सोमवार, 30 मई 2016

ब्रेड न खाऊं तो क्या खाऊं

मुझे न केवल ब्रेड खाना पसंद है बल्कि खरीदकर लाना तो और भी। मेरे कने जब कुछ खास खरीदने के तईं नहीं होता, तो ब्रेड खरीद लेता हूं। ब्रेड खरीदने में मुझे 'आत्मिक सुख' की प्राप्ति होती है। किंतु इधर जब से पत्नी की निगाह से ब्रेड में कथित 'पोटेशियम ब्रोमेट' रसायन की खबर गुजरी है, मेरा न सिर्फ ब्रेड खाना, खरीदना यहां तक कि उसकी तरफ देखना तक बंद करवा दिया है। पत्नी ने साफ शब्दों में हड़का दिया है, खबरदार आज से घर में ब्रेड दिखी या चर्चा भी हुई तो तुरंत 'तलाक' ले लूंगी।

इस वक्त मरता क्या न करता वाली स्थिति में हूं। न ब्रेड खाना छोड़ सकता हूं, न पत्नी को। पत्नी को कित्ता समझाया कि ब्रेड खाने से मुझे 'दिमागी ऊर्जा' मिलती है। लेखन के वास्ते नए-नए विचार मन में आते हैं। न सिर्फ सांसों में बल्कि नसों तक में 'शुद्धता' का एहसास जागता है। जित्ता रोटी-चावल खाने से पेट नहीं भरता, उत्ता ब्रेड खाके भर जाता है।

मगर पत्नी है कि कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। उसे तो ब्रेड इस वक्त अपनी 'सौतन' टाइप लग रही है। हर पल उसकी आंखें मेरी ही स्कैनिंग करती रहती हैं, कहीं मैं चोरी-छिपे ब्रेड तो नहीं ठूस रहा।

जबकि पत्नी नहीं जानती कि 'पोटेशियम ब्रोमेट' से कहीं अधिक खतरनाक रसायन तो इंसानों के दिलों में भरा पड़ा है। दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला में जांच करवा लीजिए, इंसानी दिलों में भरी नफरत-टुच्चई के रसायन की मात्रा औकात से कहीं ज्यादा मिलेगी। ऐसे में, ब्रेड में मिला रसायन भला क्या असर करेगा? हकीकत तो यह है कि इंसान की सेहत पर अब किसी भी प्रकार का 'हानिकारक रसायन' प्रभाव नहीं डालता। इंसान रसायनों को निगलने का आदी हो चुका है। खामखां का हल्ला है, ब्रेड में 'पोटेशियम ब्रोमेट' का पाया जाना।

अमां, जब इंसान का मन ही 'शुद्ध' न रहा तो खाने-पीने की चीजों में मिलावट उसका क्या बिगाड़ लेगी? ब्रेड और मैगी मत खाओ, कोड ड्रिंक और आरओ का पानी मत पियो; कहां तलक किस-किस से बचते फिरेंगे। पूरी दुनिया ही मिलावट के दम पर टिकी है प्यारे।

मैं तो कहता हूं, खाने-पीने की चिंता छोड़के आदमी को एकदम मस्त रहना चाहिए। ज्यादा शुद्ध चीजें पेट और सेहत का हाजमा ही बिगाड़ती हैं।

आदमी जैसे कैंसर होने के बाद भी जीने की उम्मीद नहीं छोड़ता, ठीक इसी तरह, मिलावटी चीजों में भी शुद्धता की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। ये ब्रेड बंद हो गई तो क्या कल को बाबाजी अपनी 'स्वदेशी ब्रेड' ले आएंगे। फिकर छोड़ें, ब्रेड खाएं।

मंगलवार, 24 मई 2016

मियां की बेचैनी

मियां आज सुबह-सुबह ही आ धमके। न दुआ, न सलाम। न चेहरे पर मुस्कुराहट, न हाथ में छड़ी। धम्म से सोफे पर पसर गए। हाथ में थामा हुआ अखबार मेरे तरफ फेंकते हुए बोले- 'अमां, देख रहे हो समाज में क्या-क्या हो रहा है? आंख का पानी तो बहुत पहले मर गया था, अब तो दिलों से डर भी जाता रहा।' मैंने मियां द्वारा मेरी तरफ फेंके अखबार को हाथ में लेते हुए खबर को पढ़ा। खबर थी कि एक बीवी अपने सोते हुए शौहर की आंखों में फेवीक्विक लगाके किसी के साथ चंपत हो ली।

खबर पर पहले तो लंबी-चौड़ी हंसी हंसा। फिर मियां की तरफ मुखातिब हुआ- 'अमां, कैसी-कैसी मजेदार खबरें पढ़ते रहते हो। इसमें इत्ता अचंभा या अजूबा क्या है? गली-मोहल्ले, शहर-गांव में ऐसे मसले अब आम हो लिए हैं। हर दूसरे दिन अखबार में किसी न किसी बीवी या शौहर की खबर आ ही जाती है, जो इसके या उसके संग भाग गई या भाग गया। इस उम्र में इत्ती 'टेंशन' नहीं लिया करते मियां।'

इत्ता सुनते ही मियां आग की मानिंद मुझ पर भड़क लिए। मानो अभी ही 'भसम' कर देंगे। 'अमां, यहां किसी का घर उजड़ लिया और तुम्हें मजाक सूझ रही है। बड़े संग-दिल हो यार। बीवी को अगर भागना ही था तो शौहर को जगाकर, उससे बातकर भागती। यह क्या कि उसी आंखों ही चिपका दीं। लाहौल विला कुव्वत। बताओ बीवी को अपने शौहर के साथ ऐसा करना चाहिए भला?'

मसले पर आगे कुछ कहने से पहले मैंने ठंडा मांगवाकर मियां को शांत करने की कोशिश की। होता-होता है, कभी-कभी दिमागी गर्मी सुबह-सुबह ही असर दिखा देती है। ठंडा गटककर मियां जब थोड़ा शांत पड़े तो मैंने उन्हें हल्के-फुल्के मूड में समझाया।

'देखो मियांजान, जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है। नाते-रिश्ते, अपने-सगे अब सिर्फ कहने भर को रह गए हैं। सबकुछ दिन-ब-दिन बदलती तकनीक के साथ बहुत तेजी से बदलता जा रहा है। अमां, ये तो बीवी-शौहर का रिश्ता रहा, यहां तो बाप-बेटे के रिश्ते की कोई गारंटी नहीं ले सकता। जाने कित्ते बेटों ने अपने मां-बाप को जमीन-जोरू के ऐवज में घर-निकाला दे रखा है। और फिर बीवी ने किया तो तुम इत्ता 'भड़क' उठे। यही अगर शौहर करता तो...। तब क्या कहते?'

गर्म पड़े मियां जुबान को ठंडा करते हुए बोले- 'अमां, बात तो सही कर रहो। लेकिन बीवी-शौहर का रिश्ता तो 'विश्वास' की 'बुनियाद' पर ही जमा होता है न। जब वो बुनियाद ही दरकने लगे फिर तो कुछ कहना-सुनना ही बेकार। रिश्ते बेमानी और खोखले हो जाते हैं। अब हमें ही देख लो पिछले चालीस बरसों से एक-दूसरे के दामन को यों थामें हुए हैं मानो कभी छोड़ना ही नहीं। ऊंच-नीच कहां नहीं होती। पर मसले को सुलझाना आना चाहिए। क्या नहीं...।'

'अमां मियां तुम अपनी छोड़ो वो तो भाभीजी की नेक-नीयत की वजह से तुम्हारा रिश्ता बचा हुआ है। वरना, तुम्हारी आशिकी और दिल-फेंक मिजाजी के किस्से तो पूरे मोहल्ले में मशहूर थे।' मैंने मियां से चुटकी ली। इत्ता सुनते ही मियां झट्ट से अपने सोफे से उठकर मेरे कने आ बैठे। और मेरी जुबान पर उंगली रखते हुए चुप रहने को कहने लगे। 'अमां यार, क्या बोले जा रहे हो। कहीं भाभी ने सुन लिया तो इस उम्र में लेने के देने पड़ जाएंगे। जो मसला चल रहा है, उसी पर कायम रहो। इधर-उधर न भटको।'

एक लंबी मगर जोरदार हंसी मैं हंसा और मियां को बोला- 'अब आया न ऊंट पहाड़ तले। इसीलिए कहता हूं, दूसरे पर इल्जाम लगाने या नाराज होने से पहले अपने गिरेबान में जरूर झांक लो।'
मियां ने 'हां' में सिर हिलाया। अपनी बेचैनी को शांत किया। जाते-जाते इत्ता ही बोले- 'वाकई दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। कोई चेहरा बे-दाग नहीं यहां।'

मियां का लाया अखबार वहीं पड़ा रहा। जिसे थोड़ी देर बाद मैंने रद्दी के हवाले कर दिया।

गुरुवार, 19 मई 2016

सूरज की डिग्री का प्रकोप

सूरज का प्रकोप अपने चरम पर है। बिना किसी से दबे, पूरी दबंगाई के साथ वो अपना ताप दिखला रहा है। किसी में इत्ती हिम्मत नहीं कि उसे रोक या टोक भी सके। सब भीगी बिल्ली बने, सूरज का ताप झेलने को 'अभिशप्त' हैं। हालांकि किसी ने सूरज पर डिग्री दिखाने का 'प्रेशर' नहीं डाला, मगर वो फिर भी दिखा रहा है।

सूरज की 'तीक्ष्ण डिग्री' को देखना या झेलना हमारे तईं मुसीबत से ज्यादा मजबूरी है। हम चाहकर भी इससे बच नहीं सकते। ताप से बचने के लिए चाहे किसी कोने में जाकर क्यों न बैठ जाएं, डिग्री की आग हमें झुलसा ही जाती है। कभी-कभी तो एक ही सांस में जाने कित्ती दफा मैं सूरज और पारे को 'गरिया' देता हूं मगर क्या फायदा? लौटकर गालियां मुझे ही पड़ती हैं। उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

एक तरफ सूरज का ताप है तो दूसरी तरफ बत्ती का खेल। कब में आएगी। कब में जाएगी। कित्ता रूलाएगी। कित्ती तड़पाएगी। कुछ नहीं कहा जा सकता। बादशाहों की तरह बत्ती भी अपनी मर्जी की मालकिन है। इंजीनियर की जाने दीजिए, बत्ती पर तो न सरकार न मुख्यमंत्री किसी का जोर नहीं चलता। केवल कागजों में ही भरपूर बत्ती देने के जुमले दर्ज होते रहते हैं।

सूरज के ताप को कम करने के वास्ते एकाध दफा अपने घर पर यज्ञ-हवन भी करवा चुका हूं। पर, सूरज की डिग्री है कि टस से मस नहीं होती। आजकल रात-दिन जीना, खाना-पीना, टहलना, सोना सबकुछ मुहाल किया हुआ है। डिग्री पर ऐसा सनिचर आकर बैठा है कि 45-47 से नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। जाड़ों में जिन सूर्य देवता के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं, गर्मियों में अतिथि से भी कहीं ज्यादा मजबूती से आकर जम गए हैं।

हां, ठंडे का कारोबार करने वाले सूरज की डिग्री की तपिश से अति-प्रसन्न हैं। रात-दिन यही दुआएं करते रहते हैं कि डिग्री अपनी हदें पार करती रहे ताकि उनका धंधा चमचमाता रहे। आजकल बंदा रोटी-दाल से कहीं अधिक तो आईसक्रीम खा और कोल्ड ड्रिंक पी रहा है। सब सूरज की डिग्री की माया है।

वैसे तो हमारे समाज से लेकर राजनीति और साहित्य में एक से बढ़कर एक 'सूरमा' मौजूद हैं मगर किसी में इत्ती हिम्मत नहीं है कि वो सूरज से अपनी डिग्री को दायरे में रखने को कह सके। क्या सब के सब कागजी शेर हैं? असली बात तो तब है, जब भीड़ में से कोई रजनीकांत निकलकर सामने आए और सूरज को अपनी मानमानी करने से रोक सके। बाकी बातें हैं, बातों का क्या!

मंगलवार, 17 मई 2016

बोतल में बंद हवा

हवा पर हवा का 'अधिकार' नहीं रहा। हवा अब इंसान के 'नियंत्रण' में आ गई है। इंसान ने हवा की 'आत्मा' को बोतल में कैद कर बेचना शुरू कर दिया है। जी हां, अब हवा भी बाजार में बिकने को तैयार है। जिस प्रकार सील्ड बोतल में पानी भरकर बेचा जाता है। ठीक उसी तरह अब हवा को भी बोतल में बंदकर बेचा जाएगा।

विदेशों में लोग प्राकृतिक हवा के बदले बोतल की हवा लेना अधिक पसंद कर रहे हैं। कारण, प्राकृतिक हवा विषैली हो चुकी है। सांस के लिए तमाम तरह की बीमारियां पैदा कर रही है। तो होशियार लोगों ने सोचा क्यों न कनाडा के पहाड़ों की हवा को बोतल में बंद कर बेचा जाए। आडिया अच्छा है। यों भी, इंसान की खोपड़ी का कोई भरोसा नहीं होता, कब क्या खोजकर सामने ले आए।

कनाडा की कंपनी अब भारत में बोतल में हवा के मार्केट को विस्तार देने की जुगाड़ में है। मगर बोतल में मौजूद हवा भारत के पहाड़ों की नहीं कनाडा के पहाड़ों की होगी। लीजिए, अब भारत के पहाड़ इस लायक भी नहीं रहे कि शुद्ध-ताजी हवा दे सकें। इसमें पहाड़ों को क्या दोष देना, हमीं ने उनकी हवा के टेस्ट को जहरीला बना दिया। फिर रोते फिरते हैं कि हाय! हवा बहुत प्रदूषित हो गई है। किस्म-किस्म की बीमारियां पैदा कर रही है।

लेकिन पानी के बाद हवा का कारोबार हमसे, जरा-बहुत बचा प्राकृतिक हवा का सुख, भी छीन लेगा। पानी का तो बंटा-धार हमने कर ही दिया है। गली-मोहल्ले में चल रहीं पानी स्पलाई की दुकानें मस्त मुनाफा पीट रही हैं। देखा-देखी यही सब अब हवा के करोबार में भी आ जाएगा। हवा की बोतल खरीदकर जित्ती जरूरत हो उत्ती सांसों में भर लो। बाकी अगली बार के लिए छोड़ दो। वाह! क्या कमाल का आइडिया निकाला है बंदे ने।

बोतल में हवा के कॉसेप्ट को मार्केट में डेवलप होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। देश-समाज में ऐसी अजीबो-गरीब चीजें बहुत जल्दी अपनी जगह बना लेती हैं। बहुत से लोग तो बोतल वाली हवा केवल यह देखने के लिए ही खरीदेंगे कि इनहेल करने में कैसा महसूस होता है। सांस को कित्ती राहत पहुंचती है। आज टीवी पर जैसे डियो, कोल्ड-ड्रिंक्स आदि के एड आते हैं, हो सकता है, कल को बोतल में हवा के भी आने लगें। बहुत संभव है, हमारे देश की कोई मल्टीनेशल कंपनी ही इस मार्केट में उतर आए। बेचने के मामले में हम उस्ताद हैं ही। पानी से लेकर जरूरत पड़ने पर जमीर तक को बेच सकते हैं। बिना किसी समस्या के।

बोतल में हवा कैद कर बेचना अच्छा 'स्टार्ट-अप' भी है। जिन्हें हवाखोरी का खासा शौक है, वे इस बिजनेस में आराम से कूद सकते हैं। हवा को बोतल में बंद करके ही तो बेचना है। हवा चाहे पहाड़ की हो या रेगिस्तान की क्या फर्क पड़ता है। जैसे, पानी का कोई रंग नहीं होता, वैसे ही हवा का भी कोई रंग नहीं। भविष्य में हवा-पानी के रंग की खोज कर ली जाए, कह नहीं सकता। क्योंकि दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं।

फिलहाल, अभी बोतल में हवा का कॉसेप्ट मार्केट में आया है। कल को, एहसासों-जज्बातों को बोतल में बंदकर बेचने का चलन भी आ जाए, कह नहीं सकते। आजकल सब बिकता है। बस बेचने का हुनर आना चाहिए। इसीलिए तो पहले-पहल हवा को बोतल में बंदकर बेचने की खबर पर मुझे कोई 'आश्चर्य' नहीं हुआ। फिजा और धरती में जैसे-जैसे कीटाणुओं की संख्या बढ़ेगी, ऐसे नए-नए तरीके सामने आते रहेंगे। लोग झूठ कहां कहते हैं कि जमाना बदल रहा है।

गुरुवार, 12 मई 2016

लोकतंत्र को बचाने की खातिर

देश के नेताओं के बीच 'लोकतंत्र को बचाने' की जंग-सी छिड़ी हुई है। कोई सड़कों पर निकलकर तो कोई जुबानी तीर चलाकर लोकतंत्र को बचाने के लिए 'प्रयासरत' है। लुत्फ यह है, नेताओं द्वारा लोकतंत्र को बचाने की मुहिम 365 दिन और 12 महीन लगातार चलती रहती है। खासकर, चुनावों के नजदीक आने पर यह और भी तेज हो जाती है।

लोकतंत्र को बचाने के लिए नेताओं का 'जोश' देखते बनता है! अक्सर मेरा ही सीना गर्व से फुलकर 56 इंच पार कर जाता है। यह हमारे देश और जनता का 'सौभाग्य' है कि उसे लोकतंत्र बचाने वाले ऐसे 'जुझारू नेता' मिले! वरना तो सब अपने-अपने में लगे रहते हैं। अगर किसी नेता के घपले-घोटाले का खुलासा होता है न तब भी मैं यही समझता हूं कि बंदा जरूर लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की परपंरा को बचाने में लगा होगा। वाकई बड़ा काम है लोकतंत्र को बचाना।

न न ऐसा कतई न समझिएगा कि मैं- बतौर लेखक- लोकतंत्र को बचाना नहीं चाहता। मैं खुद दिल से चाहता हूं कि हमारा लोकतंत्र बचा रहे। मगर थोड़ा कन्फ्यूज-सा हो जाता हूं कि लोकतंत्र को बचाऊं तो कैसे? देखिए, नेताओं कने तो ताकत और सुविधाएं हैं भिन्न-भिन्न तरीकों से लोकतंत्र को बचाने की। कभी जुमलेबाजी का सहारा लेकर, कभी सरकार बनाकर तो कभी बनी-बनाई सरकार को लुढ़काकर, कभी इतिहास के पन्ने बदलकर, कभी मुफ्त में चीजें बांटकर वे लोकतंत्र को बचाने में लगे रहते हैं।

मगर मेरे कने तो ले-देके एक कलम ही है। (अब कलम भी कहां रही। जब से की-बोर्ड चलन में आया है। बेचारी कलम तो किनारे है।) जब भी कलम से लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करता हूं, कलम टूट जाती है। हालांकि देश को आजाद करवाने में कलम की बहुत बड़ी भूमिका रही है। लेकिन क्या कीजिएगा, समय के साथ सबकुछ बदल जाता है। अब लेखकों की कलमों में वो ताकत भी कहां रही। अधिकतर तो अपने-अपने सम्मान-पुरस्कार के लोकतंत्र को बचाने में ही व्यस्त रहते हैं।

फिर भी, कभी-कभी सोचता हूं तो यह प्रश्न खोपड़ी में हल्ला मचा देता है, क्या वाकई हमारा लोकतंत्र इत्ता खतरे में है कि उसे बचाने के तईं नेता-बुद्धिजीवि सड़कें नाप रहे हैं? क्या नहीं लगता कि लोकतंत्र से कहीं ज्यादा खतरे में तो पानी है? उसे बचाने की खातिर क्यों नेता-बुद्धिजीवि सड़कों पर नहीं निकलते?

यह भी है, लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर निकलेंगे तो हर अखबार-टीवी चैनल पर फोटू आएगी। पानी को बचाने से क्या मिलेगा? इत्ती गर्मी में बेचारे पसीना-पसीना और हो जाएंगे।

लोकतंत्र कभी-कभी सोचता जरूर होगा, कैसे अहमक लोग हैं एक बचे-बचाए 'स्तंभ' को बचाने में लगे पड़े हैं।

बुधवार, 11 मई 2016

डिग्री पर बवाल

डिग्री न हुई, नई-नवेली बहू का पल्लू हो गया। जरा-सा सरका नहीं कि बवाल-दर-बवाल। डिग्री पर बवाल भी ऐसा मचा है कि न थमने में आ रहा है, न सिमटने में। कथित ईमानदार पार्टी के नेताओं ने तो मानो तय कर लिया है कि डिग्री पर बवाल के पारे को यों ही चढ़ाए रखेंगे। उनके तईं पानी, सूखे की समस्या से कहीं ज्यादा जरूरी डिग्री का मसला है।

यों, सुनने में ईमानदारी शब्द बड़ा 'प्राउड' टाइप 'फील' देता है। मगर असलीयत बरतने पर ही पता चलती है। सरकार के न बनने से पहले ईमानदार मुखिया का हाल भी लगभग यही था। हम राजनीति में आए ही इसलिए हैं ताकि दूसरों को राजनीति करना सीखा सकें। जब आ गए तो कुछ और नहीं डिग्री की राजनीति करना सबको सीखा रहे हैं। ईमानदार व्यक्ति के साथ सबसे बड़ा लोचा यही होता है कि वो अपने आगे हर किसी को 'फर्जी' और 'चोर' समझता है।

चारों तरफ डिग्री-डिग्री के शोर में महत्त्वपूर्ण मुद्दे दब गए हैं। या कहूं, जानकर दबा दिए गए हैं। करना भी क्या है महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाकर। मुद्दे महत्त्वपूर्ण तब ही तलक रहते हैं, जब तलक जनता का वोट पेटी में बंद नहीं हो जाता। पेटी खुलते ही नेता की किस्मत चमक और जनता की फीकी पड़ जाती है। इन दिनों यही सीन चल रहा है। विपक्ष और सरकार दोनों ही तरफ से। डिग्री टाइप बेतुके विवाद पैदाकर ईमानदारों के मसीहा मानो ठाने बैठे हैं, न खुद काम करेंगे, न किसी को करने देंगे।

बहुत अच्छा हुआ जो मैं ईमानदार न हुआ। उससे भी अच्छा यह हुआ कि मेरे कने डिग्री नहीं है। आजकल दोनों ही चीजें जान को बवाल बनी हुई हैं। मैं तो कहता हूं, नौकरियों में से डिग्रियों की महत्ता खत्म ही कर देनी चाहिए। न डिग्री होगी, न बवाल कटेगा। मानो, प्रधानमंत्री के पास डिग्री होने या न होने पर ही देश और राजनीति की बुनियाद टिकी हो!

चलो नेताओं का तो समझ में आता कि उन्हें 'डिग्री' हो या 'असहिष्णुता' बखेड़ा खड़ा करने में मजा आता है। मगर जब मीडिया उनके सुर में सुर मिलाने लग जाता है, तो दिमाग की हटने लगती है। चैनलों पर सारा-सारा दिन डिग्री के बहाने, अलां-फलां पार्टियों के नेताओं का जमझट लगाकर, आपस में तू-तू, मैं-मैं होती रहती है। कौन क्या बोल रहा है, पल्ले ही नहीं पड़ता। सब एक-दूसरे पर आस्तीने चढ़ाए (मौखिक) हमला करने को तैयार बैठे रहते हैं।

अब तो ऐसा लगने लगा कि हमारे देश में 'प्रधानमंत्री की डिग्री' विश्व की सभी बड़ी समस्याओं में से एक हो गई है। अगर यह समस्या न होती तो आज हमारा देश विकास के पथ पर सरपट-सरपट भाग रहा होता!

नेताओं ने राजनीति को 'कॉमेडी सर्कस' में तब्दील करके रख दिया है। ऐसे-ऐसे अंड-बंड मुद्दे उठाकर ले आते हैं कि जनता भी अपना माथा पिट लेने के बाद यह जरूरी बोलती होगी- बेकार ही इन्हें वोट दिया। फिलहाल, कोई चारा नहीं। जब वोट दिया है, झेलना तो पड़ेगा।

केवल मनोरंजन के लिए डिग्री पर मचा बवाल अच्छा है। किंतु देश और राजनीति की सेहत के लिए बहुत खराब। कहना कठिन है, नेताओं को यह बात किस जन्म में समझ आएगी।

सोमवार, 2 मई 2016

डिग्री से दूरी भली

पढ़ाई और डिग्री से मुझे बचपन से ही 'एलर्जी' रही है। मैंने पढ़ाई भी उत्ती ही की, जित्ती से रोजी-रोटी की जुगाड़ बन जाए। अतिरिक्त पढ़ाई में न मेरा मन लगा, न कभी अधिक पढ़-लिखकर 'इंटेलिजेंट' बनने की कोशिश ही की। किताबी पढ़ाई से मैं वैसे ही दिल चुराया करता था, जैसे वेजीटेरियन नॉन-वेज खाने में अलसाता है। कभी-कभी ज्यादा पढ़ाई-लिखाई भी काबिलियत पर बोझ बन जाती है।

इसीलिए मैंने अपने कने कभी कोई डिग्री नहीं रखी। हालांकि एकाध बार दिल करा भी कि जाकर अपनी डिग्री ले आऊं मगर बीच में यह सोचकर रूक गया, क्या फायदा अधिक कागज-पत्रर जोड़कर। कल को कहीं गुम हो गई तो दोबारा पाने के लिए विश्वविद्यालय के बाबू की 'खुशामत' करते फिरो। यों, पढ़ाई से लेकर लेखन तक मैंने कभी किसी की खुशामत नहीं की।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि डिग्रियां काबिलियत की पहचान नहीं होतीं। डिग्री लेना उत्ता ही आसान होता है, जित्ता कवि बनकर कविता करना। ऐसा न जाने कित्ते ही लोग से मेरा वास्ता पड़ा है, जिनके कने बड़ी से बड़ी डिग्रियां तो खूब थीं किंतु जमीनी स्तर पर नील-बटा-सन्नाटा रहे। केवल किताबें पढ़कर या डिग्रियां जुटाकर कोई काबिल नहीं बन जाता। काबिल बनने के लिए खुद की समाज से जान-पहचान बहुत जरूरी होती है।

कुछ लोग तो केवल डिग्रियां बटोरने के लिए ही पढ़ाई-लिखाई किया करते हैं। फिर उन डिग्रियों का वर्णन अपने बायो-डाटा या लैटर-हेड में इत्ती प्रमुखता से करते हैं कि पढ़ने वाले की खोपड़ी भन्ना जाए। इन कथित डिग्रीधारकों से एक दफा क, ख, ग सुन लीजिए। पूरी हकीकत सामने आ जाएगी। जो बंदा अपनी पढ़ाई-लिखाई की डींगे खुद ही मारना शुरू कर दे समझ लीजिए उसकी डिग्री में खोट है।

दुनिया में ऐसे-ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनके कने कोई ऊंची-बड़ी डिग्री नहीं थी। फिर भी, दुनिया-समाज को उन्होंने जो दिया, उसकी मिसालें आज हर जगह दी जाती हैं। कबीर, बाबा बुल्लेशाह, कमाल पाशा आदि के पास डिग्रियां नहीं थीं मगर उन्होंने दुनिया को जो संदेश दिया उसमें 'दम' था। कमाल यह है कि कथित डिग्रीधारक भी इन महापुरुषों के कथनों के गुणगान किया करते हैं। तरह-तरह की डिग्रियां पा लेने से बंदा महान हो जाए कोई जरूरी नहीं प्यारे।

बिन डिग्री भले ही मुझे कोई कित्ता ही 'बे-पढ़ा' या 'बेवकूफ' क्यों न कह ले, मेरी हेल्थ पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे डिग्रियां जमा करने का कोई शौक नहीं है, तो नहीं है। डिग्री लेने से कहीं बेहतर है, बिन डिग्री रहना। कम से कम लोगों को हर डिग्री के बारे में विस्तार से बताना तो नहीं पड़ेगा। खुद की तारीफ खुद करना मुझे बचपन से पसंद नहीं। तारीफ सफलता में सबसे बड़ा रोड़ा होती है। तारीफमय जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है प्यारे।

जिंदगी का सुख 'लो-प्रोफाइल' बने रहकर ही उठाया जा सकता है।

आजकल डिग्री को लेकर देश की राजनीति में जो सीन बना हुआ है वो बेतुका है। जो लोग प्रधानमंत्री से डिग्री का हिसाब-किताब मांग रहे हैं, वो खुद कित्ते डिग्री-संपन्न हैं, बताएंगे। देश-समाज-जनता के बीच नेता की पहचान उसके काम से बनती है नाकि डिग्रियों का खुलासा करने से। जनता वोट काम पर देती है, डिग्री पर नहीं।

मैं तो कल भी डिग्री के झंझट से दूर था, आज भी हूं। और हमेशा ही रहूंगा। अगर डिग्रियां बोटरने के चक्कर में लगा रहता तो शायद वो नहीं होता जो आज हूं। हैप्पी।