मंगलवार, 24 मई 2016

मियां की बेचैनी

मियां आज सुबह-सुबह ही आ धमके। न दुआ, न सलाम। न चेहरे पर मुस्कुराहट, न हाथ में छड़ी। धम्म से सोफे पर पसर गए। हाथ में थामा हुआ अखबार मेरे तरफ फेंकते हुए बोले- 'अमां, देख रहे हो समाज में क्या-क्या हो रहा है? आंख का पानी तो बहुत पहले मर गया था, अब तो दिलों से डर भी जाता रहा।' मैंने मियां द्वारा मेरी तरफ फेंके अखबार को हाथ में लेते हुए खबर को पढ़ा। खबर थी कि एक बीवी अपने सोते हुए शौहर की आंखों में फेवीक्विक लगाके किसी के साथ चंपत हो ली।

खबर पर पहले तो लंबी-चौड़ी हंसी हंसा। फिर मियां की तरफ मुखातिब हुआ- 'अमां, कैसी-कैसी मजेदार खबरें पढ़ते रहते हो। इसमें इत्ता अचंभा या अजूबा क्या है? गली-मोहल्ले, शहर-गांव में ऐसे मसले अब आम हो लिए हैं। हर दूसरे दिन अखबार में किसी न किसी बीवी या शौहर की खबर आ ही जाती है, जो इसके या उसके संग भाग गई या भाग गया। इस उम्र में इत्ती 'टेंशन' नहीं लिया करते मियां।'

इत्ता सुनते ही मियां आग की मानिंद मुझ पर भड़क लिए। मानो अभी ही 'भसम' कर देंगे। 'अमां, यहां किसी का घर उजड़ लिया और तुम्हें मजाक सूझ रही है। बड़े संग-दिल हो यार। बीवी को अगर भागना ही था तो शौहर को जगाकर, उससे बातकर भागती। यह क्या कि उसी आंखों ही चिपका दीं। लाहौल विला कुव्वत। बताओ बीवी को अपने शौहर के साथ ऐसा करना चाहिए भला?'

मसले पर आगे कुछ कहने से पहले मैंने ठंडा मांगवाकर मियां को शांत करने की कोशिश की। होता-होता है, कभी-कभी दिमागी गर्मी सुबह-सुबह ही असर दिखा देती है। ठंडा गटककर मियां जब थोड़ा शांत पड़े तो मैंने उन्हें हल्के-फुल्के मूड में समझाया।

'देखो मियांजान, जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। नाते-रिश्ते, अपने-सगे अब सिर्फ कहने भर को रह गए हैं। सबकुछ दिन-ब-दिन बदलती तकनीक के साथ बहुत तेजी से बदलता जा रहा है। अमां, ये तो बीवी-शौहर का रिश्ता रहा, यहां तो बाप-बेटे के रिश्ते की कोई गारंटी नहीं ले सकता। जाने कित्ते बेटों ने अपने मां-बाप को जमीन-जोरू के ऐवज में घर-निकाला दे रखा है। और फिर बीवी ने किया तो तुम इत्ता 'भड़क' उठे। यही अगर शौहर करता तो...। तब क्या कहते?'

गर्म पड़े मियां जुबान को ठंडा करते हुए बोले- 'अमां, बात तो सही कर रहो। लेकिन बीवी-शौहर का रिश्ता तो 'विश्वास' की 'बुनियाद' पर ही जमा होता है न। जब वो बुनियाद ही दरकने लगे फिर तो कुछ कहना-सुनना ही बेकार। रिश्ते बेमानी और खोखले हो जाते हैं। अब हमें ही देख लो पिछले चालीस बरसों से एक-दूसरे के दामन को यों थामें हुए हैं मानो कभी छोड़ना ही नहीं। ऊंच-नीच कहां नहीं होती। पर मसले को सुलझाना आना चाहिए। क्या नहीं...।'

'अमां मियां तुम अपनी छोड़ो वो तो भाभीजी की नेक-नीयत की वजह से तुम्हारा रिश्ता बचा हुआ है। वरना, तुम्हारी आशिकी और दिल-फेंक मिजाजी के किस्से तो पूरे मोहल्ले में मशहूर थे।' मैंने मियां से चुटकी ली। इत्ता सुनते ही मियां झट्ट से अपने सोफे से उठकर मेरे कने आ बैठे। और मेरी जुबान पर उंगली रखते हुए चुप रहने को कहने लगे। 'अमां यार, क्या बोले जा रहे हो। कहीं भाभी ने सुन लिया तो इस उम्र में लेने के देने पड़ जाएंगे। जो मसला चल रहा है, उसी पर कायम रहो। इधर-उधर न भटको।'

एक लंबी मगर जोरदार हंसी मैं हंसा और मियां को बोला- 'अब आया न ऊंट पहाड़ तले। इसीलिए कहता हूं, दूसरे पर इल्जाम लगाने या नाराज होने से पहले अपने गिरेबान में जरूर झांक लो।'
मियां ने 'हां' में सिर हिलाया। अपनी बेचैनी को शांत किया। जाते-जाते इत्ता ही बोले- 'वाकई दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। कोई चेहरा बे-दाग नहीं यहां।'

मियां का लाया अखबार वहीं पड़ा रहा। जिसे थोड़ी देर बाद मैंने रद्दी के हवाले कर दिया।

2 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 26 मई 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Ashutosh Dubey ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट !
"हिंदीकुंज"