रविवार, 12 जून 2016

'उड़ता पंजाब' बनाम सेंसर बोर्ड

फिल्म 'उड़ता पंजाब' ने सबको उड़ा रखा है। फिल्म-निर्माता से लेकर नेताओं तक सब के सब उड़ रहे हैं। इनको उड़ाने का काम किया है सेंसर बोर्ड ने। सेंसर बोर्ड ने फिल्म में इत्ते कट मारे हैं कि निर्माता समझ ही न पा रहे, फिल्म को आगे से रिलीज करें या पीछे से। एक दो कट होते तो चल भी जाता है। सुना है, पूरे 89 कट हैं। एक ही फिल्म में जब इत्ते कट लग जाएंगे फिर फिल्म का क्या हश्र होगा आसानी से समझा जा सकता है।

वैसे, अपना सेंसर बोर्ड भी न घणा मस्त है। जब, जहां, जिधर से चाहता है फिल्म में कट मारकर खुद चैन की नींद सोता है मगर फिल्ममेकर को बेचैन कर देता है। बेचारा फिल्म बनाने वाला इत्ती मेहनत से फिल्म बनाता है। फिल्म जब सेंसर बोर्ड के पास जाती है तो वो कट मार-मारके फिल्म को अधमरा तो रिलीज से पहले ही कर देता है। अब इत्ती कांट-छांट वाली फिल्म को देखने से बेहतर है सिर्फ 'कैंची' ही न देख ली जाए। न मन में कुढ़न रहेगी, न बेचैनी।

अच्छा। क्षेत्र चाहे फिल्म का हो या साहित्य का भावनाओं का आहत होना बड़ा मायने रखता है। यहां तो जब तब लोगों की भावनाएं किसी न किसी सीन या लेख पर आहत होती ही रहती हैं। कुछ कट फिल्मों में राजनीतिक स्वाद-अस्वाद को ध्यान में रखते हुए भी लगा दिए जाते हैं। 'उड़ता पंजाब' का मसला भी कुछ ऐसा ही है। सेंसेर बोर्ड को लगता है कि फिल्म में ड्रग्स की समस्या को जिस तरह प्रदर्शित किया गया है, इससे राजनीति विवाद के साथ-साथ पंजाब की छवि को भी नुकसान हो सकता है। तो मार डाले सेंसर बोर्ड ने एक साथ इत्ते सारे कट। न बांस रहेगा, न बांसुरी बजेगी। मामला एकदम सफाचट।

जो ले रहे हैं उन्हें लेने दीजिए किंतु इस तरह के विवादों का दिमाग पर लोड लेने का कोई मतलब नहीं बनता। 'उड़ता पंजाब' पर विवाद और बहस चल जरूर रही है, देख लीजिएगा, फायदा अंततः फिल्म को ही होगा। पूर्व में भी कई दफा देखा गया है कि अलां-फलां फिल्मों पर विवाद छिड़ा और फिल्म हिट हो ली। इधर फिल्म के हिट होने का ट्रेंड थोड़ा बदला है। अब फिल्म (अपवादों से परे) बेहतर कहानी या अभिनय के दम पर नहीं अपितु विवाद के दम पर हिट होती है। विवादों की आड़ में फिल्म को इत्ता 'सेंसेशनल' कर दिया जाता है कि आधे बंदा तो केवल 'विवादित सीन' को ही सिनेमा हॉल में देखने जाते हैं।

थोड़ा सेंसर बोर्ड को भी अपने दिमाग और सोच को खुला बनाना चाहिए। ये दिखाना है, ये नहीं दिखाना है का क्या मतलब है? अमां, अब वक्त और लोग पहले जैसे नहीं रहे। बहुत कुछ बदल गया है समाज में और निरंतर बदलने की प्रक्रिया में है। सब को सब मालूम है। हर किसी ने सबकुछ देखा हुआ है। फिर काहे के कट और बैन? इत्ता 'यथास्थितिवादी' भी न बनाएं सेसेर बोर्ड को कि हीरोईन का पल्लू सरकते ही कंपकंपी छूट जाए।

'उड़ता पंजाब' को खुली हवा में उड़ने दीजिए। उस पर बैन की बंदिशें न थोपिए। यह दुनिया उड़ने के लिए ही बनी है। जो उड़ेगा, वो सफलता पाएगा। जमीन पर भला अब कौन टिके रहना चाहता है। यहां तो 'क्रांतियां' भी अब जमीन पर कम फेसबुक-टि्वटर पर अधिक होने लगी हैं।

वक्त बहुत तेजी से बदल रहा है। मगर सेंसर बोर्ड के खलिफा लोग पता नहीं कब बदलेंगे?