बुधवार, 27 अप्रैल 2016

गर्मी और परेशानी

लोगों ने परेशान रहने को अपनी आदत बना लिया है। हर वक्त किसी न किसी बात पर परेशान मिलते हैं। लाइफ में थोड़ी-बहुत परेशान चलती है। लेकिन परेशानी को गहना बनाकर गले में टांगे रहना कहां की 'अक्लमंदी' है?

आजकल कुछ नहीं तो लोग गर्मी से परेशान हैं। हाय! गर्मी, हाय! गर्मी ऐसे चिल्ला रहे हैं मानो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हों। अखबारों में आए दिन- तापमान के 40-45 डिग्री के पार निकल जाने की खबरें- गर्मी की तीव्रता को और बढ़ा रही हैं। जाहिर-सी बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो क्या दिसंबर-जनवरी में पड़ेगी। जब गर्मी है तो गर्मी को झेलना भी सिखिए। गर्मी के लिए गर्मी को गरियाते रहना भला कहां की 'इंसानियत' है!

जिस प्रकार इंसान के स्वभाव का कुछ पता नहीं रहता, ऐसा ही नेचर गर्मी का भी है। किसी साल अधिक पड़ जाती है। किसी साल कम। कह जा रहा है, इस साल की गर्मी ने पिछले कई सालों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। अच्छा ही है न। गर्मी अधिक पड़ेगी तो ठंडे का कारोबार बढ़ेगा। एसी, कूलर, पंखे भारी मात्रा में बिकेंगे। सर्दी कम पड़ने से व्यापारियों को जो 'दर्द' मिला था, थोड़ा कम होगा। हमेशा अपने बारे में ही नहीं, कभी-कभी दूसरों के बारे में भी सोच लेना चाहिए।

सच कहूं, मुझे सर्दियों से कहीं अधिक गर्मियां भाती हैं। लाइफ को जीने का असली मजा आता गर्मियों में ही है। एक तो शरीर पर कम कपड़ों का बोझ, दूसरा कंबल, हिटर से मुक्ति। गर्मियों में जित्ता दिल करे उत्ता नहाओ। मैं तो चाहता हूं, साल भर गर्मियां ही गर्मियां पड़ा करें ताकि ठंड की मार से आजादी मिल सके।

बत्ती न आने पर हाथ से पंखा झेलने का सुख ही अद्भूत है। मुझे बड़ा अच्छा लगता है, जब मेरे इलाके में पूरा-पूरा दिन बत्ती नहीं आती। भीषण गर्मी में बत्ती का इंतजार करने में जो आनंद मिलता है, वो प्रेमिका के इंतजार में भी नहीं मिलता। खासकर, बत्ती जब चमक कर चली जाए और घंटों-घंटों न आए। कसम से उस वक्त सरकार और बिजली विभाग के लिए मेरे दिल से लाखों-लाखों दुआएं निकलती हैं।

लोग हैं कि इत्ते में ही परेशान हो जाते हैं। कभी हाय! गर्मी तो कभी हाय! बत्ती का रोना रोते हैं। सीधा-सा फंडा है, गर्मियों में बिजली की खपत ऑटोमेटिक बढ़ जाती है, ऐसे में बत्ती कम या न के बराबर ही आएगी। कम बत्ती में गुजारा कीजिए न। क्या दिक्कत है। जरा उनसे पूछिए, जहां बत्ती है ही नहीं। वे आज भी बिजली के तारों के पड़ने का इंतजार कर रहे हैं।

निरंतर रोते या परेशान रहने से कुछ नहीं मिलना प्यारे। परेशानियों के साथ एडजस्ट कीजिए। लोग मानेंगे नहीं लेकिन गर्मियां हमें मैनेजमेंट और एडजस्टमेंट का बहुत उम्दा पाठ पढ़ाती हैं। बिन बत्ती, बिन पानी, बिन हवा, बिना एसी कैसे खुद को वातावरण के अनुरूप ढाला जाए गर्मियां बहुत अच्छे से सिखाती हैं।

हां, उन लोगों का कुछ नहीं हो सकता, जो धरती पर आए ही परेशान रहने के लिए हैं। उन्हें विश्व की चाहे कित्ती ही सुख-सुविधाएं क्यों न मिल जाएं, वे रहेंगे परेशान ही। इसीलिए उन परेशान आत्माओं पर से अपना ध्यान हटाएं और भीषण गर्मी को एंजॉव्य करें।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मुद्दे उछले या कि उछले जूते - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Kavita Rawat ने कहा…

सच है गर्मी का भी अपना ही जलवा है देखो उसे। . हाय तौबा से कुछ नहीं होता।

बहुत सुन्दर