सोमवार, 25 अप्रैल 2016

छप्पन इंची सीना और कोहिनूर

सब जानते हैं, हमारी केंद्र सरकार का सीना छप्पन इंच का है! इस बात का सरकार के प्रत्येक मंत्री व संतरी को 'खासा गुमान' भी है। स्वयं प्रधानमंत्रीजी अपने छप्पन इंची सीने की 'वीरता' पर चुनावी सभाओं में कसीदे भी गढ़ चुके हैं। इस सब के बावजूद, केंद्र सरकार ब्रिटेन पर कोहिनूर को लेकर दावा 'मजबूती' से पेश नहीं कर पा रही।

जबकि ब्रिटेन को हमारी केंद्र सरकार का छप्पन इंची सीना देखकर खुद ही कोहिनूर को 'सरेंडर' कर देना चाहिए था! भला छप्पन इंची सीने के आगे किस देश की इत्ती मजाल कि दो पल भी ठहर सके! यह कोई जुमलेनुमा हवा से फुला हुआ छप्पन इंची सीना नहीं, कई सालों की अथक मेहनत का नतीजा है।

मुझे जानकर थोड़ा अटपटा-सा लगा कि केंद्र सरकार 150 हजार करोड़ के कोहिनूर पर अपना दावा, यह कहते हुए कि तोहफे में दिया गया था, छोड़ने का फैसला लिया है। तोहफे में दिया गया था तो क्या हुआ; है तो हमारा ही। इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए, सबसे ज्यादा समय कोहिनूर हमारे शासकों के पास ही रहा। कोहिनूर की जड़ें तो हमारे ही मुल्क में जमी हुई हैं। हम ही उसके 'असली हकदार' हैं।

कोहिनूर पाने के लिए इत्ती जल्दी 'हार' मान लेना ठीक नहीं। जब हम कश्मीर के लिए इत्ते लंबे से पाकिस्तान से लड़-जुझ रहे हैं तो क्या कोहिनूर के लिए संघर्ष नहीं कर सकते? यों भी, यह भारतीयों की खूबी रही है कि हम 'गोल्ड' और 'प्रॉपर्टी' जैसे मसलों पर इत्ती आसानी से हार नहीं मानते। यह तो फिर भी कोहिनूर है मियां।

वो तो अच्छा हुआ जो बीच में दखल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपनी याचिका को बनाए रखने को बोला दिया। वरना तो पतंग की डोर हाथ से छूट ही गई होती।

देखिए न, हमारा पड़ोसी पाकिस्तान भी बीच में भांजी मारने का प्लान बना रहा है। उसने भी कोहिनूर पर अफगानिस्तान और ईरान के साथ दावेदारी पेश की है। यह तो 'एक अनार सौ बीमार' वाला मसला हो गया। मतलब, जो चीज हिंदुस्तान को चाहिए वो पाकिस्तान को भी चाहिए। यह ठीक नहीं।

जैसे केंद्र सरकार अन्य मसलों पर अपना सीना हर वक्त छप्पन इंची-सा फुलाए रखती है, इस (कोहिनूर) पर भी वैसा ही रखना चाहिए। आखिर 150 हजार करोड़ का मामला है। चाहे जो हो जाए, कोहिनूर हमारे हाथों से जाना नहीं चाहिए।

कोहिनूर अगर सकुशल भारत वापस आ जाता तो यही भारत माता की असली जय होगी।

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