गुरुवार, 12 मई 2016

लोकतंत्र को बचाने की खातिर

देश के नेताओं के बीच 'लोकतंत्र को बचाने' की जंग-सी छिड़ी हुई है। कोई सड़कों पर निकलकर तो कोई जुबानी तीर चलाकर लोकतंत्र को बचाने के लिए 'प्रयासरत' है। लुत्फ यह है, नेताओं द्वारा लोकतंत्र को बचाने की मुहिम 365 दिन और 12 महीन लगातार चलती रहती है। खासकर, चुनावों के नजदीक आने पर यह और भी तेज हो जाती है।

लोकतंत्र को बचाने के लिए नेताओं का 'जोश' देखते बनता है! अक्सर मेरा ही सीना गर्व से फुलकर 56 इंच पार कर जाता है। यह हमारे देश और जनता का 'सौभाग्य' है कि उसे लोकतंत्र बचाने वाले ऐसे 'जुझारू नेता' मिले! वरना तो सब अपने-अपने में लगे रहते हैं। अगर किसी नेता के घपले-घोटाले का खुलासा होता है न तब भी मैं यही समझता हूं कि बंदा जरूर लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की परपंरा को बचाने में लगा होगा। वाकई बड़ा काम है लोकतंत्र को बचाना।

न न ऐसा कतई न समझिएगा कि मैं- बतौर लेखक- लोकतंत्र को बचाना नहीं चाहता। मैं खुद दिल से चाहता हूं कि हमारा लोकतंत्र बचा रहे। मगर थोड़ा कन्फ्यूज-सा हो जाता हूं कि लोकतंत्र को बचाऊं तो कैसे? देखिए, नेताओं कने तो ताकत और सुविधाएं हैं भिन्न-भिन्न तरीकों से लोकतंत्र को बचाने की। कभी जुमलेबाजी का सहारा लेकर, कभी सरकार बनाकर तो कभी बनी-बनाई सरकार को लुढ़काकर, कभी इतिहास के पन्ने बदलकर, कभी मुफ्त में चीजें बांटकर वे लोकतंत्र को बचाने में लगे रहते हैं।

मगर मेरे कने तो ले-देके एक कलम ही है। (अब कलम भी कहां रही। जब से की-बोर्ड चलन में आया है। बेचारी कलम तो किनारे है।) जब भी कलम से लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करता हूं, कलम टूट जाती है। हालांकि देश को आजाद करवाने में कलम की बहुत बड़ी भूमिका रही है। लेकिन क्या कीजिएगा, समय के साथ सबकुछ बदल जाता है। अब लेखकों की कलमों में वो ताकत भी कहां रही। अधिकतर तो अपने-अपने सम्मान-पुरस्कार के लोकतंत्र को बचाने में ही व्यस्त रहते हैं।

फिर भी, कभी-कभी सोचता हूं तो यह प्रश्न खोपड़ी में हल्ला मचा देता है, क्या वाकई हमारा लोकतंत्र इत्ता खतरे में है कि उसे बचाने के तईं नेता-बुद्धिजीवि सड़कें नाप रहे हैं? क्या नहीं लगता कि लोकतंत्र से कहीं ज्यादा खतरे में तो पानी है? उसे बचाने की खातिर क्यों नेता-बुद्धिजीवि सड़कों पर नहीं निकलते?

यह भी है, लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर निकलेंगे तो हर अखबार-टीवी चैनल पर फोटू आएगी। पानी को बचाने से क्या मिलेगा? इत्ती गर्मी में बेचारे पसीना-पसीना और हो जाएंगे।

लोकतंत्र कभी-कभी सोचता जरूर होगा, कैसे अहमक लोग हैं एक बचे-बचाए 'स्तंभ' को बचाने में लगे पड़े हैं।

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