सोमवार, 21 मार्च 2016

सेलिब्रिटी लेखक न बन पाने का अफसोस

यह 'गम' मुझे दिन-रात परेशान किए रहता है कि इत्ता लिखने के बाद भी मैं अभी तलक 'सेलिब्रिटी लेखक' का दर्ज नहीं पा सका हूं। घर-परिवार की तो खैर जाने दीजिए, उनके तईं तो मैं 'घर की मुर्गी दाल बराबर' ही हूं। किंतु दुनिया की निगाह में मेरा नाम न आना बेहद दुखद है। फिर इत्ता लिखने और छपने का क्या फायदा कि कोई मुझे जान-पहचान न सके। न जाने कित्ती दफा मुझे खुद लोगों को अपना परिचय बतौर लेखक के रूप में देना पड़ता है। बताना पड़ता है कि मैं यहां-यहां इन-इन अखबारों में निरंतर लिखता रहा हूं।

बेशक, कोई माने या माने मगर मैं मानता हूं कि भीड़ में टिके रहने के लिए बंदे का 'सेलिब्रिटी' होना बहुत जरूरी है। होंगे आप खुद की निगाह में कित्ते ही महान अगर दुनिया में निगाह में सेलिब्रिटी नहीं तो बेकार हैं। निष्ठा-प्रतिष्ठा के मानक व्यवहार से नहीं केवल सेलिब्रिटी होने से ही तय होते हैं।

आज जित्ते भी महापुरुषों के मोम के पुतले मैडम तुसाद म्यूजियम में लगे हैं, वे सभी अपनी-अपनी फील्ड के सेलिब्रिटी रहे हैं। चाहे महात्मा गांधी हों या करीना कपूर खान इनका सेलिब्रिटी चार्म अद्भूत है। भले ही दोनों के मध्य वैचारिक असमानताएं कित्ती ही क्यों न हों पर ग्लोबल महत्त्व तो है ही। शांति और खूबसूरती के स्तर पर लोग इन दोनों की शान में कसीदे गढ़ते हैं। यों भी, ग्लोबल होना सेलिब्रिटी होने की अहम निशानी है।

साथ-साथ यह खुशखबरी भी क्या कम बड़ी नहीं कि मैडम तुसाद म्यूजियम में अगला स्टैच्यू अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का होगा। मोदीजी अब मोम के प्रतिरूप में वहां नजर आएंगे। सेलिब्रिटियों की फेहरिस्त में एक और सेलिब्रिटी।

सच कहूं, मुझे तो मोदीजी प्रधानमंत्री कम सेलिब्रिटी अधिक लगते हैं। ग्लोबल और सोशल मीडिया में उनका 'रूतबा' है ही इत्ता विशाल कि सेलिब्रिटी होना लाजमी है। मोम के मोदीजी का मैडम तुसाद म्यूजियम में होना किसी 'कौतूहल' से कमतर न होगा। क्या पता, वहां मौजूद अन्य स्टैच्यू मोदीजी से उनका भाषण सुनने की डिमांड ही कर बैठें!

मोदीजी को मोम के स्टैच्यू में देखना सुखद तो रहेगा मगर मेरे मन के कोने में यह टीस कांटे की तरह हर वक्त चुभती रहेगी कि हाय! मैं क्यों उनके जैसा सेलिब्रिटी न हुआ? हाय! मेरा स्टैच्यू क्यों मैडम तुसाद म्यूजियम में नहीं खड़ा हुआ?

हिंदी के लेखक के साथ हमेशा से यही समस्या रही है कि वो चाहे कित्ते ही पन्ने काले-पीले कर ले मगर अंग्रेजी वालों की तरह सेलिब्रिटी राइट नहीं बन पाता। देखिए न, खुशवंत सिंह और चेतन भगत के क्या जलवे हैं। मेरे मोहल्ले का बच्चा-बच्चा तक इन लेखकों को जानता है। और एक मैं हूं, जिसे बतौर लेखक बीवी तक घास न डालती। ऊपर से ताना और मारती है- मेरी मती मारी गई थी, जो तुम जैसे बे-सेलिब्रिटी लेखक से शादी की।

खैर। अब कुछ नहीं हो सकता। लेखक हूं लेखक ही रहूंगा। हां लेकिन कोशिश में लगा हूं, किसी तरह सेलिब्रिटी लेखक बन जाऊं। ताकि एक दिन मेरा स्टैच्यू भी मैडम तुसाद म्यूजियम में स्थापित हो सके।

फिलहाल, तब तलक आप सब मेरे लिए 'दुआएं' कीजिए।

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