मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

सेलिब्रिटी बनने की चाह

मैं यह अच्छी तरह से समझ चुका हूं कि केवल लेखन के दम पर 'सेलिब्रिटी' नहीं बना जा सकता। सेलिब्रिटी बनने के लिए या तो बदनाम होना पड़ेगा या फिर जूता खाना पड़ेगा। मैं दोनों ही चीजों के लिए तैयार हूं। बदनाम होने को मैं बचपन से गलत नहीं समझता था। और, जूता खाने को अब गलत नहीं मानता। मतलब 'फेम' मिलने से है, चाहे जैसे या जहां से भी मिले।

यों तो मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक बदनाम हैं। उनकी कथित बदनामियों के चर्चे बरेली से लेकर कन्याकुमारी तक खूब होते हैं। लोकल अखबारों में आए दिन उनकी किसी न किसी हरकत की खबर छपी मिलती ही है। इत्ते बदनाम होकर भी मैंने आज तलक उनके चेहरों पर पश्चाताप या शर्मिंदगी का भाव नहीं देखा। हमेशा हंसते-मुस्कुराते व बिंदास जीवन जीते हैं। कहते हैं- कुछ लोग ईमानदार होकर नाम कमाते हैं। हम बदनाम होकर नाम कमा रहे हैं। इट'स डिफरेंट।

उनकी बदनामियों से प्रेरणा पाकर मैंने भी कई दफा कोशिश की उनके रास्तों पर चलने की। मगर 'फेल' रहा। एक बार तो अपनी बदनामी के इश्तहार मैंने अड़ोस-पड़ोस के मोहल्लों में भी लगवाए थे पर कोई नतीजा नहीं निकला। लोगों ने एक लेखक का 'पागलपन' कहकर टाल दिया। वैसे अपने लेखन से बदनाम होने में भी मैंने कोई कसर नहीं रख छोड़ी लेकिन क्या करूं बदनाम हो ही नहीं पाया। ऐसा लगता है, लोग मुझे पढ़ते ही नहीं।

हां, हिंदी के बजाए अगर अंगरेजी का लेखक होता तो आज चेतन भगत जैसा सेलिब्रिटी राइटर तो बन ही गया होता। कोई माने या न माने हिंदी में लेखक के बदनाम होने की संभवनाएं बहुत कम हैं।

मुझे सबसे ज्यादा परेशान किसी का भी रातभर में सेलिब्रिटी बनना करता है। बंदा असहिष्णुता पर बयान देकर सेलिब्रिटी बन जाता है। पान मसाले का विज्ञापन कर सेलिब्रिटी बन जाता है। और तो और अब लोग जूता, चप्पल, थप्पड़ खाकर भी सेलिब्रिटी होने का दर्ज पा रहे हैं। जूता खाने वाला तो सेलिब्रिटी होता ही है। साथ-साथ जूता फेंकने वाला भी अच्छा-खासा सेलिब्रिटी बन जाता है। पूरा मीडिया उसका दीवाना हो जाता है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक में उस पर चर्चाएं-बहसें होती हैं। मात्र एक जूता उछालने भरे से उसका पूरा चाल-चरित्र ही बदल जाता है। है न कमाल।

कल तलक जिन बदनामियों-जूतों को लोग बाग 'हिकारत' की नजरों से देखा करते थे, आज वे सेलिब्रिटी हैं। बचपन में बड़ा बुरा लगता था यह सुनना कि एक जूता पड़ेगा तो सारी अकल ठिकाने पर आ जाएगी। आज मैं यह हसरत पाले रहता हूं कि कोई मुझ पर भी जूता उछाले। अगर मार भी दे तो भी बुरा नहीं मानूंगा। जब फेम जूते के बहाने ही मिल रहा है, तो लेने में क्या हरज है प्यारे।

किसी से प्रति गुस्सा या असहमति अब 'शब्दों' से नहीं बल्कि जूते, चप्पल या स्याही से अभिव्यक्त होने लगी है। यों तो लोग इसे गलत परंपरा कहते हैं पर जो चल जाए वही हिट है। जो हिट है, आज की तारीख में, वही सम्मानीय भी है।

सेलिब्रिटी बनने के लिए मुझे भी कुछ इसी तरह की जुगत भिड़ानी होगी। या कोई मुझे बदनाम करे या मैं स्वयं ही बदनाम हो जाऊं। या कोई मुझ पर जूता चलाए या मैं किसी पर जूता उछालूं। लोग क्या कहेंगे... इस शर्म को मुझे किनारे रखना होगा।

किसी भी हरकत के दम पर अगर मैं एक दफा सेलिब्रिटी बन गया न तो हर मोहल्ले, हर शहर, हर देश में मेरे नाम के ही चर्चे होंगे।
फिलहाल, लगा हुआ हूं देखिए आगे क्या होता है। सेलिब्रिटी बनने का 'चार्म' ही अलग है।

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