रविवार, 24 अप्रैल 2016

क्या आपके कने सेल्फी स्टिक है!

वे हमारे मोहल्ले में नए-नए आए हैं। अभी तलक उनसे एकाध दफा ही मुलाकात हो पाई है। पर दिल के 'रंगीन' व तबीयत से 'खुशमिजाज' लगते हैं। अच्छा है।

वे तकनीक के बेहद दीवाने हैं। अपने कने एक लंबा-बड़ा सा स्मार्टफोन रखते हैं। साथ में एक छड़ी भी लिए घूमते हैं। मैंने अक्सर उन्हें उस छड़ी में अपने फोन को फंसाकर फोटूएं लेते देखा है। ऐसी ही एक फोटू उन्होंने मेरे साथ भी ली थी। बताते हैं, खुद से फोटू लेने को 'सेल्फी' कहते हैं।

यों ही, उस दिन वो मुझे पड़ोस के गार्डन में चहलकदमी करते हुए मिल गए। हाथ में उनके फोन के साथ एक छड़ी (मगर ये छड़ी पहले वाली छड़ी से कलर व साइज में थोड़ा भिन्न थी) भी थी। मैंने सोचा, हो सकता है, उनके कने कुत्ते हो, जिसके वास्ते वे छड़ी साथ में लेके चलते हों। मगर बहुत देर तलक जब कुत्ता कहीं नजर नहीं आया। तो मैंने उनसे पूछ ही लिया- 'भाईसाहब, क्या ये छड़ी कुत्ते को हड़काने के काम आती है?'

बेहद बेचारगी भरी नजरों से उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले- 'नहीं.. नहीं.. जी। ये कुत्ते को हड़काने-वड़काने की छड़ी नहीं, ये तो 'स्लेफी स्टिक' है। ये स्लेफी स्टिक ग्रुप टाइप फोटू लेने के काम आती है। या फिर कुछ दूरी बनाकर सेल्फी लेने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। आजकल यूथ में इसका जबरदस्त क्रेज है। हमारे घर में तो ऐसी चार-पांच हैं। सबकी अपनी पर्सनल।'
'ओह! माफी कीजिएगा। यह तो बड़ा ही अद्भूत चीज है- आप अपनी छड़ी से अपनी ही फोटू (यानी सेल्फी) ले सकते हैं।', मैंने कहा।

यों ही, बातों-बातों में उन्होंने मुझसे पूछ लिया- 'क्या आपके कने सेल्फी स्टिक है? एक मिनट तो मैं खामोश रहा। फिर 'न' में सिर हिलाते हुए 'इंकार' कर दिया। इत्ता सुनते ही वे मुझ पर थोड़ा हंसे। फिर बोले- 'क्या बात करते हैं जनाब। आप सेल्फी स्टिक नहीं रखते। अरे हुजूर ये तो आजकल की सबसे अहम जरूरतों में से एक है। जिसके पास स्मार्टफोन हो और सेल्फी स्टिक न हो, पता है, सोसाइटी में उसे 'पिछड़ा' समझा जाता है। सेल्फी स्टिक अब 'स्टेटस सिंबल' है।'

मैंने बेहद धीमे स्वर में उनके 'कहे' में अपनी 'हां' को मिला दिया। वे मुझे आगे बताने लगे कि 'उनके घर में मोबइल से लेकर टीवी तक 'एचडी' है। अभी हाल उन्होंने 'एंडराइड फ्रिज' लिया है। वे कागज के पन्नों वाली किताब नहीं बल्कि किसी डिजिटल मोड (किंडल) पर पढ़ते हैं। शॉपिंग करने के लिए कभी बाजार का झंझट नहीं पालते। सबकुछ ऑनलाइन ही खरीदते-मांगाते हैं। यहां तक कि राशन-पानी भी।'

उनके जाने के बहुत देर बाद तलक मैं सोचता रहा। यार, वाकई कित्ता पिछड़ा हुआ हूं मैं। दुनिया डिजिटल मोड में ढले जा रही है और मैं हूं कि अपने 'आदर्शवाद' से बाहर ही नहीं निकल पा रहा। कित्ता 'यथास्तिवादी' हूं मैं।

मेरा पड़ोस सेल्फी स्टिक से फोटूएं खींच रहा है और मैं अभी भी नोकिया के युग में ही जी रहा हूं। समय के साथ चलने के लिए मुझे न केवल बाहर से बल्कि अंदर से भी बदलना होगा।

यही सब सोच-समझकर मैं तय किया है कि मैं अपने पुराने फोन को कूड़े के ढेर में फेंक कर, अब एक नया स्मार्टफोन विथ सेल्फी स्टिक लूंगा। ताकि अपने पड़ोसी को भी जलता सकूं कि बेट्टा अब मेरे कने भी सेल्फी स्टिक वाला स्मार्टफोन है।

क्यों ठीक है न गुरु...।

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