गुरुवार, 19 मई 2016

सूरज की डिग्री का प्रकोप

सूरज का प्रकोप अपने चरम पर है। बिना किसी से दबे, पूरी दबंगाई के साथ वो अपना ताप दिखला रहा है। किसी में इत्ती हिम्मत नहीं कि उसे रोक या टोक भी सके। सब भीगी बिल्ली बने, सूरज का ताप झेलने को 'अभिशप्त' हैं। हालांकि किसी ने सूरज पर डिग्री दिखाने का 'प्रेशर' नहीं डाला, मगर वो फिर भी दिखा रहा है।

सूरज की 'तीक्ष्ण डिग्री' को देखना या झेलना हमारे तईं मुसीबत से ज्यादा मजबूरी है। हम चाहकर भी इससे बच नहीं सकते। ताप से बचने के लिए चाहे किसी कोने में जाकर क्यों न बैठ जाएं, डिग्री की आग हमें झुलसा ही जाती है। कभी-कभी तो एक ही सांस में जाने कित्ती दफा मैं सूरज और पारे को 'गरिया' देता हूं मगर क्या फायदा? लौटकर गालियां मुझे ही पड़ती हैं। उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

एक तरफ सूरज का ताप है तो दूसरी तरफ बत्ती का खेल। कब में आएगी। कब में जाएगी। कित्ता रूलाएगी। कित्ती तड़पाएगी। कुछ नहीं कहा जा सकता। बादशाहों की तरह बत्ती भी अपनी मर्जी की मालकिन है। इंजीनियर की जाने दीजिए, बत्ती पर तो न सरकार न मुख्यमंत्री किसी का जोर नहीं चलता। केवल कागजों में ही भरपूर बत्ती देने के जुमले दर्ज होते रहते हैं।

सूरज के ताप को कम करने के वास्ते एकाध दफा अपने घर पर यज्ञ-हवन भी करवा चुका हूं। पर, सूरज की डिग्री है कि टस से मस नहीं होती। आजकल रात-दिन जीना, खाना-पीना, टहलना, सोना सबकुछ मुहाल किया हुआ है। डिग्री पर ऐसा सनिचर आकर बैठा है कि 45-47 से नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। जाड़ों में जिन सूर्य देवता के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं, गर्मियों में अतिथि से भी कहीं ज्यादा मजबूती से आकर जम गए हैं।

हां, ठंडे का कारोबार करने वाले सूरज की डिग्री की तपिश से अति-प्रसन्न हैं। रात-दिन यही दुआएं करते रहते हैं कि डिग्री अपनी हदें पार करती रहे ताकि उनका धंधा चमचमाता रहे। आजकल बंदा रोटी-दाल से कहीं अधिक तो आईसक्रीम खा और कोल्ड ड्रिंक पी रहा है। सब सूरज की डिग्री की माया है।

वैसे तो हमारे समाज से लेकर राजनीति और साहित्य में एक से बढ़कर एक 'सूरमा' मौजूद हैं मगर किसी में इत्ती हिम्मत नहीं है कि वो सूरज से अपनी डिग्री को दायरे में रखने को कह सके। क्या सब के सब कागजी शेर हैं? असली बात तो तब है, जब भीड़ में से कोई रजनीकांत निकलकर सामने आए और सूरज को अपनी मानमानी करने से रोक सके। बाकी बातें हैं, बातों का क्या!

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