बुधवार, 11 मई 2016

डिग्री पर बवाल

डिग्री न हुई, नई-नवेली बहू का पल्लू हो गया। जरा-सा सरका नहीं कि बवाल-दर-बवाल। डिग्री पर बवाल भी ऐसा मचा है कि न थमने में आ रहा है, न सिमटने में। कथित ईमानदार पार्टी के नेताओं ने तो मानो तय कर लिया है कि डिग्री पर बवाल के पारे को यों ही चढ़ाए रखेंगे। उनके तईं पानी, सूखे की समस्या से कहीं ज्यादा जरूरी डिग्री का मसला है।

यों, सुनने में ईमानदारी शब्द बड़ा 'प्राउड' टाइप 'फील' देता है। मगर असलीयत बरतने पर ही पता चलती है। सरकार के न बनने से पहले ईमानदार मुखिया का हाल भी लगभग यही था। हम राजनीति में आए ही इसलिए हैं ताकि दूसरों को राजनीति करना सीखा सकें। जब आ गए तो कुछ और नहीं डिग्री की राजनीति करना सबको सीखा रहे हैं। ईमानदार व्यक्ति के साथ सबसे बड़ा लोचा यही होता है कि वो अपने आगे हर किसी को 'फर्जी' और 'चोर' समझता है।

चारों तरफ डिग्री-डिग्री के शोर में महत्त्वपूर्ण मुद्दे दब गए हैं। या कहूं, जानकर दबा दिए गए हैं। करना भी क्या है महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाकर। मुद्दे महत्त्वपूर्ण तब ही तलक रहते हैं, जब तलक जनता का वोट पेटी में बंद नहीं हो जाता। पेटी खुलते ही नेता की किस्मत चमक और जनता की फीकी पड़ जाती है। इन दिनों यही सीन चल रहा है। विपक्ष और सरकार दोनों ही तरफ से। डिग्री टाइप बेतुके विवाद पैदाकर ईमानदारों के मसीहा मानो ठाने बैठे हैं, न खुद काम करेंगे, न किसी को करने देंगे।

बहुत अच्छा हुआ जो मैं ईमानदार न हुआ। उससे भी अच्छा यह हुआ कि मेरे कने डिग्री नहीं है। आजकल दोनों ही चीजें जान को बवाल बनी हुई हैं। मैं तो कहता हूं, नौकरियों में से डिग्रियों की महत्ता खत्म ही कर देनी चाहिए। न डिग्री होगी, न बवाल कटेगा। मानो, प्रधानमंत्री के पास डिग्री होने या न होने पर ही देश और राजनीति की बुनियाद टिकी हो!

चलो नेताओं का तो समझ में आता कि उन्हें 'डिग्री' हो या 'असहिष्णुता' बखेड़ा खड़ा करने में मजा आता है। मगर जब मीडिया उनके सुर में सुर मिलाने लग जाता है, तो दिमाग की हटने लगती है। चैनलों पर सारा-सारा दिन डिग्री के बहाने, अलां-फलां पार्टियों के नेताओं का जमझट लगाकर, आपस में तू-तू, मैं-मैं होती रहती है। कौन क्या बोल रहा है, पल्ले ही नहीं पड़ता। सब एक-दूसरे पर आस्तीने चढ़ाए (मौखिक) हमला करने को तैयार बैठे रहते हैं।

अब तो ऐसा लगने लगा कि हमारे देश में 'प्रधानमंत्री की डिग्री' विश्व की सभी बड़ी समस्याओं में से एक हो गई है। अगर यह समस्या न होती तो आज हमारा देश विकास के पथ पर सरपट-सरपट भाग रहा होता!

नेताओं ने राजनीति को 'कॉमेडी सर्कस' में तब्दील करके रख दिया है। ऐसे-ऐसे अंड-बंड मुद्दे उठाकर ले आते हैं कि जनता भी अपना माथा पिट लेने के बाद यह जरूरी बोलती होगी- बेकार ही इन्हें वोट दिया। फिलहाल, कोई चारा नहीं। जब वोट दिया है, झेलना तो पड़ेगा।

केवल मनोरंजन के लिए डिग्री पर मचा बवाल अच्छा है। किंतु देश और राजनीति की सेहत के लिए बहुत खराब। कहना कठिन है, नेताओं को यह बात किस जन्म में समझ आएगी।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मानव सेवा को नमन - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...