- 'तुम्हें ध्यान हो, सालों पहले गुलजार साहब ने चड्डी पहनके फूल खिलाया था। बस उसी दिन से मेरी खोपड़ी में यह बात घर कर गई थी, जब चड्डी पहनके फूल खिल सकता है तो बिन चड्डी चिंतन क्यों नहीं हो सकता? तब एकाध अपने करीबी मित्र लेखकों से मैंने इस बात का जिक्र भी किया किंतु उन्होंने मेरी बात को या तो हंसी में उड़ा दिया या फिर मुझे पागल करार दिया। मैं ठहरा सयाना। चिंतन तो मुझे करना ही था। वो भी बिन चड्डी। किया। बिन चड्डी चिंतन का प्रयोग खुद पर ही कर डाला। हालांकि शुरू में एकाध दफा बिन चड्डी चिंतन में दिक्कतें पेश आईं। मगर बाद में आदत पड़ गई।'

'देखो प्यारे, चड्डी में और बिन चड्डी चिंतन में बुनियादी फर्क 'खुलेपन' का है। जित्ता कंर्फ्टेबिल तुम बिन चड्डी फील कर सकते हो, चड्डी पहनकर नहीं कर सकते। यह फैक्ट है, आदमी जित्ता बिंदास और स्वतंत्र बिन चड्डी सोच लेता है, चड्डी पहनकर नहीं सोच पाता। हर वक्त कसा और भारीपन-सा महसूस होता रहता है। मेरे चिंतन को नए आयाम बिन चड्डी पहनकर ही मिले हैं। तुम यकीन नहीं करोगे- बिन चड्डी चिंतन कर मैंने अभी हाल एक बड़ा उपन्यास लिखा है। कसम से बड़ा आनंद आया इसे लिखने में।'

'बिन चड्डी चिंतन कोई शर्म-हया टाइप मसला नहीं है। आज का समय बहुत बदल गया है। दबा-छिपा अब कुछ नहीं रहा। जिसके दिल में जो है, वो खुलकर सोशल प्लेटफार्म पर एक्सप्रेस कर रहा है। लेखन में नवीनता और दम होना चाहिए बस। फिर देखो मार्केट में कैसे बिकता है। आदमी को मतलब पढ़ने से रह गया है। तुम उसे चड्डी पहनकर लिख रहे हो या बिन चड्डी उसकी बला से।'

'मैंने तो इत्ते बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों के बारे में सुना-पढ़ा है। हर किसी का अपने लेखन-चिंतन का कोई न कोई 'टर्निग प्वाइंट' रहा था। कोई सूट-बूट पहनकर लिखता था। तो कोई नहा-धोकर। तो कोई रजाई-कंबल में बैठकर। तो कोई सफर के दौरान। फिर मैंने अपने चिंतन-लेखन को बिन चड्डी के दायरे में ढालकर क्या गलत किया? यह भी एक 'डिफरेंट तरीका' है चिंतन का। क्यों प्यारे।'

अब तक वरिष्ठ महोदय अपने बिन चड्डी चिंतन के फलसफे को सविस्तार मुझे समझा-बतला चुके थे। उनकी बताईं बातें मेरी खोपड़ी में धीरे-धीरे घर भी करने लगीं थीं। फिर भी, मुझे थोड़ा-सा वक्त चाहिए था बिन चड्डी वाले चिंतन की पोजिशन में ढलने के लिए। पर मुझे विश्वास था मैं ऐसा कर पाऊंगा।

फिलहाल, वरिष्ठ महोदय को धन्यवाद कह उनसे विदा लेकर मैं घर आ गया। जिस चिंतन से मुझे भीषण एलर्जी थी, अब हौले-हौले मूड बना रहा हूं, उसे बिन चड्डी करने का। बस आप लोगों की 'नेक दुआएं' चाहिए।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

सोना गुनाह तो नहीं

बड़ा 'हंगामा' मचा है कि वो संसद के अंदर- वो भी एक गंभीर चर्चा के दौरान- सो रहे थे। तो क्या हुआ, जो सो रहे थे? क्या सोना- भले ही संसद क्यों न हो- गुनाह है? नींद और झपकी पर किसी का जोर नहीं चलता प्यारे। ये कभी भी, कहीं भी आ सकती है। ये तो संसद रही, मैंने तो लोगों को दफ्तरों और मीटिगों में मस्त सोते देखा है।

फिर, इस बात की क्या गारंटी है कि वो सो ही रहे थे? हो सकता है, किसी गंभीर मुद्दे पर आंख बंद किए महत्त्वपूर्ण चिंतन-मनन में व्यस्त हों! हो सकता है, नए आने वाले पोकेमॉन गो को खेलने के बारे में योजना बना रहे हों! हो सकता है, उत्तर प्रदेश के चुनाव में पार्टी की डूबती नैया को कैसे पार लगाया जाए, इस पर गंभीर विचार में मगन हों!

न सोचा, न समझा बस सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर 'हल्ला' मचा दिया कि वो संसद के भीतर सो रहे थे। सोशल मीडिया वालों को तो ट्रौलिंग के लिए मुद्दा चाहिए होता है। अब बंदा वास्तव में सो ही रहा है या किसी गहन चिंतन में बिजी है, उन्हें क्या मतलब। यहां तो जित्ते मुंह, उत्ती बातें होती हैं।

किसी सोते हुए नेता को मैंने कभी 'हिकारत' भरी नजरों से नहीं देखा। हमेशा 'सम्मान' ही दिया। दिमाग में यही रखा कि नेता सो नहीं रहा बल्कि देश, समाज, जनता की 'फिक्र' में डूबा हुआ है। देश को आगे कैसे ले जाना है, इस पर 'मंथन' कर रहा है। अरे, जिस नेता को जनता ने चुनकर भेजा है, भला वो सो सकता है, नहीं कभी नहीं! ध्यान रहे, नेता सोने के लिए राजनीति में नहीं बल्कि जन-सेवा की खातिर आता है। हां, ये बात अलग है कि बैठे-ठाले कभी उसे झपकी आ जाए। नेता भी आखिर इंसान ही है हमारे-आपके तरह।

आपको क्या मालूम कि नेता को देश और जनता की कित्ती चिंता रहती है। इस चिंता की खातिर न दिन, न रात में वो चैन से सो नहीं पाता! इत्ता बड़ा देश नेताओं के सोने से ही नहीं चल रहा। देश का प्रत्येक नेता 'जाग' रहा है। अपने-अपने काम में जी-जान से जुटा है। इधर चुनाव भी तो सिर पर है, ऐसे में सोने का तो क्या झपकी लेने का भी सवाल पैदा नहीं होता। और लोग कह रहे हैं कि वो संसद में सो रहे थे।

आज जो लोग उनके सोने पर तरह-तरह के सवाल उठा रहा है। जोक आदि बना रहे हैं। उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप अपने दफ्तरों या मीटिंग में कभी नहीं सोए? कभी झपकी नहीं ली? अजी, आप तो फिर भी नौ-दस घंटे की नौकरी करके घर आकर सो लेते हो, बेचारे नेताओं से पूछो हर वक्त जागते हुए काम में बिजी ही मिलते हैं। केवल देश और जनता की खातिर।

मत भूलें हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं। यहां खाने से लेकर सोने तक पर आदमी की अपनी 'स्वतंत्रता' चलती है। कभी-कभार अगर कोई नेता अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल (भले ही सोने में) कर लेता है तो मियां आपके पेट में मरोड़ें क्यों उठने लगती हैं? आप भी सोइए न, किसने रोका है। नेता के झपकी लेने पर ही इत्ता हो-हंगामा किसलिए?

और हां उनका सोना अगर आपको इत्ता ही 'अखर' रहा है न तो एक दफा खुद नेता बनकर देखिए, मियां दो दिन में आटे-दाल का भाव पता चल जाएगा। फिर कभी यह कहने का मुंह न पड़ेगा कि वो संसद में सो रहे थे। क्या समझे...!

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

गूगल गुरु सदा सहाय

जीवन में हमेशा यही कोशिश रही कि मैं न किसी को गुरु मानूं, न किसी का गुरु बनूं। गुरु मानने और बनने के हजार लफड़े हैं। गुरुओं के चक्कर में पड़कर लाइफ बड़ी 'बोरिंग' और 'खाली' हो जाती है। गुरु का डंडा हर वक्त सिर पर सवार रहता है कि अब पड़ा, तब पड़ा। इससे अच्छा है, गुरु नामक प्राणी से दूर ही रहो।

न न ऐसा कतई न समझें कि मैं गुरुओं से नफरत करता हूं या उन्हें सम्मान नहीं देता। जीवन में अगर 'सच्चा गुरु' मिल जाए फिर तो सोने पर सुहागा। जैसे- सचिन तेंदूलकर के गुरु हैं। इत्ते ऊंचे शिखर पर पहुंचने के बाद भी सचिन उनका आज भी उत्ता ही सम्मान करते हैं।

लेकिन वो गुरु मुझे कतई पसंद नहीं, जो चेले को हमेशा अपनी 'अंधभक्ति' में ही रखते हैं। गुरु दिन को बोले रात या रात को बोले दिन तो चेला भी ऐसा ही बोले। ऐसे गुरु किसी काम न आते।

चेलों ने जब से तकनीक का दामन थामा है, बेचारे गुरुओं की तो दुकानें ही बंद हो ली हैं। कुछ भी पूछने-समझने के लिए चेला अब गुरु के पास न जाकर सीधा गूगल गुरु की शरण में जाता है। गूगल गुरु की शरण में आते ही उसे अपनी हर समस्या का समाधान एक क्लिक भर में मिल जाता है। बल्कि और ज्यादा ही मिलता है। सबसे बड़ी बात गूगल गुरु खुद से ज्ञान लेने का न कोई पैसा लेता है, न यह कहता है कि मेरे कने अभी टाइम नहीं, कल या परसों आना। गूगल गुरु 365 दिन- दिन हो या रात- हर वक्त अपने चेले की सेवा में हाजिर है।

गूगल गुरु संपूर्ण ज्ञान का खजाना है। पिन से लेकर पोर्न तक का ज्ञान गूगल गुरु के पिटारे में भरा पड़ा है। जिसको जित्ती जरूरत हो ले ले। आप एक बात पूछो, गूगल गुरु उससे जुड़ी हजार बातें आपके सामने खोलकर रख देगा। जित्ता मर्जी उत्ता सर्च करो। जित्ता मर्जी सवाल पूछो। जित्ता मर्जी दुनियाभर की घटनाएं देखो। गूगल गुरु, बिना गुस्साए, बस हंसते हुए प्रत्येक समस्या का समाधान कर देता है।

तकनीक के मामले में गूगल गुरु का जवाब नहीं प्यारे। सीधी-सच्ची, आढ़ी-टेढ़ी कैसी भी तकनीक के बारे में सर्च कर लो, सब गूगल के पन्नों पर विस्तार के साथ मिलेगा। कहीं फंस जाओ, वहां से निकलने का रास्ता भी बता देता है गूगल गुरु।

इश्क करने-फरमाने के मामले में गूगल गुरु का कोई सानी नहीं। अमां, इत्ता ज्ञान तो लव गुरु भी न दे पाएंगे, जित्ता गूगल गुरु दे देगा। लव के टिप्स चाहे पढ़कर लेना चाहो तो पढ़कर ले लो। अगर वीडियो देखकर लेना चाहो हो तो वीडियो देखकर ले लो। तमाम मस्त और धांसू टाइप की शायरियां गूगल गुरु के खजाने में मौजूद हैं।

रंगीन- डिफरेंट-डिफरेंट टाइप की- तस्वीरें भी गूगल गुरु के पास हैं। जब चाहो, तब देखो। देखने-दिखाने में कोई रोक-टोक न है। मैंने तो अपने न जाने कित्ते ही अरमां गूगल गुरु की शरण में जाकर पूरे किए हैं। सनी लियोनीजी पर पूरा ज्ञान (मय फोटूओं के) मैंने गूगल गुरु की मदद से ही तो हासिल किया है।

गूगल गुरु हमारे समय का सबसे आधुनिक टूल है। बिंदास और मस्त। न कोई गुरुदक्षिणा, न कोई ऐंठम-ऐंठी। जित्ता दिल करे, उत्ता इस्तेमाल करो। गूगल गुरु सदा सहाय।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

इमरान की तीसरी शादी : अभी तो मैं जवान हूं

सुनने में आया है, (इसे सुनी-सुनाई बात ही माना जाए) इमरान खान तीसरी शादी रचाने जा रहे हैं। खबर यह भी है कि यह महज 'अफवाह' भर है। अगर यह सच्चाई नहीं सिर्फ अफवाह ही है तो भी मैं इमरान खान के जिगर और जज्बे को झुककर सलाम करता हूं। जिस उम्र की दहलीज पर इमरान खान खड़े हैं, उस उम्र में शादी करने की सोच से ही दिमाग 'डिप्रेशन' में चला जाता है लेकिन वे कर रहे हैं। यह न सिर्फ बड़ी बात है बल्कि हर इंसान के दिल में अभी तो मैं जवान हूं टाइप हिम्मत भी पैदा करता है।

शादी करना कोई हंसी-ठिठोली नहीं। अच्छे-अच्छे पहलवानों के टांके ढीले और टखने कमजोर पड़ जाते हैं। यहां लोग एक शादी का बोझ उम्र भर झेल नहीं पाते और इमरान का तीसरी शादी का विचार है। नेक विचार है। ऐसे विचारों को दुनिया भर में फैलना एवं फैलाया जाना चाहिए। एहसास जिंदा रहता है कि शादी एक नहीं कई विकल्पों के खुले रहने का नाम है।

इमरान ने तीन तलाक की बंदिशों को तीसरी शादी के वार से ध्वस्त कर दिया है। जिंदगी तलाक के बाद खत्म नहीं बल्कि नए तरीके से शुरू की जा सकती है, बताया है। जमाना और रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे। इसमें दिन-ब-दिन बदलाव और एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं। बंदा किसी भी सूरत में 'बोर' नहीं होना चाहिए। शायद यही सोचकर इमराम, कबीर बेदी और पेले ने दूसरी या तीसरी शादी के विकल्प को चुना होगा।

मेरे मोहल्ले के कई वरिष्ठ इमरान के फैसले से खासा नाराज हैं। उनका कहना है, इस उम्र में इमरान को शादी का लड्डू न खाकर कुछ संस्मरण-आत्मकथा टाइप लिखना चाहिए था। अपने जीवन-संघर्ष के अनुभवों को मंजरे-आम पर लाना चाहिए था। शादी करके इमरान ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है।

मैंने वरिष्ठों को समझाया। इमरान का कदम एकदम उचित है जी। उम्रदराज होने का मतलब ये थोड़े न होता है कि बंदा तुरंत संस्मरण या आत्मकथा मोड में चला जाए। जिंदगी में मस्तियों का ग्राफ हमेशा ऊंचा रखना चाहिए। ताकि जिंदगी थकाऊ और ऊबाऊ न लगे।

और फिर इमरान ने तीसरी शादी ही तो की है, कोई चोरी थोड़े न की है। शादी करना या तोड़ना इत्ती स्वतंत्रता तो बंदा-बंदी के हाथ होनी ही चाहिए। तीसरी के साथ रहना-निभाना इमरान को है, आप काहे को दुबले हुए जा रहे हो। बंदा क्रिकेट और राजनीति का 'ऑलराउनडर' है, मैनेज कर लेगा।

रविवार, 17 जुलाई 2016

घटिया व्यंग्यकार

मियां बगल में मैगजीन दबाए धड़धड़ाते हुए मेरे कमरे में दाखिल आए। आव देखा न ताव आते ही मुझ पर उबल पड़े। 'अमां, आजकल किस किस्म के घटिया व्यंग्य लिख रहे हो। कुछ तो अपनी उम्र और गंजी होती खोपड़ी का लिहाज किया करो।'

गुस्से में लाल-पीले हुए मियां को मैंने संभाला। करीब बैठाकर कुछ ठंडा-शंडा पिलाया। फिर पूछा- 'मियां क्या हुआ? इत्ते खफा क्यों हो मुझसे? ऐसा क्या भद्दा लिख डाला मैंने?'
मियां ने झट्ट से बगल में दबी मैगजीन को निकालकर मेरी तरफ पटका। दहाड़े- 'यह तुम्हारा ही लिखा व्यंग्य है न!' मैंने कहा- 'हां। जब मेरे नाम से छपा है तो मेरा ही है। क्यों क्या हुआ?' तकरीबन आधा ग्लास ठंडा पानी गटकने के बाद मियां बोले- 'तुम सोशल मीडिया की बढ़ाई में व्यंग्य लिख रहे हो। फ्रैंड-फॉलोइंग को आज का 'अंतिम सत्य' करार दे रहे हो। फेसबुक, टि्वटर को यूथ आइकन बतला रहे हो। क्या सठिया गए हो बैठे-ठाले?'

'तो इसमें गलत क्या है? आजकल हर जगह सोशल मीडिया, फेसबुक-टि्वटर की ही धूम है। यह न केवल यूथ बल्कि अब तो बुर्जुगों की भी पहली पसंद है।' मैंने इत्मिनान से उत्तर दिया। इत्ता सुन मियां फिर से मुझ पर सीधे हो लिए- 'क्या खाक पसंद है। पूरे माहौल का 'कबाड़ा' कर डाला है मुए सोशल मीडिया ने। न भाषा की तमीज है, न बातचीत का सलीका। छोटे-छोटे वाक्यों-शब्दों में जाने क्या-क्या बकवास पेलते रहते हैं सब के सब।'

मैंने समझाया- 'जमाना इसी का है मियां। भाषा और शब्द जित्ते छोटे, आम और सहज होंगे, पढ़ने में उत्ता ही मजा आएगा। भारी-भरकम शुद्ध साहित्यिक भाषा के जमाने अब लद लिए। आजकल की भाषा टेक्नो-ओरियनटिड है। क्या समझे।'

'अच्छा। इसीलिए तुम अपने व्यंग्य की भाषा को बिगाड़ रहे हो। किसी जमाने में तुम कित्ता उम्दा व्यंग्य लिखा करते थे मगर अब 'कूड़ा' लिख रहे हो। एकदम घटिया व्यंग्यकार हो गए हो। अमां, चार-पांच सौ शब्दों में कोई बात कही जाती है भला। फेसबुक-टि्वटर की लत ने तुम्हारी भाषा, तुम्हारे शब्द, तुम्हारे लहजे का बेडा गर्क करके रख दिया है।'

मुझे गरियाते-गरियाते मियां जब थोड़ा शांत हुए। मैंने पुनः उन्हें ठंडा पानी पिलाया। और ध्यान से मेरी बात सुनने को कहा। 'आपने मुझे घटिया व्यंग्यकार होने का खिताब दिया, आपका शुक्रिया। घटिया तो मैं बचपन से हूं। क्योंकि अच्छा लिखना मुझे आता नहीं। न ही शौक है। सो, कोशिश हमेशा यही रहती है कि घटिया ही लिखूं। ताकि लेखन की दुनिया में नाम कम से कम हो। यहां ज्यादा या ऊंचा नाम होने के अपने 'खतरे' हैं। रही बात मेरी भाषा की तो मियां कब तलक साठ-सत्तर के दशक में जीते रहोगे। वहां से बाहर निकलकर देखो कि दुनिया भाषा के स्तर पर कित्ती बदल गई है। दिन-ब-दिन बदल रही है। टि्वटर पर आप मात्र 140 कैरेक्टर में अपनी बात कह-लिख सकते हैं। शब्दों-वाक्यों को अपने हिसाब से सरल और आम बना सकते हैं। इसी दम पर तो सोशल मीडिया में आपकी फ्रैंड-फॉलोइंग घटती-बढ़ती है। लोग आपको व्यक्तिगत तौर पर भले न जानते हों पर भाषा से तो पहचानते हैं न। यही काफी है।'

मेरा लंबा लेक्चर सुनने के बाद मियां थोड़ा नरम पड़े। और उल्हाना दिया- 'यार, तुम चाहे कुछ कह लो लेकिन अपना दिल तो आज भी उन्हीं पुराने लेखकों और भाषा में ही बसता-रमता है। अपना 'एडजस्टमेंट' आजकल के जमाने के साथ बहुत मुश्किल है। मुझे तुम्हारी भाषा और शब्दों में जो 'घटियापन' नजर आया सो बयां कर दिया आगे तुम्हारी मर्जी।'

इत्ता सब कह मियां मेरे यहां से अपने घर को निकल लिए। मैं भी अपने टैबलेट में टि्वटर पर आईं पोस्टें देखने में बिजी हो गया। हां, मियां टाइप यथास्थितिवादी लोगों से यह कहने का मन जरूर हुआ कि वक्त के साथ अगर नहीं बदलोगे तो हाशिए पर खुद-ब-खुद खिसकते चले जाओगे। फिर कुढ़ने-खिझने के अतिरिक्त पास कुछ न होगा। क्या समझे।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

न लिखूंगा ओपन लैटर

सुनो डियर,

अपने प्यार का इजहार तुमसे मैं 'ओपन लैटर' लिखकर ही करना चाहता था लेकिन अब नहीं लिखूंगा। जो कहना होगा, वाट्सएप कर दूंगा। यू नो, ओपन लैटर लिखने के बड़े खतरे हैं। ओपन लैटर के पब्लिक होते ही लोग जाने कैसी-कैसी बातें बनाने और क्या-क्या कहने लगते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स ऐसी-तैसी मारते हैं सो अलग। नहीं.. नहीं.. मैं ऐसा कोई भी 'खतरा' मोल नहीं लेना चाहता।

तुम्हें मालूम है, एक बहुत बड़े पत्रकार ने दूसरे बड़े पत्रकार को ओपन लैटर लिख है। हालांकि मैंने पढ़ा नहीं पर बताने वाले बताते हैं कि लैटर में बहुत बड़ी-बड़ी 'क्रांतिकारी' बातें हैं। दुनियाभर की वैचारिक सादगी और ईमानदारी की चटनी लैटर में डाली गई है। न केवल सोशल मीडिया बल्कि समूची धरती पर ओपन लैटर 'धमाल' मचाए हुए है। आलम यह है कि फेसबुक-टि्वटर पर हर दूसरा स्टेटस-ट्वीट ओपन लैटर के संदर्भ में ही होता है। पत्रकार महोदय रातों-रात 'स्टार' बन गए हैं।

किंतु मैं स्टार नहीं होना चाहता। मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं। यों भी, मेरे-तुम्हारे प्यारे की बातें ओपन हों, यह मैं कभी नहीं चाहूंगा। खामखां तमाशा बनने से क्या फायदा। अरे, वो तो बड़े पत्रकार ठहरे झेल जाएंगे मगर मैं नहीं झेल पाऊंगा। इस ओपननेस में कहीं तुम या तुम्हारे परिवार वाले 'बिदक' गए, मेरा तो बंटा-धार हो लेगा। जैसे-तैसी इत्ती मेहनत कर तुम्हें पटाया है। नहीं.. नहीं.. डियर कोई ओपन लैटर नहीं।

वो तो अच्छा हुआ कि हमारा प्यार तकनीक के दौर में परवान चढ़ा। तकनीकी दौर में एक-दूसरे को लैटर लिखना इत्ता जरूरी नहीं। वाट्सएप से सारा काम आसानी से चल सकता है। कित्ती ही प्यार भरी बातें वाट्सएप पर कर लो, कोई खतरा नहीं। अब तो वाट्सएप ने सारे मैसेजस को इनक्रिपटड भी कर दिया है। फिर काहे को ओपन लैटर का झंझट मोल लेना।

फिर आजकल के समय में कौन किसे लैटर लिखता है। भई, जिसके कने 'फालूत टाइम' हो वो ही लिखे लैटर। कित्ती एनर्जी और स्टैमिना वेस्ट होता है लैटर लिखने में। इसीलिए तो आज तलक मैंने तुम्हें कोई लैटर-सैटर नहीं लिखा। और हां तुम भी मत लिखना। कल को अगर किसी वजह से मेरे-तुम्हारे बीच ब्रेक-अप होता है कम से कम लैटर तो परेशान न करेंगे। नहीं तो पहले के प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को लिखे लैटरों को पढ़-पढ़के ही आधी उम्र गुजार दिया करते थे।

बिना लैटर की जिंदगी ज्यादा मस्त और सुकून भरी होती है। मैं तो कहता हूं, सरकार को लैटर लिखने-पढ़ने पर ही 'बैन' लगा देना चाहिए। जहां इत्ते बैन चल रहे हैं, एक और सही। क्यों ठीक है न।

सौ बातों की एक बात। जिसे अपनी जग-हंसाई करवानी हो, वो लिखे ओपन लैटर। कौन-सा ओपन लैटर लिख देने भर से इंसान या दुनिया बदल जाएगी। लैटर अब इतिहास की किताबों में समा चुका है। अतः उसे वहीं रहने दें।

बुधवार, 13 जुलाई 2016

मेरा देश बदल रहा है!

जमीन पर इत्ता नहीं जित्ता सोशल मीडिया में 'मेरा देश बदल रहा है' का 'हल्ला' मचा हुआ है। यों भी, जब से सोशल मीडिया जीवन का हिस्सा बना है, तब से हम दो देशों के बीच गुजर-बसर करने लगे हैं। विडंबना देखिए, एक देश पानी और बेरोजगारी की त्रासदी भीषण रूप से झेल रहा है तो दूसरा देश लाइक और कमेंट के बल पर ही बदल व आगे बढ़ रहा है।

'मेरा देश बदल रहा है' यह कोई नया नारा नहीं है। अक्सर सरकारें इस टाइप के नारे को आधार बनाकर चुनाव लड़ती व जीतती हैं। मजा देखिए, महज साल दो साल के भीतर ही सरकार ने घोषित करना भी शुरू कर दिया- देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा। जो साठ साल में देश को न बदल पाए, हमने मात्र दो साल में ही बदलकर रख दिया! हैं न हम उनसे बेहतर।

और जनाब देश भी क्या खूब बदला है। जिस 'भारत माता की जय' के जयकारे पहले कभी-कभार लगा करते थे, अब हर गली-मोहल्ले में लगातार सुनाई पड़ते रहते हैं। 'राष्ट्रवाद' और 'गाय' के प्रति जो 'सम्मान' बढ़ा है, उसका तो कुछ पूछिए ही मत। देखा-दाखी, अब तो मैंने भी एक गाय अपने घर में पाल ली है। ताकि मेरी 'देशभक्ति' पर कोई 'शक' न कर सके।

मेरा देश ऐसा बदला है कि अब मुझसे भिखारी भी डिजिटल रूप में भीख मांगता नजर आता है। भीख लेते हुए सेल्फी लेता है। एक-दो रुपया नहीं सीधा पांच सौ का नोट मांगता है। अरे, ऑटोवाला तक तो 'पेटीएम' से पेमेंट ट्रांसफर करने को कहने लगा है। देश के बदलने के साथ-साथ अच्छे दिन भी ऐसे धांसू आए हैं कि तेल से लेकर टैक्स तक गर्दन पर छूरी लेकर सवार हो गए हैं। आखिर मेरा देश बदल जो रहा है।

पर कोई नहीं। मेरे देश की जनता बहुत सयानी व समझदार है, हर बदलाव और बोझ को हंसते-हंसते झेलने का दम-खम रखती है। वो तो सोशल मीडिया पर फैल रहे 'मेरा देश बदल रहा है' के नारे को ही 'हकीकत' मानकर चल रही है। जनता का सीना गर्व से फूला हुआ है। अमां, मजाक न समझो। सही कह रहा हूं।

बेट्टा, बड़े-बड़े देश ऐसे ही बदला करते हैं। जनता को पता भी नहीं चल पाता। 'मेक इन इंडिया' और 'डिजिटल इंडिया' की कथित सफलताएं क्या बताने को काफी नहीं कि मेरा देश बदल रहा है। दो साल में एक भी छोटा-बड़ा घोटाला सामने नहीं आया- मतलब साफ है- मेरा देश बदल रहा है।

मेरी बात मानिए। खोपड़ी पर अधिक लोड न डालिए। चुप-चाप बिना किसी इफ एंड बट के स्वीकार कर ही लीजिए कि मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है। साथ-साथ, अपना 'सौभाग्य' समझिए कि आप इस देश के सम्मानीत बादिंशे हैं। भारत माता की जय।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

ख के नाम क का खुला खत

क ने ख को खुला खत (यानी ओपन लैटर) लिखा है। क का खत सोशल मीडिया पर जैसे ही वायरल हुआ, हर दिशा में 'हंगामा' मच गया। क के खत को हाथों-हाथ लिया गया। किसी को उस खत में 'सच्चाई' के दर्शन हुए तो किसी को 'सांप्रदायिकता' की बू आई। भक्त लोग तो खत पढ़कर ही भड़क उठे। क को टि्वटर पर जमकर 'ट्रोल' किया जाने लगा। बहती गंगा में हाथ धोने अन्य सयाने भी कूद पड़े।

किंतु मैं कुछ और ही सोच रहा हूं। फेसबुक-टि्वटर के जमाने में क का खुला खत लिखना वाकई जिगर का काम है। वरना, आजकल कौन किसको खत लिखा करता है। आलम यह है, अब तो न प्रेमी, न प्रेमिका ही एक-दूसरे को खत नहीं लिखते। मैसेंजर या वाट्सएप पर मैसेज भेज काम चला लेते हैं।

खत लिखने के तमाम झंझट हैं। समय और दिमाग दोनों ही बहुत खर्च होते हैं। खत में अगर कोई बात ऊपर-नीचे हो जाए तो हजार मुसीबतें। जैसे- आजकल क अपने खत के ऐवज में झेल रहा है। लग रहा है, मानो क ने खत लिखकर कोई बहुत बड़ा 'गुनाह' कर दिया हो। मन की बात कहना-लिखना तो एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। है न...।

हालांकि क का खुला खत मैंने अभी पढ़ा नहीं है। पढ़ने का कोई विचार भी नहीं। यों भी, खत पढ़ने और लिखने से मैं बचता ही हूं। टि्वटर पर रहकर आदत ऐसी पड़ गई है कि कम से कम शब्दों में ही बात को लिखना-पढ़ना पसंद है। बताते हैं, क का खुला खत काफी क्रांतिकारी टाइप है। मसले और मसाले दोनों का ही तड़का है खत में। काफी बड़ी-ऊंची बातें भी हैं। पत्रकारिता और पत्रकार की भूमिका को लेकर भी कुछ-कुछ है।

होगा क्यों न होगा। आखिर क का लिखा पत्र है। क कोई आम पत्रकार नहीं। बेहद प्रगतिशील और सच्चाई पसंद है! सरकार से क का साढ़े छत्तीस का आंकड़ा हमेशा बना रहता है। सारा जग जानता है।

इत्ती ऊंची और बड़ी बातें मेरे पल्ले वैसे भी नहीं पड़तीं। जहां तक बन पड़ता है, ऊंचे लोगों और बड़ी बातों से उचित दूरी बनाकर ही रहता हूं। खामखां कहीं बुद्धिजीवि या प्रगतिशील न हो जाऊं, इस खतरे से बचता हूं। आज जैसा समय चल रहा है, इसमें जित्ता 'न्यूट्रल' रहो, सेहत के वास्ते अच्छा है। दूसरे के फटे में अपनी टांग घुसेड़ने का जमाना अब न रहा प्यारे।

यह कोई पहली दफा नहीं जो क ने खुला खत लिखा हो। इससे पहले भी कई दफा कई लोगों को क ने खत लिखे हैं। उन खतों का किसकी सेहत पर क्या फर्क पड़ा यह तो क ही बेहतर बता सकता है। मगर सोशल मीडिया पर खत और क खूब ट्रोल हुए। चलो इस बहाने ही सही पब्लिक डोमेन में नाम तो बढ़ा।

मेरी तो क से इत्ती ही गुजारिश है कि वे एक खुला खत जाकिर चचा के नाम भी लिखें। वही सब उन्हें भी समझाएं, जो ख को समझाया था। फिर देखते हैं, क के खत का जाकिर चचा के दिलो-दिमाग पर कित्ता असर होता है या नहीं। साथ-साथ यह भी पता चल जाएगा कि प्रगतिशील मूल्यों में कित्ती ताकत होती है आदमी की सोच को बदल पाने में।

वरना तो लिखते रहिए ऐसे खुले खत कौन तव्वजो देता है यहां।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

खबरदार! 'डियर' कहा तो...

मैं हर रोज न जाने कित्ते लोगों को 'डियर' शब्द से संबोधित करता हूं। कभी-कभार पत्नी को भी 'डियर' बोल देता हूं। मगर याद नहीं पड़ता- कभी किसी ने मेरे (डियर) कहे जाने पर 'आपत्ति' या 'नाराजगी' जतलाई हो। बल्कि अगले का सीना तो 'डियर' का सम्मान पाकर गर्व से चौड़ा हो जाता है। लेकिन मानव विकास संसाधन मंत्री तो 'डियर' शब्द पर ही भड़क उठीं। 'टि्वटर' पर ही शिक्षा मंत्री की 'क्लास' लगा दी। तुम्हारी मुझे 'डियर' कहने-लिखने की हिम्मत कैसे हुई।

वाकई, मंत्री के दिमाग और सेंसेक्स की चाल का कोई भरोसा नहीं रहता। कब में पलट जाए। जैसे- 'डियर' शब्द पर उन्हें ऐतराज है, कल को 'यार' कहने पर भी हो सकता है। इस टाइप के अंगरेजी-हिंदी में जाने कित्ते शब्द-संबोधन हैं अगर यों ही आपत्ति दर्ज होने लगे फिर तो प्यार भरे शब्दों को मुंह से निकालने में दस दफा सोचना पड़ेगा।

'डियर प्रकरण' के बाद से मैं थोड़ा सहम-सा गया हूं। किसी को भी (मय पत्नी) 'डियर' कहने-लिखने में 'परहेज' बरतने लगा हूं। न जाने कब, किसको मेरा 'डियर' कहना-लिखना अखर जाए। मंत्रीजी की तरह कोई मेरी भी 'क्लास' ले ले। पत्नी तो ऐसे झगड़ायुक्त मुद्दों की तलाश में रहती ही है। कहीं उसे ही 'डियर' शब्द पर ऐतराज हो गया तो...। अमां, यहां तो सुबह-रात के खाने और सोने के लाले पड़ जाएंगे। यों भी, आजकल पत्नी स्त्री-विमर्श एवं नारी-एकता पर बहुत जोर दे रही है।

फिर तो इस प्रकार के ऐतराज 'स्वीटी' या 'स्वीटहार्ट' जैसे परम-आत्मीय संबोधनों पर भी उठ सकते हैं। कल को बीवी-बहू-बेटी इसी पर क्लास लगाने लग जाए। आगे कोई पंगा बढ़े, बेहतर है, क्यों न अभी संभल जाओ।

बाकी ऐतराज-आपत्ति एक तरफ। मगर हां सोचना तो पड़ता है कि जहां समाज के भीतर निरंतर खुलापन बढ़ रहा है, ऐसे में 'डियर' शब्द पर 'झगड़ा'। समझ से परे है। विदेशों में तो लोग एक-दूसरे को जाने किन-किन शब्दों से संबोधित कर देते हैं। अब तो फिल्मों में 'डियर' से भी भयंकर टाइप शब्द खुल्ला कहे-बोले जा रहे हैं।

जो हो। अगर मंत्री महोदय को 'डियर' कहे जाने पर आपत्ति है तो है। भला किसमें हिम्मत, जो मंत्रीजी के ऐतराज पर कट लगा सके।

हालांकि 'डियर' बेहद खूबसूरत संबोधन है मगर मुझे डर है, कहीं अब इसे 'डिक्शनरी' में से ही बाहर निकालने की कवायद न होने लगे। जब 'उड़ता पंजाब' पर इत्ती हाय-तौबा मच सकती है फिर यह तो 'डियर' है। क्यों डियर...।

रविवार, 10 जुलाई 2016

बदले-बदले से मियां

मियां आज कुछ बदले-बदले से नजर आ रहे थे। हमेशा बदन पर चढ़े कुर्ते-पायजामे की जगह जींस-टी-शर्ट थी। सीधे हाथ में झूलने वाली छड़ी नदारद थी। बाईं बगल में अखबार नहीं बल्कि डायरी-नुमा काला-सा कुछ दबाए थे। गजब यह था कि आज मियां की टहल मेरी टहल से पहले ही पूरी हो गई थी। सो सुबह-सुबह मेरे घर आन धमके।

आते ही मियां ने मुझे चाय की जगह कोल्ड-ड्रिंक लाने का ऑडर दिया। साथ में साल्टिड चिप्स भी। इत्ते भाव देखके मैंने पूछा- 'अमां, मियां क्या बात आज सिर से लेकर हाव-भाव तक सब में बदले-बदले से नजर आ रहो हो। सब खैरियत तो है।' एक नजर मेरे तरफ देख मियां थोड़ा मुस्कुराए। फिर बोले- 'खैरियत-वैरियत तो सब है। आज से मैंने जमाने और वक्त के साथ चलना शुरू कर दिया है। कपड़े से लेकर खाने-पीने तक की 'च्वाइस' बदल डाली है। सबसे जरूरी काम मैंने यह किया है कि अब मैं भी सोशल मीडिया से जुड़ गया हूं। तब ही तो अखबार की जगह यह नया टैबलेट बगल में दबाए घुम रहा हूं।'

कोल्ड-ड्रिंक और चिप्स के पैकेट को मियां की तरफ धकेलते हुए मैंने कहा- 'वो तो सब ठीक है पर जरा अपनी उमर और सेहत की भी फिकर करो। इस उमर में लौंडो-लफाड़े वाले शौक जांचते नहीं तुम्हें।'

इत्ता सुन मियां हत्थे से उखड़ लिए। मेरे करीब यों आन बैठे मानो मेरे कहे का अभी हिसाब-किताब पूरा कर देंगे। कोल्ड-ड्रिंक के सिप को सुड़पते हुए बोले- 'क्या स्मारट होने-बनने की भी उमर होती है? खुदा के फजल से अभी मेरे बत्तीसों दांत टनाटन। सिर के- किनारे के बालों को छोड़के- बाकी बाल काले और नजरें एकदम मस्त हैं। सेहत भी माशाअल्लाह धांसू रहती है।'

मैंने मियां को बीच में टोकते हुए कहा- 'ठीक है... ठीक है... लेकिन आस-पड़ोस का कुछ तो लिहाज करना चाहिए न।' मियां भड़कते हुए बोले- 'अमां, काहे का लिहाज? मैं कौन-सा किसी की बीवी को अपने साथ उड़ाए लिए जा रहा हूं। आजकल के ट्रेंड के साथ चलने-ढलने में हरज ही क्या है?'

कुछ देर सुस्ता लेने के बाद मियां ने अपने डायरी-नुमा टैबलेट पर कुछ अखबार एक मिनट में ही खोल डाले। बोले- 'अखबार पढ़ने का मजा तो इसी पर है। न अखबार खरीदने का झंझट, न पढ़कर रद्दी इकठ्ठी करने का झाड़। उमर के साथ बदलने में ही भलाई है बरखुरदार। जो वक्त के साथ नहीं बदलता हाशिए पर सिमटकर रह जाता है।'

'मेरी मानो तुम भी खुद को डिजिटल कर लो। कब तक कागज-दवात के चक्कर में उलझे रहोगे।'- मियां कहते हुए निकल लिए।