गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

नाम में कुछ नहीं रखा

किसी शहर या सड़क का नाम बदलना कुछ यों हो गया है जैसे यहां की दीवार को तोड़कर वहां खड़ी कर देना। अरे, नाम ही तो है, चाहे जो रख लो। इसीलिए मैं सबसे कहता हूं, नाम में कुछ नहीं रखा। बंबई को मुंबई कर लो या कलकत्ता को कोलकाता। क्या फरक पड़ता है?

देखिए न, अब से 'गुड़गांव' 'गुरुग्राम' कहलाएगा। हां, शुरू में गुरुग्राम बोलने में थोड़ा अटपटा अवश्य लेगा लेकिन बाद में आदत पड़ जाएगी। जब हमें नेताओं को खोखले वायदों को झेलने की आदत पड़ सकती है, यह तो फिर भी एक नाम है।

जब से गुरुग्राम नाम सुना है, मेरी खोपड़ी इसका अर्थ-मतलब सोचते-निकालते खाली हो गई है। गुरु तो चलो ठीक है मगर ग्राम का क्या कंबिनेशन? क्या गुरु होने के मायने अब ग्राम के हिसाब से तय होंगे? यानी, हमारे गुरु इत्ते ग्राम के और तुम्हारे गुरु उत्ते ग्राम के। इस नाम में गुरु से कहीं वजन ग्राम का दिख रहा है।

नाम बदलने के पीछे तर्क चाहे कित्ते दिए जाएं पर होते सब कुतर्क टाइप ही हैं। सब अपनी-अपनी सुविधाओं की राजनीति है। जिस सरकार या नेता को किसी शहर या सड़क का नाम अपनी 'आस्थानुसार' करना होता है, आराम से कर लेता है। नाम बदल जाने से उस शहर की असली पहचान पर क्या फर्क पड़ेगा, इत्ता सोचने-समझने का समय सरकारों के पास नहीं होता।

गुड़गांव अच्छा नाम है। लेकिन सरकार को गुरुग्राम अधिक पसंद आया, सो रख दिया। इत्ते हाई-टेक शहर का गुरुग्राम हो जाना ठीक वैसा ही है जैसे शहरी लड़की की गांव में शादी कर देना। पुरानी बोतल में नई शराब वो मजा नहीं देती प्यारे।

वैसे शहरों के नाम बदलने का जिक्र जब भी आता है, मैं थोड़ा डर-सा जाता हूं। डर इसलिए जाता हूं इस भेड़चाल में कहीं मेरे शहर का नाम न बदल जाए। चूंकि मेरे शहर में एक पागलखाना है। कहीं मेरे शहर का नाम 'पागलग्राम' न कर दिया जाए! अगर ऐसा हुआ तो मेरे शहर से झुमके का महत्त्व खत्म हो जाएगा।

मुझे आज भी याद है, जब मैंने अपना नाम बदलने का जिक्र घर में किया था। तब पिताजी और चाचाजी ने इत्ती विकट डांट पिलाई थी, इत्ती तो कभी मेरे हाईस्कूल में तीन दफा फेल होने पर नहीं लगी। हालांकि अब भी मुझे अपना नाम पसंद नहीं मगर क्या करूं इसे बदल नहीं सकता। घरवालों पर मेरी ठस्क का दवाब जो नहीं है।

अभी तो एक ही शहर ग्राम में तब्दील हुआ है, उम्मीद है, आगे भी यह सिलसिला चलेगा। शहरों, नगरों, सड़कों की पहचान आगे चलकर शायद किलोग्राम, दर्जन, पाव आदि से होने लगे। जी हां, हमारे यहां कुछ भी हो सकता है। आखिर विकास का चक्र एकतरफा ही क्यों चले।

अच्छा लगेगा अगर फेसबुक अपना नाम 'चेहराग्राम' और टि्वटर अपना नाम 'चिड़ियाग्राम' कर लेंगे। इंस्टाग्राम को 'ग्राम' का खिताब पहले से ही मिला हुआ है। जी-मेल 'जीग्राम' और याहू 'याग्राम' हो जाए।

ग्राम अगर कमायाब रहा हो बच्चों के नाम भी संभवता सुरेशग्राम, राहुलग्राम, अंकितग्राम, पुलकितग्राम हुआ करेंगे। वाकई, जीवन में ग्राम का महत्त्व बढ़ जाएगा। शायद सरकारें भी आगे ग्राम के हिसाब से ही चलें।

गुड़गांव को गुरुग्राम मुबारक। शहर 'गुरु' और 'ग्राम' के बीच संतुलन कैसे बनाएगा, इसका अभी इंतजार करना होगा। लेकिन हां ये साफ है कि नाम में कुछ नहीं रखा है। गुरुग्राम रखो या गुरुड्रम। पूरा जोर नाम के प्रति 'आस्था' पर रहना चाहिए। क्या नहीं...?

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