शनिवार, 16 अप्रैल 2016

सेंसेक्स और मानसून

चहचहाता हुआ सेंसेक्स अच्छा लगता है। माहौल में जोश-सा भर जाता है। मातमी चेहरों पर मुस्कुराहट-सी आ जाती है। एक उम्मीद-सी बंधती है, आगे आने वाले दिन बेहतर होंगे। दिनों का बेहतर होना बेहतर समाज, देश, जनता के लिए बहुत जरूरी है।

इसीलिए इस खबर ने कि, इस दफा मानसून के अच्छे रहने के संकेत हैं, सेंसेक्स से लेकर आम आदमी तक को 'दिली-राहत' पहुंचाई है। सबके चेहरे यों खिल उठे हैं मानो घर में शहनाईयां बजने के दिन नजदीक हों। हो भी क्यों न, पिछले बरस मौसम और मानसून ने किसानों पर जो 'कहर' बरपाया, उसकी भरपाई अभी तलक न हो सकी है।

मानसून न केवल किसान बल्कि सेंसेक्स की भी जान है। मानसून ठीक तो किसान खुशहाल। मानसून ठीक तो सेंसेक्स मस्त। मानसून ठीक तो अर्थव्यवस्था चकाचक। मानसून ठीक तो सरकार टेंशन-मुक्त। आधुनिकता का लबादा हमने ओढ़ चाहे कित्ता लिया हो लेकिन जीवन को 'आस' और 'सांस' मिलती मानसून से ही है।

बेहतर मानसून की खबर सुनकर सेंसेक्स का मस्ती में झूमना, यह बताने के लिए काफी है कि वो खुश रहने का कोई पल खोना नहीं चाहता। सेंसेक्स को खुश देखना मुझे अच्छा लगता है। जब सेंसेक्स खुश होता है, तब उससे जुड़े निवेशक भी खुश होते हैं। दो पैसे हाथ में आते भला किसे बुरे लगते हैं। यह सेंसेक्स की खूबी रही है, जब वो देता है तो झप्पर फाड़के। और, जब लेता है तो सारा रस निचोड़के।

मानसून पर इस दफा बहुत कुछ निर्भर है। उन इलाकों को बहुत उम्मीदें हैं, जो सूखे से बेहाल हैं। जहां नहाने की तो जाने दें, पानी पीने के भी लाले पड़े हुए हैं। सरकार सूखे इलाकों को ट्रेन से पानी पहुंचाकर तर करने का प्रयास तो कर रही है। मगर जो काम मानसून कर सकता है, वो न सरकार न नेता न बुद्धिजीवि नहीं कर सकते।

वैसे मानसून इत्ता 'कठोर' पहले कभी रहता नहीं था। ये तो हमने जल, मिट्टी, हवा, पेड़-पौधों का बेइंतहा दोहन कर उसे कठोर बना दिया। सो मानसून भी ऐंठ लिया, जा बेट्टा मैं भी नहीं आता। जी-रह ले चाहे जैसा मन करे।

हालांकि अभी मानसून के बेहतर रहने की खबर ही आई है। उसके आने में अभी वक्त है। लेकिन मैं यह सोच-सोच कर थोड़ा परेशान हूं, कहीं अगर मानसून बेहतर हो गया तो इसका 'क्रेडिट' सरकार लेने की कोशिश करेगी या विपक्ष! न न चौंकिए मत। हमारे नेता और राजनीतिक दल इत्ते 'महान' हैं कि मुद्दा चाहे कोई हो खुद क्रेडिट लेने-देने का संयोग बना ही लेते हैं। हो सकता है, कल को कोई यह न कहने लग जाए कि बेहतर मानसून 'भारत माता की जय' बोलने से आया है। सब माता की महिमा है।

क्रेडिट चाहे कोई ले मगर मुझे मानसून का बेसब्री से इंतजार है। ताकि जाड़ों में खुद से किए वायदे- बरसातों में जरूर नहाऊंगा- को पूरा कर सकूं। नहाने का जो मजा बरसात के पानी में है, वो शावर में नहीं।

तो प्यारे मानसून तुम जल्द से आ जाओ ताकि हमारे साथ-साथ सेंसेक्स भी खुशी के मारे नाच-झूम उठे।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " गुज़रा ज़माना बचपन का - ब्लॉग-बुलेटिन के बहाने " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !