बुधवार, 20 अप्रैल 2016

कोहिनूर की खातिर

दो दिन से समझा-समझा कर परेशान हूं कि कोहिनूर हमें नहीं मिल सकता।.. नहीं मिल सकता।.. जब ब्रिटेन कोहिनूर भारत को नहीं दे रहा, तो भला हमें कैसे दे देगा? लेकिन पत्नी कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। उसने तो बस एक ही 'जिद' पकड़ रखी है, उसे कोहिनूर चाहिए।

आज ही मुझे 'अलटिमेटम' दिया है, हफ्ते भर में कोहिनूर लाकर मुझे दे दो, तब ही इस घर में रुकूंगी। वरना, रहना अपनी किताबों और लेखन के साथ। मैंने फिर से समझाने की कोशिश की कि कोहिनूर लाना इत्ता आसान नहीं, जित्ता तुम समझ रही हो। न जाने कित्ते टाइप के नियमों-कानूनों और सरकारी झंझटों से निपटना पड़ेगा। और फिर जब अपनी सरकार ही कोहिनूर पर दावा वापस ले रही है, तो भला हम किस खेत की मूली हैं।

पत्नी ने गुस्से से ऊफनते हुए कहा- देखो जी, वो सब मैं नहीं जानती। सरकार दावा वापस ले रही है तो ले। मुझे इससे क्या? सरकार 150 हजार करोड़ के कोहिनूर के लिए कदम पीछे खींच सकती है किंतु मैं नहीं। अपनी चीज को ऐसे ही क्यों जाने दें? तुम कोशिश तो करो। कोशिश करने से क्या नहीं मिल सकता। मुझे पाने के लिए भी तो तुमने कोशिश की थी न। तो ऐसी ही कोशिश मेरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए करो। सिंपल।

कैसी अजीब मुसीबत में फंस गया हूं। न 'हां' कर सकता हूं न 'ना'। मुझ जैसे मामूली लेखक की औकात 100 रुपए किलो की दाल खरीदने की नहीं और पत्नी को 150 हजार करोड़ का कोहिनूर चाहिए! कैसी बेतुकी जिद है। कोहिनूर कोई आटा-चावल है क्या कि बाजार गए और खरीद लाए। अरे, पूरी जिंदगी भी अगर कोशिश करूंगा, तब भी कोहिनूर मेरा नहीं हो सकता।

लेकिन पत्नी को कौन समझाए। जब देखो तब अजीबो-गरीब जिद्दें पालती रहती है। अभी पिछले दिनों जिद करने लगी कि मुझे मंगल पर रहना है। मंगल पर जमीन खरीद लो। वाकई पत्नियों के दिमाग का कोई भरोसा नहीं होता, कब में कौन-सी जिद पकड़ कर बैठ जाएं।

पत्नी कोहिनूर को लाने की बात कर रही है, यहां मैंने कभी हीरा नहीं देखा। वैसे, वो मुझसे हीरा लेने की भी डिमांड कर चुकी है, तब भी बड़ी मुश्किल से मानी थी।

अव्वल तो ऐसा कोई चांस ही नहीं बनता कि कोहिनूर मुझे मिल जाए। अगर खुदा-न-खास्ता मिल भी गया तो क्या सरकार या नाते-रिश्तेदार मुझे चैन लेने देंगे? आयकर विभाग वाले तुरंत नोटिस थमा देंगे, अपनी आय-व्यय का हिसाब-किताब देने को। न जाने कित्ती टाइप की जांचें बैठ जाएंगी मेरे खिलाफ। न जाने किस-किस संगठन से संबंध होने की जानकारियां हासिल की जाएंगी। कोई इत्ता आसान थोड़े न है, कोहिनूर पाना। या अमीर होकर चैन से सोसाइटी में जी-रह पाना। दूसरों को जित्ती खुजली नहीं मचती, उससे कहीं ज्यादा अपनों को मचती है। हाय! इनके पास इत्ता रुपया-पैसा आया कहां से? जरूर नंबर दो की कमाई चल रही है।

जागती आंखों से छोड़िए मैं तो कभी सपने में भी कोहिनूर पाने की बात नहीं सोच सकता। मगर पत्नी है कि उसे कोहिनूर चाहिए। न जाने क्या करेगी इत्ती बेशकीमती चीज का। यों भी, पुराने लोग कह गए हैं कि सोने-हीरे की चीजें हर किसी को नहीं फलतीं। बिना कोहिनूर ही अपनी लाइफ मस्त चल रही है। खामखहा ओखली में क्यों सर देना?

खैर, प्रयासरत हूं पत्नी को समझने के लिए कि वो कोहिनूर को पाने की जिद छोड़ दे। अपने तईं दो वक्त रोटी ही काफी। हालांकि टाइम लगेगा, उसे मानाने में पर मान जाएगी। कोहिनूर लाना अगर इत्ता ही आसान होता तो सरकार से पहले से मैं न ले आया होता!

फिर भी, सरकार से गुजारिश करूंगा कि वो कोहिनूर पर अपना दावा न छोड़े। लगी रहे। साम-दाम-दंड-भेद सब अपनाए। इत्ती कीमती चीज को छोड़ना अकलमंदी नहीं। बाकी सरकार की मर्जी। 

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