गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

अरहर की दाल के तेवर

भारत माता की जयकारों के बीच अरहर की दाल ने अपने 'तेवर' दिखाना शुरू कर दिए हैं। डेढ़ सौ के पार पहुंच गई है। सरकार कह रही है, ऐसा जमाखोरों की वजह से हुआ है। जमाखोरों पर नकेल कसने का सरकार ने 'आश्वासन' दिया है। ऐसे लुभावने आश्वासन पहले भी मिलते रहे हैं। कुछ दिनों असर दिखने के बाद, फिर वही 'ढाक के तीन पात' हो जाते हैं।

चूंकि अरहर की दाल मेरी 'औकात' से बाहर जा चुकी है, इसलिए मैंने इसे 'न' खाने का निर्णय लिया है। कोई पंडित ने थोड़े न बताया है कि अरहर की दाल खाना ही है। अरहर की दाल के अतिरिक्त तमाम चीजें बाजार में उपलब्ध हैं, उन्हें खाएं। वैसे भी, महंगाई की मार हर चीज पर समान पड़ रही है पर क्या करें पापी पेट को भरा-पूरा रखने के लिए कुछ 'समझौते' तो करने ही पड़ेंगे न।

दाल, चीनी या सब्जी के महंगा होने का ठिकरा हम सरकार पर तो आसानी से फोड़ देते हैं लेकिन सरकार बेचारी भी क्या करे, जब मौसम ही दगा दे जाए। मौसम पर तो न सरकार का बस है न रघुराम राजन का। देखिए न, इस वक्त लगभग आधे देश में पानी और सूखे से त्राहिमाम मचा हुआ है। न लोगों के पास पीने को पानी है न नहाने को। फिर भी, सरकार जुगाड़-तुगाड़ कर जल-आपूर्ति कर ही रही है। उधर, मौसम के सर पर जूं तक न रेंग रही। कुछ राज्यों में तो सूखे के हालात बद से बदत्तर हुए जा रहे हैं। अब इसमें सरकार क्या करें?

अरहर की दाल के महंगा होने के लिए एंवई सरकार को 'कोसने' से क्या फायदा। हमारा खुद पर कंट्रोल होना चाहिए कि हम दाल खाएं ही नहीं। चीनी चखें ही नहीं। सब्जी खरीदें ही नहीं। पानी पीएं ही नहीं। खुद पर कंट्रोल बड़ी चीज है। मुझे ही देख लीजिए, जब से अरहर की दाल और चीनी के दाम आसमान छूने लगे हैं, मैंने तो खाना ही छोड़ दिया है। आजकल केवल 'हवा' खाकर ही काम चला रहा हूं। जो सुख मुफ्त की हवा खाने में है, वो किसी में नहीं।

वैसे, ये सब कहने-गाने की बातें हैं कि महंगाई बढ़ रही है। गुजर-बसर मुश्किल से हो पा रहा है। इत्ती महंगाई में भी हर आदमी अपने हिसाब से जी रहा है। चाहे कम खाए लेकिन खा रहा है। चाहे कम करे लेकिन अपने शौक भी पूरे कर रहा है। ऐसा भी नहीं है कि अरहर की दाल के डेढ़ सौ पार निकल जाने पर कोई उसे खाएगा ही नहीं। जिनकी अंटी में नोट हैं, वे खाएंगे। जिनकी में नहीं हैं, वे कुछ और खाकर गुजारा करेंगे।

जीवन और घर-परिवार की गाड़ी चलती रहनी चाहिए, चाहे जैसे चले।

अरहर की दाल के उछाल पाते ही लोगों में खुसर-पुसर शुरू हो गई है। सबसे ज्यादा बेचैन खबरिया चैनलस हैं। बेचारी दाल पर यों पील पड़े हैं मानो उसका कचूमर निकालकर ही दम लेंगे। अपने इर्द-गिर्द पांच-सात लोगों की भीड़ जमा कर शुरू हो जाते हैं, कभी सरकार तो कभी जमाखोरों को कोसने। लेकिन आज तलक मैंने किसी मीडिया वाले को यह कहते नहीं सुना कि दाल, चीनी या सब्जी के महंगा होने के कारण, वे उसे खाना छोड़ रहे हैं। सो, उनकी पहली पसंद दाल की होगी।

अरहर की दाल कोई पहली दफा थोड़े न महंगी हुई है, जो 'सियापा' किया जाए। महंगाई-सस्ताई तो चलती रहती है। महंगाई के हिसाब से खुद को 'एडजस्ट' करने में ही समझदारी है। वरना यों ही कोसते रहिए कभी सरकार, कभी जमाखोरों को। फर्क किसकी सेहत पर क्या पड़ना है!

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

गर्मी और परेशानी

लोगों ने परेशान रहने को अपनी आदत बना लिया है। हर वक्त किसी न किसी बात पर परेशान मिलते हैं। लाइफ में थोड़ी-बहुत परेशान चलती है। लेकिन परेशानी को गहना बनाकर गले में टांगे रहना कहां की 'अक्लमंदी' है?

आजकल कुछ नहीं तो लोग गर्मी से परेशान हैं। हाय! गर्मी, हाय! गर्मी ऐसे चिल्ला रहे हैं मानो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हों। अखबारों में आए दिन- तापमान के 40-45 डिग्री के पार निकल जाने की खबरें- गर्मी की तीव्रता को और बढ़ा रही हैं। जाहिर-सी बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो क्या दिसंबर-जनवरी में पड़ेगी। जब गर्मी है तो गर्मी को झेलना भी सिखिए। गर्मी के लिए गर्मी को गरियाते रहना भला कहां की 'इंसानियत' है!

जिस प्रकार इंसान के स्वभाव का कुछ पता नहीं रहता, ऐसा ही नेचर गर्मी का भी है। किसी साल अधिक पड़ जाती है। किसी साल कम। कह जा रहा है, इस साल की गर्मी ने पिछले कई सालों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। अच्छा ही है न। गर्मी अधिक पड़ेगी तो ठंडे का कारोबार बढ़ेगा। एसी, कूलर, पंखे भारी मात्रा में बिकेंगे। सर्दी कम पड़ने से व्यापारियों को जो 'दर्द' मिला था, थोड़ा कम होगा। हमेशा अपने बारे में ही नहीं, कभी-कभी दूसरों के बारे में भी सोच लेना चाहिए।

सच कहूं, मुझे सर्दियों से कहीं अधिक गर्मियां भाती हैं। लाइफ को जीने का असली मजा आता गर्मियों में ही है। एक तो शरीर पर कम कपड़ों का बोझ, दूसरा कंबल, हिटर से मुक्ति। गर्मियों में जित्ता दिल करे उत्ता नहाओ। मैं तो चाहता हूं, साल भर गर्मियां ही गर्मियां पड़ा करें ताकि ठंड की मार से आजादी मिल सके।

बत्ती न आने पर हाथ से पंखा झेलने का सुख ही अद्भूत है। मुझे बड़ा अच्छा लगता है, जब मेरे इलाके में पूरा-पूरा दिन बत्ती नहीं आती। भीषण गर्मी में बत्ती का इंतजार करने में जो आनंद मिलता है, वो प्रेमिका के इंतजार में भी नहीं मिलता। खासकर, बत्ती जब चमक कर चली जाए और घंटों-घंटों न आए। कसम से उस वक्त सरकार और बिजली विभाग के लिए मेरे दिल से लाखों-लाखों दुआएं निकलती हैं।

लोग हैं कि इत्ते में ही परेशान हो जाते हैं। कभी हाय! गर्मी तो कभी हाय! बत्ती का रोना रोते हैं। सीधा-सा फंडा है, गर्मियों में बिजली की खपत ऑटोमेटिक बढ़ जाती है, ऐसे में बत्ती कम या न के बराबर ही आएगी। कम बत्ती में गुजारा कीजिए न। क्या दिक्कत है। जरा उनसे पूछिए, जहां बत्ती है ही नहीं। वे आज भी बिजली के तारों के पड़ने का इंतजार कर रहे हैं।

निरंतर रोते या परेशान रहने से कुछ नहीं मिलना प्यारे। परेशानियों के साथ एडजस्ट कीजिए। लोग मानेंगे नहीं लेकिन गर्मियां हमें मैनेजमेंट और एडजस्टमेंट का बहुत उम्दा पाठ पढ़ाती हैं। बिन बत्ती, बिन पानी, बिन हवा, बिना एसी कैसे खुद को वातावरण के अनुरूप ढाला जाए गर्मियां बहुत अच्छे से सिखाती हैं।

हां, उन लोगों का कुछ नहीं हो सकता, जो धरती पर आए ही परेशान रहने के लिए हैं। उन्हें विश्व की चाहे कित्ती ही सुख-सुविधाएं क्यों न मिल जाएं, वे रहेंगे परेशान ही। इसीलिए उन परेशान आत्माओं पर से अपना ध्यान हटाएं और भीषण गर्मी को एंजॉव्य करें।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

छप्पन इंची सीना और कोहिनूर

सब जानते हैं, हमारी केंद्र सरकार का सीना छप्पन इंच का है! इस बात का सरकार के प्रत्येक मंत्री व संतरी को 'खासा गुमान' भी है। स्वयं प्रधानमंत्रीजी अपने छप्पन इंची सीने की 'वीरता' पर चुनावी सभाओं में कसीदे भी गढ़ चुके हैं। इस सब के बावजूद, केंद्र सरकार ब्रिटेन पर कोहिनूर को लेकर दावा 'मजबूती' से पेश नहीं कर पा रही।

जबकि ब्रिटेन को हमारी केंद्र सरकार का छप्पन इंची सीना देखकर खुद ही कोहिनूर को 'सरेंडर' कर देना चाहिए था! भला छप्पन इंची सीने के आगे किस देश की इत्ती मजाल कि दो पल भी ठहर सके! यह कोई जुमलेनुमा हवा से फुला हुआ छप्पन इंची सीना नहीं, कई सालों की अथक मेहनत का नतीजा है।

मुझे जानकर थोड़ा अटपटा-सा लगा कि केंद्र सरकार 150 हजार करोड़ के कोहिनूर पर अपना दावा, यह कहते हुए कि तोहफे में दिया गया था, छोड़ने का फैसला लिया है। तोहफे में दिया गया था तो क्या हुआ; है तो हमारा ही। इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए, सबसे ज्यादा समय कोहिनूर हमारे शासकों के पास ही रहा। कोहिनूर की जड़ें तो हमारे ही मुल्क में जमी हुई हैं। हम ही उसके 'असली हकदार' हैं।

कोहिनूर पाने के लिए इत्ती जल्दी 'हार' मान लेना ठीक नहीं। जब हम कश्मीर के लिए इत्ते लंबे से पाकिस्तान से लड़-जुझ रहे हैं तो क्या कोहिनूर के लिए संघर्ष नहीं कर सकते? यों भी, यह भारतीयों की खूबी रही है कि हम 'गोल्ड' और 'प्रॉपर्टी' जैसे मसलों पर इत्ती आसानी से हार नहीं मानते। यह तो फिर भी कोहिनूर है मियां।

वो तो अच्छा हुआ जो बीच में दखल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपनी याचिका को बनाए रखने को बोला दिया। वरना तो पतंग की डोर हाथ से छूट ही गई होती।

देखिए न, हमारा पड़ोसी पाकिस्तान भी बीच में भांजी मारने का प्लान बना रहा है। उसने भी कोहिनूर पर अफगानिस्तान और ईरान के साथ दावेदारी पेश की है। यह तो 'एक अनार सौ बीमार' वाला मसला हो गया। मतलब, जो चीज हिंदुस्तान को चाहिए वो पाकिस्तान को भी चाहिए। यह ठीक नहीं।

जैसे केंद्र सरकार अन्य मसलों पर अपना सीना हर वक्त छप्पन इंची-सा फुलाए रखती है, इस (कोहिनूर) पर भी वैसा ही रखना चाहिए। आखिर 150 हजार करोड़ का मामला है। चाहे जो हो जाए, कोहिनूर हमारे हाथों से जाना नहीं चाहिए।

कोहिनूर अगर सकुशल भारत वापस आ जाता तो यही भारत माता की असली जय होगी।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

क्या आपके कने सेल्फी स्टिक है!

वे हमारे मोहल्ले में नए-नए आए हैं। अभी तलक उनसे एकाध दफा ही मुलाकात हो पाई है। पर दिल के 'रंगीन' व तबीयत से 'खुशमिजाज' लगते हैं। अच्छा है।

वे तकनीक के बेहद दीवाने हैं। अपने कने एक लंबा-बड़ा सा स्मार्टफोन रखते हैं। साथ में एक छड़ी भी लिए घूमते हैं। मैंने अक्सर उन्हें उस छड़ी में अपने फोन को फंसाकर फोटूएं लेते देखा है। ऐसी ही एक फोटू उन्होंने मेरे साथ भी ली थी। बताते हैं, खुद से फोटू लेने को 'सेल्फी' कहते हैं।

यों ही, उस दिन वो मुझे पड़ोस के गार्डन में चहलकदमी करते हुए मिल गए। हाथ में उनके फोन के साथ एक छड़ी (मगर ये छड़ी पहले वाली छड़ी से कलर व साइज में थोड़ा भिन्न थी) भी थी। मैंने सोचा, हो सकता है, उनके कने कुत्ते हो, जिसके वास्ते वे छड़ी साथ में लेके चलते हों। मगर बहुत देर तलक जब कुत्ता कहीं नजर नहीं आया। तो मैंने उनसे पूछ ही लिया- 'भाईसाहब, क्या ये छड़ी कुत्ते को हड़काने के काम आती है?'

बेहद बेचारगी भरी नजरों से उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले- 'नहीं.. नहीं.. जी। ये कुत्ते को हड़काने-वड़काने की छड़ी नहीं, ये तो 'स्लेफी स्टिक' है। ये स्लेफी स्टिक ग्रुप टाइप फोटू लेने के काम आती है। या फिर कुछ दूरी बनाकर सेल्फी लेने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। आजकल यूथ में इसका जबरदस्त क्रेज है। हमारे घर में तो ऐसी चार-पांच हैं। सबकी अपनी पर्सनल।'
'ओह! माफी कीजिएगा। यह तो बड़ा ही अद्भूत चीज है- आप अपनी छड़ी से अपनी ही फोटू (यानी सेल्फी) ले सकते हैं।', मैंने कहा।

यों ही, बातों-बातों में उन्होंने मुझसे पूछ लिया- 'क्या आपके कने सेल्फी स्टिक है? एक मिनट तो मैं खामोश रहा। फिर 'न' में सिर हिलाते हुए 'इंकार' कर दिया। इत्ता सुनते ही वे मुझ पर थोड़ा हंसे। फिर बोले- 'क्या बात करते हैं जनाब। आप सेल्फी स्टिक नहीं रखते। अरे हुजूर ये तो आजकल की सबसे अहम जरूरतों में से एक है। जिसके पास स्मार्टफोन हो और सेल्फी स्टिक न हो, पता है, सोसाइटी में उसे 'पिछड़ा' समझा जाता है। सेल्फी स्टिक अब 'स्टेटस सिंबल' है।'

मैंने बेहद धीमे स्वर में उनके 'कहे' में अपनी 'हां' को मिला दिया। वे मुझे आगे बताने लगे कि 'उनके घर में मोबइल से लेकर टीवी तक 'एचडी' है। अभी हाल उन्होंने 'एंडराइड फ्रिज' लिया है। वे कागज के पन्नों वाली किताब नहीं बल्कि किसी डिजिटल मोड (किंडल) पर पढ़ते हैं। शॉपिंग करने के लिए कभी बाजार का झंझट नहीं पालते। सबकुछ ऑनलाइन ही खरीदते-मांगाते हैं। यहां तक कि राशन-पानी भी।'

उनके जाने के बहुत देर बाद तलक मैं सोचता रहा। यार, वाकई कित्ता पिछड़ा हुआ हूं मैं। दुनिया डिजिटल मोड में ढले जा रही है और मैं हूं कि अपने 'आदर्शवाद' से बाहर ही नहीं निकल पा रहा। कित्ता 'यथास्तिवादी' हूं मैं।

मेरा पड़ोस सेल्फी स्टिक से फोटूएं खींच रहा है और मैं अभी भी नोकिया के युग में ही जी रहा हूं। समय के साथ चलने के लिए मुझे न केवल बाहर से बल्कि अंदर से भी बदलना होगा।

यही सब सोच-समझकर मैं तय किया है कि मैं अपने पुराने फोन को कूड़े के ढेर में फेंक कर, अब एक नया स्मार्टफोन विथ सेल्फी स्टिक लूंगा। ताकि अपने पड़ोसी को भी जलता सकूं कि बेट्टा अब मेरे कने भी सेल्फी स्टिक वाला स्मार्टफोन है।

क्यों ठीक है न गुरु...।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

नाम में कुछ नहीं रखा

किसी शहर या सड़क का नाम बदलना कुछ यों हो गया है जैसे यहां की दीवार को तोड़कर वहां खड़ी कर देना। अरे, नाम ही तो है, चाहे जो रख लो। इसीलिए मैं सबसे कहता हूं, नाम में कुछ नहीं रखा। बंबई को मुंबई कर लो या कलकत्ता को कोलकाता। क्या फरक पड़ता है?

देखिए न, अब से 'गुड़गांव' 'गुरुग्राम' कहलाएगा। हां, शुरू में गुरुग्राम बोलने में थोड़ा अटपटा अवश्य लेगा लेकिन बाद में आदत पड़ जाएगी। जब हमें नेताओं को खोखले वायदों को झेलने की आदत पड़ सकती है, यह तो फिर भी एक नाम है।

जब से गुरुग्राम नाम सुना है, मेरी खोपड़ी इसका अर्थ-मतलब सोचते-निकालते खाली हो गई है। गुरु तो चलो ठीक है मगर ग्राम का क्या कंबिनेशन? क्या गुरु होने के मायने अब ग्राम के हिसाब से तय होंगे? यानी, हमारे गुरु इत्ते ग्राम के और तुम्हारे गुरु उत्ते ग्राम के। इस नाम में गुरु से कहीं वजन ग्राम का दिख रहा है।

नाम बदलने के पीछे तर्क चाहे कित्ते दिए जाएं पर होते सब कुतर्क टाइप ही हैं। सब अपनी-अपनी सुविधाओं की राजनीति है। जिस सरकार या नेता को किसी शहर या सड़क का नाम अपनी 'आस्थानुसार' करना होता है, आराम से कर लेता है। नाम बदल जाने से उस शहर की असली पहचान पर क्या फर्क पड़ेगा, इत्ता सोचने-समझने का समय सरकारों के पास नहीं होता।

गुड़गांव अच्छा नाम है। लेकिन सरकार को गुरुग्राम अधिक पसंद आया, सो रख दिया। इत्ते हाई-टेक शहर का गुरुग्राम हो जाना ठीक वैसा ही है जैसे शहरी लड़की की गांव में शादी कर देना। पुरानी बोतल में नई शराब वो मजा नहीं देती प्यारे।

वैसे शहरों के नाम बदलने का जिक्र जब भी आता है, मैं थोड़ा डर-सा जाता हूं। डर इसलिए जाता हूं इस भेड़चाल में कहीं मेरे शहर का नाम न बदल जाए। चूंकि मेरे शहर में एक पागलखाना है। कहीं मेरे शहर का नाम 'पागलग्राम' न कर दिया जाए! अगर ऐसा हुआ तो मेरे शहर से झुमके का महत्त्व खत्म हो जाएगा।

मुझे आज भी याद है, जब मैंने अपना नाम बदलने का जिक्र घर में किया था। तब पिताजी और चाचाजी ने इत्ती विकट डांट पिलाई थी, इत्ती तो कभी मेरे हाईस्कूल में तीन दफा फेल होने पर नहीं लगी। हालांकि अब भी मुझे अपना नाम पसंद नहीं मगर क्या करूं इसे बदल नहीं सकता। घरवालों पर मेरी ठस्क का दवाब जो नहीं है।

अभी तो एक ही शहर ग्राम में तब्दील हुआ है, उम्मीद है, आगे भी यह सिलसिला चलेगा। शहरों, नगरों, सड़कों की पहचान आगे चलकर शायद किलोग्राम, दर्जन, पाव आदि से होने लगे। जी हां, हमारे यहां कुछ भी हो सकता है। आखिर विकास का चक्र एकतरफा ही क्यों चले।

अच्छा लगेगा अगर फेसबुक अपना नाम 'चेहराग्राम' और टि्वटर अपना नाम 'चिड़ियाग्राम' कर लेंगे। इंस्टाग्राम को 'ग्राम' का खिताब पहले से ही मिला हुआ है। जी-मेल 'जीग्राम' और याहू 'याग्राम' हो जाए।

ग्राम अगर कमायाब रहा हो बच्चों के नाम भी संभवता सुरेशग्राम, राहुलग्राम, अंकितग्राम, पुलकितग्राम हुआ करेंगे। वाकई, जीवन में ग्राम का महत्त्व बढ़ जाएगा। शायद सरकारें भी आगे ग्राम के हिसाब से ही चलें।

गुड़गांव को गुरुग्राम मुबारक। शहर 'गुरु' और 'ग्राम' के बीच संतुलन कैसे बनाएगा, इसका अभी इंतजार करना होगा। लेकिन हां ये साफ है कि नाम में कुछ नहीं रखा है। गुरुग्राम रखो या गुरुड्रम। पूरा जोर नाम के प्रति 'आस्था' पर रहना चाहिए। क्या नहीं...?

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

कोहिनूर की खातिर

दो दिन से समझा-समझा कर परेशान हूं कि कोहिनूर हमें नहीं मिल सकता।.. नहीं मिल सकता।.. जब ब्रिटेन कोहिनूर भारत को नहीं दे रहा, तो भला हमें कैसे दे देगा? लेकिन पत्नी कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। उसने तो बस एक ही 'जिद' पकड़ रखी है, उसे कोहिनूर चाहिए।

आज ही मुझे 'अलटिमेटम' दिया है, हफ्ते भर में कोहिनूर लाकर मुझे दे दो, तब ही इस घर में रुकूंगी। वरना, रहना अपनी किताबों और लेखन के साथ। मैंने फिर से समझाने की कोशिश की कि कोहिनूर लाना इत्ता आसान नहीं, जित्ता तुम समझ रही हो। न जाने कित्ते टाइप के नियमों-कानूनों और सरकारी झंझटों से निपटना पड़ेगा। और फिर जब अपनी सरकार ही कोहिनूर पर दावा वापस ले रही है, तो भला हम किस खेत की मूली हैं।

पत्नी ने गुस्से से ऊफनते हुए कहा- देखो जी, वो सब मैं नहीं जानती। सरकार दावा वापस ले रही है तो ले। मुझे इससे क्या? सरकार 150 हजार करोड़ के कोहिनूर के लिए कदम पीछे खींच सकती है किंतु मैं नहीं। अपनी चीज को ऐसे ही क्यों जाने दें? तुम कोशिश तो करो। कोशिश करने से क्या नहीं मिल सकता। मुझे पाने के लिए भी तो तुमने कोशिश की थी न। तो ऐसी ही कोशिश मेरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए करो। सिंपल।

कैसी अजीब मुसीबत में फंस गया हूं। न 'हां' कर सकता हूं न 'ना'। मुझ जैसे मामूली लेखक की औकात 100 रुपए किलो की दाल खरीदने की नहीं और पत्नी को 150 हजार करोड़ का कोहिनूर चाहिए! कैसी बेतुकी जिद है। कोहिनूर कोई आटा-चावल है क्या कि बाजार गए और खरीद लाए। अरे, पूरी जिंदगी भी अगर कोशिश करूंगा, तब भी कोहिनूर मेरा नहीं हो सकता।

लेकिन पत्नी को कौन समझाए। जब देखो तब अजीबो-गरीब जिद्दें पालती रहती है। अभी पिछले दिनों जिद करने लगी कि मुझे मंगल पर रहना है। मंगल पर जमीन खरीद लो। वाकई पत्नियों के दिमाग का कोई भरोसा नहीं होता, कब में कौन-सी जिद पकड़ कर बैठ जाएं।

पत्नी कोहिनूर को लाने की बात कर रही है, यहां मैंने कभी हीरा नहीं देखा। वैसे, वो मुझसे हीरा लेने की भी डिमांड कर चुकी है, तब भी बड़ी मुश्किल से मानी थी।

अव्वल तो ऐसा कोई चांस ही नहीं बनता कि कोहिनूर मुझे मिल जाए। अगर खुदा-न-खास्ता मिल भी गया तो क्या सरकार या नाते-रिश्तेदार मुझे चैन लेने देंगे? आयकर विभाग वाले तुरंत नोटिस थमा देंगे, अपनी आय-व्यय का हिसाब-किताब देने को। न जाने कित्ती टाइप की जांचें बैठ जाएंगी मेरे खिलाफ। न जाने किस-किस संगठन से संबंध होने की जानकारियां हासिल की जाएंगी। कोई इत्ता आसान थोड़े न है, कोहिनूर पाना। या अमीर होकर चैन से सोसाइटी में जी-रह पाना। दूसरों को जित्ती खुजली नहीं मचती, उससे कहीं ज्यादा अपनों को मचती है। हाय! इनके पास इत्ता रुपया-पैसा आया कहां से? जरूर नंबर दो की कमाई चल रही है।

जागती आंखों से छोड़िए मैं तो कभी सपने में भी कोहिनूर पाने की बात नहीं सोच सकता। मगर पत्नी है कि उसे कोहिनूर चाहिए। न जाने क्या करेगी इत्ती बेशकीमती चीज का। यों भी, पुराने लोग कह गए हैं कि सोने-हीरे की चीजें हर किसी को नहीं फलतीं। बिना कोहिनूर ही अपनी लाइफ मस्त चल रही है। खामखहा ओखली में क्यों सर देना?

खैर, प्रयासरत हूं पत्नी को समझने के लिए कि वो कोहिनूर को पाने की जिद छोड़ दे। अपने तईं दो वक्त रोटी ही काफी। हालांकि टाइम लगेगा, उसे मानाने में पर मान जाएगी। कोहिनूर लाना अगर इत्ता ही आसान होता तो सरकार से पहले से मैं न ले आया होता!

फिर भी, सरकार से गुजारिश करूंगा कि वो कोहिनूर पर अपना दावा न छोड़े। लगी रहे। साम-दाम-दंड-भेद सब अपनाए। इत्ती कीमती चीज को छोड़ना अकलमंदी नहीं। बाकी सरकार की मर्जी। 

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

असहमतियां और जूते

लोकतंत्र में असहमतियां और जूते एक साथ चलते हैं। स्पष्टता के साथ कहूं तो जहां असहमतियां होंगी, वहां जूते भी होंगे। इसीलिए असहमतियां और जूते एक-दूसरे के 'पूरक' बन गए हैं। लोकतंत्र में जित्ती तरजीह अब जूतों को मिल रही है, इससे पहले कभी मिली हो, मुझे याद नहीं। किसी वाद या व्यक्ति से असहमति रखने का परिणाम जूता है। क्या करें, दस्तुर ही कुछ ऐसा बन गया है।

जूते की महत्ता ने धैर्य की सीमाओं को तोड़ा है। विड़बना देखिए, जहां जूते नहीं चलने चाहिए, वहां चल जाते हैं। जूता चलाने वाला रातभर में 'सेलिब्रिटी' का खिताब पा जाता है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक में जूता-चलाई का विरोध कम, 'जोक' अधिक बनते हैं। मीडिया में दो-चार दिन जूतम-जूताई पर बहस होती है फिर सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं।

असहमतियों पर बवाल जित्ता अब कटता है, पहले नहीं कटता था। आलम यह है, अगर किसी बड़े नेता या सेलिब्रिटी के मुंह से कुछ असहमति टाइप निकल जाए फिर देखिए सोशल मीडिया पर उसे किस प्रकार 'ट्रोल' किया जाता है। असहमति जताने वाला खुद अपना सिर पिट लेता है, हाय! ये मैंने क्या किया। इससे तो 'चुप्पी' ही भली।

किसी पर जूता-चप्पल चलने, स्याही फेंकने, थप्पड़ मारने की खबर एक बार को 'दुखी' तो अवश्य करती है। प्रश्न भी उठता है कि समाज को ये क्या होता जा रहा है? लेकिन दूसरे ही पल इस बात पर 'संतोष' कर लिया जाता है, बदलते वक्त के साथ असहमति के मायने और व्यवहार शायद बदल गए हैं। असहमतियों पर विरोध अब जूते-चप्पल उछालके ही प्रकट किया जाता है।

यही वजह है कि मैं लोगों से 'न' के बराबर 'असहमति' रखने की कोशिश करता हूं। खामखां, असहमति के नशे में किसी से कोई भूल-चूक हो गई तो। असहमति के चक्कर में मैं किसी का जूता खाना नहीं चाहता। अभी इत्ता बड़ा सेलिब्रिटी नहीं हूं कि जूता खाने का अधिकार मुझे मिले। सेलिब्रिटियों पर उछाले जाने वाले जूतों की बात ही कुछ और होती है।

भले ही ये जूते असहमति या क्रोध-वश उछाले या फेंकने जाते रहे हों, इससे जूतों की सेल में खासा बढ़ोत्तरी दखने-सुनने को मिली हैं। कोई साल भर में मेरे मोहल्ले में ही चार-पांच जूते की दुकानें खुल गईं हैं। सब टनाटन चल रही हैं। साफ है कि जूते की मार्केट-वैल्यू कभी डाउन नहीं हो सकती।

असहमति पर बढ़ते जूतों के प्रभाव ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में अब वे भी अहम हिस्सा रखते हैं। खुलकर किसी पर भी जूते फेंकिए। बंदा बुरा तो मानेगा मगर कुछ देर बाद शांत भी हो जाएगा। पब्लिसिटी का चकसा बढ़ा बुरा होता है प्यारे, जिसे लग जाए वो न जूतों से परहेज करता है, न चप्पलों से।

रविवार, 17 अप्रैल 2016

आइपीएल का मनोरंजन

आइपीएल क्रिकेट नहीं है। केवल 'मनोरंजन' है। दिल बहलाने का सहारा भर है। फिर भी, नादान टाइप लोग आइपीएल में क्रिकेट को ढूंढ़ते हैं। खिलाड़ियों से 'क्लासिक खेल' खेलने की उम्मीद पालते हैं। लगभग प्रत्येक बॉल पर पड़ने वाले चौक्के-छक्के उन्हें 'बर्दाशत' नहीं होते। मुंह फुलाकर घर के कोने में यों बैठ जाते हैं मानो बहू ने सास को किसी बात पर 'दुत्कार' दिया हो।

आइपीएल बदलते दौर का दिलचस्प खेल है। यहां ग्लैमर के साथ-साथ पैसा और शोहरत भी है। खिलाड़ी भले ही मैदान पर खेलता नजर आता हो। असल में वो खड़ा मंडी में होता है। मंडी में उसकी बोली लगती है। तरह-तरह के खरीददार होते हैं वहां। जो खिलाड़ी जित्ते ऊंचे दामों पर बिकता है, उसे ही 'सर्वश्रेष्ठ' माना जाता है।

गजब यह है कि खिलाड़ी अपने बिकने का बुरा नहीं मानते। खुश होते हैं। ऊंचे दामों पर बिक कर दूसरे खिलाड़ियों के समक्ष नजीर पेश करते हैं। देखा, बिका ऐसे जाता है। बिक कर जो पैसा मिलता है, खिलाड़ी के तईं उसका सुख अद्भूत होता है। बिकने में अब किसी खिलाड़ी की 'इज्जत' को बट्टा नहीं लगता।

कुछ खिलाड़ी तो ऐसे हैं, जो सिर्फ आइपीएल में ही खेलते नजर आते हैं। जब एक खेल ही खिलाड़ी का पूरे साल का इंतजाम कर दे रहा है फिर अन्य जगह खेलके क्या फायदा? पैसा और विज्ञापन मिलना चाहिए, चाहे कहीं से भी आए। इधर खिलाड़ी गेम में हिट हुआ नहीं कि उधर विज्ञापन और बाजार तुरंत उसे 'हाईजैक' कर लेते हैं। क्रिकेट का शायद ही ऐसा कोई खिलाड़ी होगा, जो किसी न किसी विज्ञापन में न आता है।

खिलाड़ी की असली 'मार्केट वैल्यू' तो विज्ञापन से ही तय होती है। विज्ञापन खिलाड़ी के लिए भविष्य की पेंशन का काम करते हैं। यह विज्ञापन ने ही बताया है अगर टी-ट्वेंटी या आइपीएल का लुत्फ लेना है तो घर में डिब्बा नहीं फुल एचडी टीवी होना चाहिए। बिना एचडी टीवी के आपकी लाइफ उसी तरह अधूरी है, जिस तरह शराबी के लिए शराब के न मिलने पर हो जाती है।

जग-जाहिर है, क्रिकेट के प्रति दीवानगी का हमारे यहां कोई नियम-कायदा नहीं। क्रिकेट को 'धर्म' बनाए रखने और खिलाड़ियों को 'भगवान' मान लेने पर किसी को आपत्ति नहीं। हां, जिन्हें आपत्ति है, उनकी कोई सुनता नहीं। भले क्रिकेट में आवारापूंजी कित्ती ही बेशर्मी से खुद एक्सपोज करती हो मगर परवाह किसे है। टी-ट्वेंटी और आइपीएल में इसी आवारापूंजी का खेल बिंदास चलता है। दूसरी तरफ, चियर लिडर्स का डांस दर्शकों की मदहोशी में इजाफा करता रहता है। निपट मनोरंजन के अलावा उन्हें और चाहिए भी क्या।

मस्ती-मनोरंजन के बीच महाराष्ट्र में बनी पानी की कमी पर ध्यान शायद आइपीएल वालों का गया भी नहीं होगा। हालांकि कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए आइपीएल के मैचों को बाहर करवाने का निर्देश दिया है। उस पर एक महान सज्जन ने तर्के दिया है कि जहां आइपीएल के मैच होने हैं, वहां पानी की कमी नहीं। बिल्कुल, जब तलक खुद के घर में आग न लगे, आग की त्रासदी का पता ही नहीं चल पाता।

फिलहाल, तो आइपीएल की घंटी रोहित शर्मा, नीता अंबानी, रिकी पॉइंटिग ने साथ मिलकर बीएसई में जाकर बजा दी है।

पानी, सूखे और किसानों की आत्महत्यों की मार झेल रहे एक राज्य के बीच ग्लैमरस आइपीएल का होना बेशक मुझे-आपको 'विद्रूप' लगे लेकिन मनोरंजन के दीवानों के लिए कहां ये सब मायने रखता है। वे तो ग्लैमर और मनोरंजन के डांस-फ्लोर पर थिरकते रहने के आदी हो चुके हैं।

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

सेंसेक्स और मानसून

चहचहाता हुआ सेंसेक्स अच्छा लगता है। माहौल में जोश-सा भर जाता है। मातमी चेहरों पर मुस्कुराहट-सी आ जाती है। एक उम्मीद-सी बंधती है, आगे आने वाले दिन बेहतर होंगे। दिनों का बेहतर होना बेहतर समाज, देश, जनता के लिए बहुत जरूरी है।

इसीलिए इस खबर ने कि, इस दफा मानसून के अच्छे रहने के संकेत हैं, सेंसेक्स से लेकर आम आदमी तक को 'दिली-राहत' पहुंचाई है। सबके चेहरे यों खिल उठे हैं मानो घर में शहनाईयां बजने के दिन नजदीक हों। हो भी क्यों न, पिछले बरस मौसम और मानसून ने किसानों पर जो 'कहर' बरपाया, उसकी भरपाई अभी तलक न हो सकी है।

मानसून न केवल किसान बल्कि सेंसेक्स की भी जान है। मानसून ठीक तो किसान खुशहाल। मानसून ठीक तो सेंसेक्स मस्त। मानसून ठीक तो अर्थव्यवस्था चकाचक। मानसून ठीक तो सरकार टेंशन-मुक्त। आधुनिकता का लबादा हमने ओढ़ चाहे कित्ता लिया हो लेकिन जीवन को 'आस' और 'सांस' मिलती मानसून से ही है।

बेहतर मानसून की खबर सुनकर सेंसेक्स का मस्ती में झूमना, यह बताने के लिए काफी है कि वो खुश रहने का कोई पल खोना नहीं चाहता। सेंसेक्स को खुश देखना मुझे अच्छा लगता है। जब सेंसेक्स खुश होता है, तब उससे जुड़े निवेशक भी खुश होते हैं। दो पैसे हाथ में आते भला किसे बुरे लगते हैं। यह सेंसेक्स की खूबी रही है, जब वो देता है तो झप्पर फाड़के। और, जब लेता है तो सारा रस निचोड़के।

मानसून पर इस दफा बहुत कुछ निर्भर है। उन इलाकों को बहुत उम्मीदें हैं, जो सूखे से बेहाल हैं। जहां नहाने की तो जाने दें, पानी पीने के भी लाले पड़े हुए हैं। सरकार सूखे इलाकों को ट्रेन से पानी पहुंचाकर तर करने का प्रयास तो कर रही है। मगर जो काम मानसून कर सकता है, वो न सरकार न नेता न बुद्धिजीवि नहीं कर सकते।

वैसे मानसून इत्ता 'कठोर' पहले कभी रहता नहीं था। ये तो हमने जल, मिट्टी, हवा, पेड़-पौधों का बेइंतहा दोहन कर उसे कठोर बना दिया। सो मानसून भी ऐंठ लिया, जा बेट्टा मैं भी नहीं आता। जी-रह ले चाहे जैसा मन करे।

हालांकि अभी मानसून के बेहतर रहने की खबर ही आई है। उसके आने में अभी वक्त है। लेकिन मैं यह सोच-सोच कर थोड़ा परेशान हूं, कहीं अगर मानसून बेहतर हो गया तो इसका 'क्रेडिट' सरकार लेने की कोशिश करेगी या विपक्ष! न न चौंकिए मत। हमारे नेता और राजनीतिक दल इत्ते 'महान' हैं कि मुद्दा चाहे कोई हो खुद क्रेडिट लेने-देने का संयोग बना ही लेते हैं। हो सकता है, कल को कोई यह न कहने लग जाए कि बेहतर मानसून 'भारत माता की जय' बोलने से आया है। सब माता की महिमा है।

क्रेडिट चाहे कोई ले मगर मुझे मानसून का बेसब्री से इंतजार है। ताकि जाड़ों में खुद से किए वायदे- बरसातों में जरूर नहाऊंगा- को पूरा कर सकूं। नहाने का जो मजा बरसात के पानी में है, वो शावर में नहीं।

तो प्यारे मानसून तुम जल्द से आ जाओ ताकि हमारे साथ-साथ सेंसेक्स भी खुशी के मारे नाच-झूम उठे।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

सेलिब्रिटी बनने की चाह

मैं यह अच्छी तरह से समझ चुका हूं कि केवल लेखन के दम पर 'सेलिब्रिटी' नहीं बना जा सकता। सेलिब्रिटी बनने के लिए या तो बदनाम होना पड़ेगा या फिर जूता खाना पड़ेगा। मैं दोनों ही चीजों के लिए तैयार हूं। बदनाम होने को मैं बचपन से गलत नहीं समझता था। और, जूता खाने को अब गलत नहीं मानता। मतलब 'फेम' मिलने से है, चाहे जैसे या जहां से भी मिले।

यों तो मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक बदनाम हैं। उनकी कथित बदनामियों के चर्चे बरेली से लेकर कन्याकुमारी तक खूब होते हैं। लोकल अखबारों में आए दिन उनकी किसी न किसी हरकत की खबर छपी मिलती ही है। इत्ते बदनाम होकर भी मैंने आज तलक उनके चेहरों पर पश्चाताप या शर्मिंदगी का भाव नहीं देखा। हमेशा हंसते-मुस्कुराते व बिंदास जीवन जीते हैं। कहते हैं- कुछ लोग ईमानदार होकर नाम कमाते हैं। हम बदनाम होकर नाम कमा रहे हैं। इट'स डिफरेंट।

उनकी बदनामियों से प्रेरणा पाकर मैंने भी कई दफा कोशिश की उनके रास्तों पर चलने की। मगर 'फेल' रहा। एक बार तो अपनी बदनामी के इश्तहार मैंने अड़ोस-पड़ोस के मोहल्लों में भी लगवाए थे पर कोई नतीजा नहीं निकला। लोगों ने एक लेखक का 'पागलपन' कहकर टाल दिया। वैसे अपने लेखन से बदनाम होने में भी मैंने कोई कसर नहीं रख छोड़ी लेकिन क्या करूं बदनाम हो ही नहीं पाया। ऐसा लगता है, लोग मुझे पढ़ते ही नहीं।

हां, हिंदी के बजाए अगर अंगरेजी का लेखक होता तो आज चेतन भगत जैसा सेलिब्रिटी राइटर तो बन ही गया होता। कोई माने या न माने हिंदी में लेखक के बदनाम होने की संभवनाएं बहुत कम हैं।

मुझे सबसे ज्यादा परेशान किसी का भी रातभर में सेलिब्रिटी बनना करता है। बंदा असहिष्णुता पर बयान देकर सेलिब्रिटी बन जाता है। पान मसाले का विज्ञापन कर सेलिब्रिटी बन जाता है। और तो और अब लोग जूता, चप्पल, थप्पड़ खाकर भी सेलिब्रिटी होने का दर्ज पा रहे हैं। जूता खाने वाला तो सेलिब्रिटी होता ही है। साथ-साथ जूता फेंकने वाला भी अच्छा-खासा सेलिब्रिटी बन जाता है। पूरा मीडिया उसका दीवाना हो जाता है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक में उस पर चर्चाएं-बहसें होती हैं। मात्र एक जूता उछालने भरे से उसका पूरा चाल-चरित्र ही बदल जाता है। है न कमाल।

कल तलक जिन बदनामियों-जूतों को लोग बाग 'हिकारत' की नजरों से देखा करते थे, आज वे सेलिब्रिटी हैं। बचपन में बड़ा बुरा लगता था यह सुनना कि एक जूता पड़ेगा तो सारी अकल ठिकाने पर आ जाएगी। आज मैं यह हसरत पाले रहता हूं कि कोई मुझ पर भी जूता उछाले। अगर मार भी दे तो भी बुरा नहीं मानूंगा। जब फेम जूते के बहाने ही मिल रहा है, तो लेने में क्या हरज है प्यारे।

किसी से प्रति गुस्सा या असहमति अब 'शब्दों' से नहीं बल्कि जूते, चप्पल या स्याही से अभिव्यक्त होने लगी है। यों तो लोग इसे गलत परंपरा कहते हैं पर जो चल जाए वही हिट है। जो हिट है, आज की तारीख में, वही सम्मानीय भी है।

सेलिब्रिटी बनने के लिए मुझे भी कुछ इसी तरह की जुगत भिड़ानी होगी। या कोई मुझे बदनाम करे या मैं स्वयं ही बदनाम हो जाऊं। या कोई मुझ पर जूता चलाए या मैं किसी पर जूता उछालूं। लोग क्या कहेंगे... इस शर्म को मुझे किनारे रखना होगा।

किसी भी हरकत के दम पर अगर मैं एक दफा सेलिब्रिटी बन गया न तो हर मोहल्ले, हर शहर, हर देश में मेरे नाम के ही चर्चे होंगे।
फिलहाल, लगा हुआ हूं देखिए आगे क्या होता है। सेलिब्रिटी बनने का 'चार्म' ही अलग है।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

पनामा तो महज बहाना है

मेरी खोपड़ी विचित्र तरीके से चलती है। कभी-कभी तो इसकी विचित्रता का अंदाजा मैं भी नहीं लगा पाता। खोपड़ी है इसलिए ज्यादा बहस करना भी मुनासिब नहीं समझता। बीवी के बाद खोपड़ी ही है, जिससे बहस करने से हमेशा बचना चाहिए। क्या पता कब में 'बिदक' जाए। इसीलिए, खोपड़ी जो संकेत दे चुपचुप मान लें।

जब से पनामा पेपर लिक्स की चर्चा गर्म हुई है, तब से मेरी खोपड़ी अति-विचित्र सा संकेत दे रही है। संकेत कुछ यों मिल रहे हैं कि पनामा पेपर लिक्स के मसले को देश में चल रही बेहद जरूरी बहसों से ध्यान भटकाने को बीच में लाया गया है। इसमें पक्का विदेशी हाथ है! मेरी खोपड़ी को तो ये सब 'विपक्ष' का किया धरा लगता है।

वरना, इत्ते सालों से अनामा-पनामा का जिक्र क्यों सामने नहीं आया? कथित बड़े लोग टैक्स चोरी का कोई नया खेल थोड़े न खेल रहे हैं। बरसों उनका कच्चा-चिठ्ठा पनामा की तिजोरियों में सुरक्षित है। फिर अचानाक से ये सब क्यों और किसलिए?

देश में इन दिनों इत्ते मस्त टाइप के मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है। कोई 'भारत माता की जय' बोलने को जरूरी बता रहा है। तो कोई 'असहिष्णुता' एवं 'राष्ट्रवाद' जैसी बिंदास बहसों में लिपटा हुआ है। जेएनयू और वामपंथियों का हश्र किसी से छिपा नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि लोगों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बनावाकर अपनी जेबों में रखा लेना चाहिए। क्या पता कब, कहां जरूरत पड़ जाए। फिलहाल, मैंने तो एप्लाइ कर भी दिया है।

ऐसी मस्त और बिंदास तू-तू, मैं-मैं के बीच पनामा पेपर लिक्स जैसे 'बोरिंग मुद्दे' का आ जाना मजे को किरकिरा ही करेगा। देखिए न, मीडिया ने कित्ती जल्दी पनामा पेपर लिक्स के मुद्दे को लपक लिया। चैनलों पर जहां कल तलक बहसें भारत माता की जय, देशभक्ति, देशद्रोह, असहिष्णुता आदि पर हो रही थीं, अब पनामा पर हो रही हैं। बहस को चटपटा इसीलिए भी बनाया जा रहा है क्योंकि इसमें सदी के महानायक और उनकी स्टार बहू का नाम भी शामिल है।

हां, इस बहाने ये जरूर हुआ है, जिस पनामा सिगरेट को लोग भूल गए थे, उसकी यादें पुनः ताजा हो गई हैं। यकायक मार्केट में पनामा सिगरेट ब्रांड की डिमांड बढ़ गई है। चूंकि मैं स्वयं धुम्रपान के नशे से दूर हूं इसलिए मुझे खुद नहीं मालूम की पनामा सिगरेट अब आती भी है या नहीं। सुना है, अपने जमाने में पनामा सिगरेट की तूती बोलती थी।

अगर पनामा पेपर लिक्स मामले में कुछ बड़ी हस्तियों के नाम सामने आ भी गए तो उनका होगा क्या? बड़े लोग। बड़ा पैसा। बड़ा ठिकाना। उनकी निगाह में तो काला-सफेद धन दोनों एक समान हैं।

मैं तो कहता हूं, पनामा पेपर लिक्स जैसे 'निर्थक मुद्दों' पर अधिक ध्यान देने की जरूरत ही नहीं है। ये महज सरकार, जनता और मीडिया का असल मुद्दों से ध्यान हटाने की तिकड़म है। पनामा पेपर लिक्स से कहीं ज्यादा जरूरी है, भारत माता की जय बोलने पर चर्चा। जब तलक इस मसले पर खुलकर बहस नहीं होगी, पता ही नहीं चल पाएगा कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही।

तस्वीर कुछ साफ-सी दिखती मालूम पड़ रही है। आगे आने वाले चुनावों में पनामा पेपर लिक्स और भारत माता की जय को बराबर-बराबर भुनाया जाएगा। बाकी महंगाई, ब्याज, गरीबी, भूख सब पुराने मुद्दे ठहरे। फिल्मी दुनिया की तरह राजनीति में भी हिट मुद्दों को ही हवा दी जाती है ताकि जनता को आकर्षित कर सकें।

वैसे, पनामा के बहाने 'मनोरंजन' होने में कोई बुराई नहीं। आदमी को हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहना चाहिए ताकि खोपड़ी ठंडी रहे, मेरी तरह।