सोमवार, 2 मई 2016

डिग्री से दूरी भली

पढ़ाई और डिग्री से मुझे बचपन से ही 'एलर्जी' रही है। मैंने पढ़ाई भी उत्ती ही की, जित्ती से रोजी-रोटी की जुगाड़ बन जाए। अतिरिक्त पढ़ाई में न मेरा मन लगा, न कभी अधिक पढ़-लिखकर 'इंटेलिजेंट' बनने की कोशिश ही की। किताबी पढ़ाई से मैं वैसे ही दिल चुराया करता था, जैसे वेजीटेरियन नॉन-वेज खाने में अलसाता है। कभी-कभी ज्यादा पढ़ाई-लिखाई भी काबिलियत पर बोझ बन जाती है।

इसीलिए मैंने अपने कने कभी कोई डिग्री नहीं रखी। हालांकि एकाध बार दिल करा भी कि जाकर अपनी डिग्री ले आऊं मगर बीच में यह सोचकर रूक गया, क्या फायदा अधिक कागज-पत्रर जोड़कर। कल को कहीं गुम हो गई तो दोबारा पाने के लिए विश्वविद्यालय के बाबू की 'खुशामत' करते फिरो। यों, पढ़ाई से लेकर लेखन तक मैंने कभी किसी की खुशामत नहीं की।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि डिग्रियां काबिलियत की पहचान नहीं होतीं। डिग्री लेना उत्ता ही आसान होता है, जित्ता कवि बनकर कविता करना। ऐसा न जाने कित्ते ही लोग से मेरा वास्ता पड़ा है, जिनके कने बड़ी से बड़ी डिग्रियां तो खूब थीं किंतु जमीनी स्तर पर नील-बटा-सन्नाटा रहे। केवल किताबें पढ़कर या डिग्रियां जुटाकर कोई काबिल नहीं बन जाता। काबिल बनने के लिए खुद की समाज से जान-पहचान बहुत जरूरी होती है।

कुछ लोग तो केवल डिग्रियां बटोरने के लिए ही पढ़ाई-लिखाई किया करते हैं। फिर उन डिग्रियों का वर्णन अपने बायो-डाटा या लैटर-हेड में इत्ती प्रमुखता से करते हैं कि पढ़ने वाले की खोपड़ी भन्ना जाए। इन कथित डिग्रीधारकों से एक दफा क, ख, ग सुन लीजिए। पूरी हकीकत सामने आ जाएगी। जो बंदा अपनी पढ़ाई-लिखाई की डींगे खुद ही मारना शुरू कर दे समझ लीजिए उसकी डिग्री में खोट है।

दुनिया में ऐसे-ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनके कने कोई ऊंची-बड़ी डिग्री नहीं थी। फिर भी, दुनिया-समाज को उन्होंने जो दिया, उसकी मिसालें आज हर जगह दी जाती हैं। कबीर, बाबा बुल्लेशाह, कमाल पाशा आदि के पास डिग्रियां नहीं थीं मगर उन्होंने दुनिया को जो संदेश दिया उसमें 'दम' था। कमाल यह है कि कथित डिग्रीधारक भी इन महापुरुषों के कथनों के गुणगान किया करते हैं। तरह-तरह की डिग्रियां पा लेने से बंदा महान हो जाए कोई जरूरी नहीं प्यारे।

बिन डिग्री भले ही मुझे कोई कित्ता ही 'बे-पढ़ा' या 'बेवकूफ' क्यों न कह ले, मेरी हेल्थ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे डिग्रियां जमा करने का कोई शौक नहीं है, तो नहीं है। डिग्री लेने से कहीं बेहतर है, बिन डिग्री रहना। कम से कम लोगों को हर डिग्री के बारे में विस्तार से बताना तो नहीं पड़ेगा। खुद की तारीफ खुद करना मुझे बचपन से पसंद नहीं। तारीफ सफलता में सबसे बड़ा रोड़ा होती है। तारीफमय जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है प्यारे।

जिंदगी का सुख 'लो-प्रोफाइल' बने रहकर ही उठाया जा सकता है।

आजकल डिग्री को लेकर देश की राजनीति में जो सीन बना हुआ है वो बेतुका है। जो लोग प्रधानमंत्री से डिग्री का हिसाब-किताब मांग रहे हैं, वो खुद कित्ते डिग्री-संपन्न हैं, बताएंगे। देश-समाज-जनता के बीच नेता की पहचान उसके काम से बनती है नाकि डिग्रियों का खुलासा करने से। जनता वोट काम पर देती है, डिग्री पर नहीं।

मैं तो कल भी डिग्री के झंझट से दूर था, आज भी हूं। और हमेशा ही रहूंगा। अगर डिग्रियां बोटरने के चक्कर में लगा रहता तो शायद वो नहीं होता जो आज हूं। हैप्पी।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विलुप्त होते दौर में - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

J.L. Singh Singh ने कहा…

अच्छा लगा पढ़कर! डिग्री का क्या करना है!