गुरुवार, 31 मार्च 2016

मूर्खता में सुख

जी हां। मैं बचपन से मूर्ख हूं! यों कहिए, मूर्खता मेरी नस-नस में बसी है। बताते हैं, जिस हस्पताल में मैं पैदा हुआ था, वहां से मुझे दो सर्टिफिकेट मिले थे- एक जन्म का और दूसरा मूर्खता का। मूर्खता के सर्टिफिकेट को मैंने जन्म के सर्टिफिकेट से भी अधिक संभाल कर रखा है। क्या पता कब और कहां जरूरत पड़ जाए।

आज जिस तरह का माहौल है, उसे देखकर तो मैं मूर्खता के सर्टिफिकेट को हमेशा अपनी जेब में डालके चलता हूं। कोई मुझे निपट मूर्ख कहे, उससे पहले मैं अपनी मूर्खता के सर्टिफिकेट को दिखा तो सकूं। अपनी मूर्खता के प्रति शिकायत और संदेह मैं जरा भी रखना नहीं चाहता।

हालांकि स्कूल के दिनों में टीचर द्वारा मुझे एकाध बार मूर्ख कहने का बुरा तो लगा, बाद में आदत-सी पड़ गई। फिर चाहे कोई मुझे कित्ता ही मूर्ख या महा-मूर्ख क्यों न कह ले कभी बुरा नहीं माना। बुरा तो मैं आज भी नहीं मानता, जब पत्नी समेत कोई मुझे 'मूर्ख लेखक' करार देता है। दिल को इत्ती 'तसल्ली' मिलती है। इत्ती तो होशियार को होशियार कहने पर भी न मिलती होगी।

अपने इत्ते सालों के मूर्खता के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि मूर्खता में 'परम-आनंद' है। मूर्ख व्यक्ति हर तरह के बंधन, जाति, संप्रदाय, धर्म, विचारधारा, नैतिकता, सहमति, असहमति सबसे दूर होता है। वो अपनी किस्म-किस्म की मूर्खताओं में ही इत्ता बिजी रहता है कि उसे दुनियादारी की फिकर ही नहीं रहती।

सबसे बड़ी बात। मूर्ख अपनी बात कहने से कभी नहीं घबराता। जो उसे उचित लगता है, करता वो वही है। मूर्ख कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बनते। उनकी अपनी ही दुनिया और सोच होती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा बुद्धि-संपन्न मूर्ख होते हैं। हालांकि मूर्खों के बताए रास्तों पर कोई चलता नहीं। अगर चलने लगे तो उसका जीवन 'चमन' हो जाए।

यही वजह है कि मैं अपना ज्ञान अपने तक ही सीमित रखता हूं। लोग ऐसा कहते जरूर हैं कि ज्ञान बांटने की चीज है। परंतु आजकल के जमाने को देखते हुए, ज्ञान को केवल अपने तक ही महदूद रखना चाहिए। सामने वाले के दिमाग का कोई भरोसा नहीं, कब में आपके ज्ञान पर सीधा हो जाए।

कहने-सुनने के मामले में दुनियादारी तो बहुत दूर की चीज है, मैं तो कभी अपनी पत्नी के कहे की चिंता नहीं करता। भले मुझे वो कित्ता ही बड़ा मूर्ख लेखक क्यों न घोषित कर दे लेकिन मैं अपना लिखना बंद नहीं करूंगा। मैं आज भी उसी बिंदास अंदाज में लिख रहा हूं, जैसा शादी से पहले लिखा करता था। कोई नई बात नहीं- पत्नियों की निगाह में उनके पति मूर्ख ही होते हैं।

कोशिश हमें यही करनी चाहिए कि हम अपनी मूर्खताओं पर खीझे नहीं। मूर्खताओं का आनंद लें। दुनिया में एक अकेले आप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ही मूर्ख है। एक से बढ़कर एक मूर्ख यहां आपको देखने-सुनने को मिल जाएंगे। परंतु स्वीकारेगा कभी कोई नहीं कि वो मूर्ख है। मैं तो कहता हूं, होशियारी से कहीं ज्यादा सुख मूर्खता में है।

मैंने अपने दम पर अपनी मूर्खता को कायम रखा है। आगे भी रखूंगा। पैदा मूर्ख हुआ था। मरूंगा भी मूर्ख ही। मूर्खता के अपने फायदे हैं। जरा एक दफा मूर्ख होके तो देखिए।

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