गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

अरहर की दाल के तेवर

भारत माता की जयकारों के बीच अरहर की दाल ने अपने 'तेवर' दिखाना शुरू कर दिए हैं। डेढ़ सौ के पार पहुंच गई है। सरकार कह रही है, ऐसा जमाखोरों की वजह से हुआ है। जमाखोरों पर नकेल कसने का सरकार ने 'आश्वासन' दिया है। ऐसे लुभावने आश्वासन पहले भी मिलते रहे हैं। कुछ दिनों असर दिखने के बाद, फिर वही 'ढाक के तीन पात' हो जाते हैं।

चूंकि अरहर की दाल मेरी 'औकात' से बाहर जा चुकी है, इसलिए मैंने इसे 'न' खाने का निर्णय लिया है। कोई पंडित ने थोड़े न बताया है कि अरहर की दाल खाना ही है। अरहर की दाल के अतिरिक्त तमाम चीजें बाजार में उपलब्ध हैं, उन्हें खाएं। वैसे भी, महंगाई की मार हर चीज पर समान पड़ रही है पर क्या करें पापी पेट को भरा-पूरा रखने के लिए कुछ 'समझौते' तो करने ही पड़ेंगे न।

दाल, चीनी या सब्जी के महंगा होने का ठिकरा हम सरकार पर तो आसानी से फोड़ देते हैं लेकिन सरकार बेचारी भी क्या करे, जब मौसम ही दगा दे जाए। मौसम पर तो न सरकार का बस है न रघुराम राजन का। देखिए न, इस वक्त लगभग आधे देश में पानी और सूखे से त्राहिमाम मचा हुआ है। न लोगों के पास पीने को पानी है न नहाने को। फिर भी, सरकार जुगाड़-तुगाड़ कर जल-आपूर्ति कर ही रही है। उधर, मौसम के सर पर जूं तक न रेंग रही। कुछ राज्यों में तो सूखे के हालात बद से बदत्तर हुए जा रहे हैं। अब इसमें सरकार क्या करें?

अरहर की दाल के महंगा होने के लिए एंवई सरकार को 'कोसने' से क्या फायदा। हमारा खुद पर कंट्रोल होना चाहिए कि हम दाल खाएं ही नहीं। चीनी चखें ही नहीं। सब्जी खरीदें ही नहीं। पानी पीएं ही नहीं। खुद पर कंट्रोल बड़ी चीज है। मुझे ही देख लीजिए, जब से अरहर की दाल और चीनी के दाम आसमान छूने लगे हैं, मैंने तो खाना ही छोड़ दिया है। आजकल केवल 'हवा' खाकर ही काम चला रहा हूं। जो सुख मुफ्त की हवा खाने में है, वो किसी में नहीं।

वैसे, ये सब कहने-गाने की बातें हैं कि महंगाई बढ़ रही है। गुजर-बसर मुश्किल से हो पा रहा है। इत्ती महंगाई में भी हर आदमी अपने हिसाब से जी रहा है। चाहे कम खाए लेकिन खा रहा है। चाहे कम करे लेकिन अपने शौक भी पूरे कर रहा है। ऐसा भी नहीं है कि अरहर की दाल के डेढ़ सौ पार निकल जाने पर कोई उसे खाएगा ही नहीं। जिनकी अंटी में नोट हैं, वे खाएंगे। जिनकी में नहीं हैं, वे कुछ और खाकर गुजारा करेंगे।

जीवन और घर-परिवार की गाड़ी चलती रहनी चाहिए, चाहे जैसे चले।

अरहर की दाल के उछाल पाते ही लोगों में खुसर-पुसर शुरू हो गई है। सबसे ज्यादा बेचैन खबरिया चैनलस हैं। बेचारी दाल पर यों पील पड़े हैं मानो उसका कचूमर निकालकर ही दम लेंगे। अपने इर्द-गिर्द पांच-सात लोगों की भीड़ जमा कर शुरू हो जाते हैं, कभी सरकार तो कभी जमाखोरों को कोसने। लेकिन आज तलक मैंने किसी मीडिया वाले को यह कहते नहीं सुना कि दाल, चीनी या सब्जी के महंगा होने के कारण, वे उसे खाना छोड़ रहे हैं। सो, उनकी पहली पसंद दाल की होगी।

अरहर की दाल कोई पहली दफा थोड़े न महंगी हुई है, जो 'सियापा' किया जाए। महंगाई-सस्ताई तो चलती रहती है। महंगाई के हिसाब से खुद को 'एडजस्ट' करने में ही समझदारी है। वरना यों ही कोसते रहिए कभी सरकार, कभी जमाखोरों को। फर्क किसकी सेहत पर क्या पड़ना है!

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

फर्क तो सब पर ही पड़ता है। हाँ ये बात अलग है की किसी पर ज्यादा तो किसी पर कम लेकिन दाल सबकी पतली कर देती हैं महंगाई। .

बहुत बढ़िया