मंगलवार, 8 मार्च 2016

देशद्रोही कंडोम!

जेएनयू के बहाने बहुत कुछ चर्चे में आया। देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी चर्चोएं बहस के रास्ते होती हुईं विवाद का कारण बन गईं। वामपंथ एवं राष्ट्रवाद पर ऐसी चर्चे छिड़ी कि दोनों वदों के लोग एक-दूसरे को 'हिकारत' भरी नजरों से देखने लगे। सोशल मीडिया पर खुल्ला एक-दूसरे को गरियाया जाने लगा।

बहरहाल, इन सबके बीच सबसे दिलचस्प चर्चे रही- एक मंत्रीजी के खुलासे के बाद- जेएनयू में 3000 कंडोम का मिलना। एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में इत्ते सारे कंडोम मिलने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। देखते-देखते कंडोम 'राष्ट्रीय बहस' से ज्यादा 'चिंता' का विषय बन गया। एक यूनिवर्सिटी में कंडोम के मिलने से न जाने क्या-क्या 'खतरे' में आ गया।

कंडोम पर बहस इत्ती बढ़ गई कि राष्ट्रवादियों ने उसे तुरंत 'देशद्रोही' घोषित कर दिया। अब तलक तो मैंने इंसानों को देशद्रोही होते देखा-सुना था लेकिन यहां तो कंडोम ही...। बेचारे कंडोम ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि इंसानों को 'प्लेजर' और 'सुरक्षा' देने के एवज में उस पर ही देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया जाएगा। कंडोम मन ही मन कित्ता रोया होगा, इसका एहसास शायद किसी को नहीं।

मैं तो इस बात पर बड़ा हैरान हूं कि उक्त मंत्रीजी ने 3000 कंडोम गिने कैसे होंगे? कैसे यह तय किया होगा कि कित्ते कंडोम यूजड हैं, कित्ते अनयूजड? एक साथ इत्ते कंडोम की गिनती आसान न होती प्यारे। यहां मुझे 10-10 के सौ नोट गिनने में 'हांफ' आ जाती है और वहां मंत्रीजी एक सांस में 3000 कंडोम गिन गए। शाबाश है उन्हें।

खैर, जिन्होंने कंडोम को देशद्रोही घोषित किया उनकी वे जानें। परंतु मुझे कंडोम अपने जन्म से ही देशभक्त टाइप लगता रहा है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि इंसानों के प्रति देशभक्ति का जज्बा जित्ता कंडोम के भीतर होता है, उत्ता अन्य किसी चीज में नहीं। कंडोम न केवल अति-उत्तेचना बल्कि परिवार-नियोजन में भी महत्ती भूमिका निभाता है। कंडोम ने एचआईवी से बचाव में क्रांतिकारी असर छोड़ा है।
फिर भी कंडोम पर इत्ता बड़ा इल्जाम, यह ठीक नहीं।

कहां हैं वो सामाजिक-लेखकीय संगठन जो बात-बेबात सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक पर क्रांति-क्रांति चिल्लाते रहते हैं? अब क्यों कोई संगठन-लेखक-पत्रकार-बुद्धिजीवि कंडोम के पक्ष में खुलकर सामने नहीं आ रहा? क्या सबको सांप सूंघ गया है?

यहां अक्सर यही होता है, टेढ़े वक्त में जब किसी को सहारे की जरूरत होती है, तो सब के सब पीठ दिखा जाते हैं। यों, वैचारिक, शाब्दिक और किताबी लफ्फबाजियां करने में हमारा जवाब नहीं।

कोई चाहे न हो किंतु मैं कंडोम को देशद्रोही मानने पर बेहद 'आहत' हूं। बहुत जल्द इसके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाने की सोच रहा हूं। कंडोम बोल नहीं सकता तो क्या भावनाएं तो उसके भीतर भी हैं। जब कथित राष्ट्रवाद या असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद की जा सकता है, तो कंडोम पर लगे देशद्रोह के इल्जाम के खिलाफ क्यों नहीं?

तुम चिंता न करो प्यारे कंडोम मैं तुम्हारी आवाज बनकर इस सोई हुई दुनिया को अवश्य जगाऊंगा। तुम्हारी लड़ाई मैं लडूंगा। बस तुम हिम्मत न हराना। लंबा संघर्ष करना है तुम्हें-मुझे मिलकर। तैयार रहो।

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