सोमवार, 18 अप्रैल 2016

असहमतियां और जूते

लोकतंत्र में असहमतियां और जूते एक साथ चलते हैं। स्पष्टता के साथ कहूं तो जहां असहमतियां होंगी, वहां जूते भी होंगे। इसीलिए असहमतियां और जूते एक-दूसरे के 'पूरक' बन गए हैं। लोकतंत्र में जित्ती तरजीह अब जूतों को मिल रही है, इससे पहले कभी मिली हो, मुझे याद नहीं। किसी वाद या व्यक्ति से असहमति रखने का परिणाम जूता है। क्या करें, दस्तुर ही कुछ ऐसा बन गया है।

जूते की महत्ता ने धैर्य की सीमाओं को तोड़ा है। विड़बना देखिए, जहां जूते नहीं चलने चाहिए, वहां चल जाते हैं। जूता चलाने वाला रातभर में 'सेलिब्रिटी' का खिताब पा जाता है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक में जूता-चलाई का विरोध कम, 'जोक' अधिक बनते हैं। मीडिया में दो-चार दिन जूतम-जूताई पर बहस होती है फिर सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं।

असहमतियों पर बवाल जित्ता अब कटता है, पहले नहीं कटता था। आलम यह है, अगर किसी बड़े नेता या सेलिब्रिटी के मुंह से कुछ असहमति टाइप निकल जाए फिर देखिए सोशल मीडिया पर उसे किस प्रकार 'ट्रोल' किया जाता है। असहमति जताने वाला खुद अपना सिर पिट लेता है, हाय! ये मैंने क्या किया। इससे तो 'चुप्पी' ही भली।

किसी पर जूता-चप्पल चलने, स्याही फेंकने, थप्पड़ मारने की खबर एक बार को 'दुखी' तो अवश्य करती है। प्रश्न भी उठता है कि समाज को ये क्या होता जा रहा है? लेकिन दूसरे ही पल इस बात पर 'संतोष' कर लिया जाता है, बदलते वक्त के साथ असहमति के मायने और व्यवहार शायद बदल गए हैं। असहमतियों पर विरोध अब जूते-चप्पल उछालके ही प्रकट किया जाता है।

यही वजह है कि मैं लोगों से 'न' के बराबर 'असहमति' रखने की कोशिश करता हूं। खामखां, असहमति के नशे में किसी से कोई भूल-चूक हो गई तो। असहमति के चक्कर में मैं किसी का जूता खाना नहीं चाहता। अभी इत्ता बड़ा सेलिब्रिटी नहीं हूं कि जूता खाने का अधिकार मुझे मिले। सेलिब्रिटियों पर उछाले जाने वाले जूतों की बात ही कुछ और होती है।

भले ही ये जूते असहमति या क्रोध-वश उछाले या फेंकने जाते रहे हों, इससे जूतों की सेल में खासा बढ़ोत्तरी दखने-सुनने को मिली हैं। कोई साल भर में मेरे मोहल्ले में ही चार-पांच जूते की दुकानें खुल गईं हैं। सब टनाटन चल रही हैं। साफ है कि जूते की मार्केट-वैल्यू कभी डाउन नहीं हो सकती।

असहमति पर बढ़ते जूतों के प्रभाव ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में अब वे भी अहम हिस्सा रखते हैं। खुलकर किसी पर भी जूते फेंकिए। बंदा बुरा तो मानेगा मगर कुछ देर बाद शांत भी हो जाएगा। पब्लिसिटी का चकसा बढ़ा बुरा होता है प्यारे, जिसे लग जाए वो न जूतों से परहेज करता है, न चप्पलों से।

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (20 -04-2016) को "सूखा लोगों द्वारा ही पैदा किया गया?" (चर्चा अंक-2318) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat ने कहा…

इसके साथ ही जूते-चपलों का विज्ञापन मुफ्त में हो जाता है

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दीपा तुम चमको दीपक सी - ब्लॉग बुलेटिन की शुभकामनाएँ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...