सोमवार, 30 मई 2016

ब्रेड न खाऊं तो क्या खाऊं

मुझे न केवल ब्रेड खाना पसंद है बल्कि खरीदकर लाना तो और भी। मेरे कने जब कुछ खास खरीदने के तईं नहीं होता, तो ब्रेड खरीद लेता हूं। ब्रेड खरीदने में मुझे 'आत्मिक सुख' की प्राप्ति होती है। किंतु इधर जब से पत्नी की निगाह से ब्रेड में कथित 'पोटेशियम ब्रोमेट' रसायन की खबर गुजरी है, मेरा न सिर्फ ब्रेड खाना, खरीदना यहां तक कि उसकी तरफ देखना तक बंद करवा दिया है। पत्नी ने साफ शब्दों में हड़का दिया है, खबरदार आज से घर में ब्रेड दिखी या चर्चा भी हुई तो तुरंत 'तलाक' ले लूंगी।

इस वक्त मरता क्या न करता वाली स्थिति में हूं। न ब्रेड खाना छोड़ सकता हूं, न पत्नी को। पत्नी को कित्ता समझाया कि ब्रेड खाने से मुझे 'दिमागी ऊर्जा' मिलती है। लेखन के वास्ते नए-नए विचार मन में आते हैं। न सिर्फ सांसों में बल्कि नसों तक में 'शुद्धता' का एहसास जागता है। जित्ता रोटी-चावल खाने से पेट नहीं भरता, उत्ता ब्रेड खाके भर जाता है।

मगर पत्नी है कि कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। उसे तो ब्रेड इस वक्त अपनी 'सौतन' टाइप लग रही है। हर पल उसकी आंखें मेरी ही स्कैनिंग करती रहती हैं, कहीं मैं चोरी-छिपे ब्रेड तो नहीं ठूस रहा।

जबकि पत्नी नहीं जानती कि 'पोटेशियम ब्रोमेट' से कहीं अधिक खतरनाक रसायन तो इंसानों के दिलों में भरा पड़ा है। दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला में जांच करवा लीजिए, इंसानी दिलों में भरी नफरत-टुच्चई के रसायन की मात्रा औकात से कहीं ज्यादा मिलेगी। ऐसे में, ब्रेड में मिला रसायन भला क्या असर करेगा? हकीकत तो यह है कि इंसान की सेहत पर अब किसी भी प्रकार का 'हानिकारक रसायन' प्रभाव नहीं डालता। इंसान रसायनों को निगलने का आदी हो चुका है। खामखां का हल्ला है, ब्रेड में 'पोटेशियम ब्रोमेट' का पाया जाना।

अमां, जब इंसान का मन ही 'शुद्ध' न रहा तो खाने-पीने की चीजों में मिलावट उसका क्या बिगाड़ लेगी? ब्रेड और मैगी मत खाओ, कोड ड्रिंक और आरओ का पानी मत पियो; कहां तलक किस-किस से बचते फिरेंगे। पूरी दुनिया ही मिलावट के दम पर टिकी है प्यारे।

मैं तो कहता हूं, खाने-पीने की चिंता छोड़के आदमी को एकदम मस्त रहना चाहिए। ज्यादा शुद्ध चीजें पेट और सेहत का हाजमा ही बिगाड़ती हैं।

आदमी जैसे कैंसर होने के बाद भी जीने की उम्मीद नहीं छोड़ता, ठीक इसी तरह, मिलावटी चीजों में भी शुद्धता की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। ये ब्रेड बंद हो गई तो क्या कल को बाबाजी अपनी 'स्वदेशी ब्रेड' ले आएंगे। फिकर छोड़ें, ब्रेड खाएं।

3 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

खाने वाले कहाँ छोड़ते हैं. पहले मैगी के लिए खूब हो हल्ला हुआ था, क्या हुआ फिर वही ढाक के तीन पात. कल वही होगा सब ठीक है कह लेंगे।
..
बहुत अच्छी प्रस्तुति

Ashutosh Dubey ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट !
हिंदीकुंज

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'शो मस्ट गो ऑन' को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...