रविवार, 13 मार्च 2016

पत्नी को चाहिए आजादी

देख रहा हूं, आजादी की डिमांड लगातार बढ़ रही है। जेएनयू से शुरू हुई यह डिमांड घर-परिवार तक में फैल चुकी है। जब जिसे कुछ हाथ नहीं आता, तुरंत 'आजादी' की मांग करने बैठ जाता है। इसमें सबसे अधिक नुकसान मुझ जैसे लेखक टाइप के पतियों का हुआ है। मेरे पड़ोस में रहने वाले दो लेखक पतियों को अपनी पत्नियों से इसी आजादी की खातिर हाथ धोना पड़ा।

वैसे, आजादी की चिंगारी मेरे घर में भी बराबर सुलग रही है। वो तो मैं किसी न किसी तरह से चिंगारी को शांत किए बैठा हूं। अभी कल ही पत्नी कहने लगी- 'मुझे तुम्हारे लेखन से आजादी चाहिए। बहुत हुआ, अब और नहीं रह सकती मैं इन कलम-कागजों-किताबों-पत्रिकाओं के बीच। ये सब 'बोर' करते हैं मुझे।'

पत्नी से मुखातिब हो मैंने उसे समझाने की कोशिश की- 'प्रिय, आजादी बहुत कीमती होती है। इसे इत्ता हल्के में नहीं लेना चाहिए। तुम्हें मेरे लेखन से आजादी चाहिए लेकिन मैं बिना लेखन के रह नहीं सकता। मेरी जान बसती है इसमें।'

हल्के गुस्से के साथ पत्नी ने प्रतिउत्तर दिया- 'तुम्हारी जान हमेशा 'बेतूकी' चीजों में ही क्यों बसती है? अरे, तुमसे कहीं अच्छा तो वो कल का छोकरा कन्हैया है। देखा कित्ते उत्साह के साथ आजादी की मांग कर रहा है। अपनी एक ही स्चिप में राजनीति के बड़े-बड़े तोपचियों को धूल चटा दी। और, तुमने उम्रभर कागजों को काला-पीला करके क्या किया?'

पत्नी के वार को सहजता से लेते हुए मैंने पुनः समझाया- 'नहीं.. नहीं.. प्रियवर ऐसा कतई नहीं है। कन्हैया की आजादी की मांग सर्वथा अनुचित है। उसमें द्रेशद्रोह और अतिवाद की बू आती है। देख नहीं तुमने, जेल से अंतरिम जमानत पर छूटने के बाद भी वो किस बेशर्मी के साथ भाषण दे रहा था। और, लोग हैं कि उसे नए जमाने का भगत सिंह बनाने पर तुले हुए हैं। अतिवादी टाइप की आजादी किसी काम नहीं आती।'

बीच में ही मेरी बात को काटते हुए पत्नी बोली- 'अतिवाद। कैसे अतिवाद। वो लड़का एमदम ठीक जा रहा है। आगे चलकर राजनीति में बड़ा नाम कमाएगा, जैसे केजरीवालजी ने कमाया। अरे, तुम क्या जानों क्या होती है आजादी। हम पत्नियों की तरह दिनभर घर-बच्चों को संभालों तो पता चले। ये किताबों-पत्रिकाओ में विचारों के लेप लगाने से न रोटी मिलती है न आजादी। समझे...।'

इत्ता कहते और 'लेकर रहूंगी आजादी... लाल सलाम.. लाल सलाम..' का नारा लगाते हुए पत्नी भीतर चली गई। मैं भी अपने कमरे में लौट आया। यूट्यूब पर कन्हैया के भाषण को फिर से देखना शुरू किया। तब लगा अगर पत्नी के तेवर कन्हैया जैसे ही बने रहे तो एकदिन मुझे अपने लेखन से आजादी करके ही दम लेगी।

या खुदा जाने क्या होगा आगे।

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