बुधवार, 23 मार्च 2016

डिजिटल होली

बाहर झांक कर कई दफा देख चुका हूं सिवाय एकाध बच्चे के कोई नजर नहीं आ रहा। ऐसा लग ही नहीं रहा कि आज होली है। न होली का हुड़दंग है, न रंग है, न उमंग। लोगों के चेहरे और कपड़े सूखे हुए हैं। टोलियां तो अब नजर ही नहीं आतीं।

बचपन में जिस मोहल्ले में मैं कभी जमकर होली खेला करता था, वहां बच्चे अब घरों से बाहर नहीं निकलते। होली की छुट्टियों में भी पढ़ाई कर अपना समय काटते हैं।

वक्त ने ऐसी विकट करवट ली है कि लोग अब रंगों से नहीं बल्कि 'जिटल होली' खेलना ज्यादा पसंद करने लगे हैं। डिजिटल होली खेलने में न रंगों के लगाने-छुटाने का झंझट, न हल्ला-हुड़दंग, न तू-तू, मैं-मैं, न जोर-जबरदस्ती। आराम से घर के किसी कोने में बैठकर एक-दूसरे को अपने स्मार्टफोन से वाहट्एप और फेसबुक पर डिजिटल शुभकामनाएं देते-लेते रहो।

व्यवहारिक रूप में त्यौहार पर ग्रिटिंग कार्ड भेजने का रिवाज खत्म हो ही चुका है तो डिजिटल कार्ड भेज दीजिए। ये भी कोई जरूरी नहीं कि बधाईयां व्यक्तिगत तौर पर मिलकर ही दी जाएं। ये काम भी स्मार्टफोन कर देता है।

यही वजह है कि होली पर बच्चे रंग खेलने बाहर कम ही निकलते हैं। वे भी घर में डिजिटल होली खेलके बड़ों की राह पर चल निकले हैं।
डिजिटल होली की सबसे बड़ी खासियत यही है कि एक रंग, एक मैसेज, एक कार्ड, एक विश को आप कित्तों को ही भेज सकते हैं। हालांकि उनमें भावनाएं न के बराबर होती हैं पर भावनाओं को अब पूछता ही कौन है? हमारे समाज का ताना-बाना ही अब कुछ ऐसा बन गया है कि यहां भावनाएं-संवेदनाएं स्मार्टफोन से शुरू होकर, स्मार्टफोन पर ही खत्म हो जाती हैं।

होली डिजिटल हो जाने से बेचारे मोहल्ले के धोबियों का धंधा भी मंदा-सा पड़ गया है। नहीं तो पहले होली पर उनकी चांदी हो जाया करती थी। इत्ते रंग-बिरंगे कपड़े धुलने आया करते थे कि उन्हें सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। रंग ऐसे चटख कि धुलने के बाद भी निशान बाकी रह जाते थे।

अब लोग डिजिटल होली खेलके अपने-अपने स्मार्टफोन्स को ही रंग लेते हैं। डिजिटल रंग न चटख होते हैं, न टिकाऊ। हां, त्यौहार की रस्म-आदायगी जरूर हो जाती है।

आलम यह है कि बाहर वाले को तो जाने दीजिए खुद की पत्नी से भी 'होली खेलें...' कहने में डर-सा लगता है। वो तो दो-टूक कह देती है, मुझे नहीं पड़ना रंग लगाने-छुटाने के झंझट में। तुम्हें होली खेलने का इत्ता ही शौक है तो गुलाल लेके हवा में उड़ाते रहा करो। हो गई होली।

बताइए, ऐसा जवाब सुनके भला किसका मन करेगा होली खेलने का। इससे तो बेहतर है, घर में चुप्पा बैठके डिजिटल होली का ही लुत्फ (चाहे बेमन से) लिया जाए। जिस रंग में दुनिया ढल ली है, उसी में खुद को ढाल लेने में ही भलाई है प्यारे। पहले कभी होली पर रंग जीवन में उमंग भरने के काम आते होंगे, लेकिन अब उनकी जगह डिजिटल रंगों ने ले ली है। यही अब सबकी पसंद है।

तो होली जरूर डिजिटल खेलें पर गाने पुराने ही सुनें। बेचारा बहादुर तो आज भी होली पर यही गाता हुआ मिल जाता है, 'बहादुर नहीं छोड़गे...'।

हैप्पी डिजिटल होली।

1 टिप्पणी:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 25 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!