गुरुवार, 10 मार्च 2016

विचारधारा की लड़ाईयां

विचारधारा के मसले तगड़े हैं। इसीलिए विचारधारा के मारे विचारवान आपस में लड़ते-भिड़ते बहुत हैं। लड़ाई इस बात पर ज्यादा होती है कि तेरी विचारधारा मेरी विचारधारा से 'पवित्र' कैसे! विचारधारा की यह गुथ्थम-गुथ्था कभी-कभी इत्ता विकराल रूप ले लेती है कि मामला 'व्यक्तिगत छीछालेदर' तक पहुंच जाता है।

आजकल विचारवान लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं की लड़ाईयां फेसबुक-टि्वटर पर अधिक लड़ रहे हैं। जमीन पर लड़ने के लिए न उनके पास वक्त है न हिम्मत। यों भी, कागजी लड़ाईयां प्रायः 'हवा' में ही लड़ी जाती हैं। सोशल नेटवर्किंग ऐसा प्लेटफार्म है, जहां आप हाथ-पैर खोलकर किसी को कुछ भी कह-लिख सकते हैं। भाषा की तमीज यहां मायने नहीं रखती। यही वजह है कि विचारवान लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं के मसले लेकर कभी फेसबुक तो कभी टि्वटर पर आपस में भिड़ जाते हैं। किंतु, अंत तक नतीजा कुछ नहीं निकलता। सिवाय एक-दूसरे को 'गरियाने' के।

सिर्फ विचाराधारा के वास्ते विचारवानों को आपस में लड़ते देखना अच्छा तो नहीं लगता पर कर भी क्या सकते हैं। आखिर वे ठहरे विचारवान-बुद्धिजीवि। बुद्धिजीवि की बुद्धि और विचार पर आप सवाल नहीं उठा सकते। सवाल उठाएंगे तो तुरंत 'जाहिल' करार दिए जाएंगे। इसीलिए मैं विचारवानों की कथित वैचारिक लड़ाईयों को 'खामोशी' से देखता-पढ़ता रहता हूं। बीच में कभी नहीं कूदता। यों भी, जब दो बुद्धिजीवि आपस में भिड़ रहे हों तो 'बे-बुद्धि' वालो को चुप ही बैठना चाहिए। मैं यही करता हूं।

हालांकि पहले बुरा लगता था विचाराधारा के वास्ते किसी को आपस में लड़ते देखना। मगर अब इन लड़ाईयां का 'लुत्फ' लेने लगा हूं। पहले मैं खुद को बुद्धिहीन समझा करता था पर बुद्धिजीवियों की कथित तू-तू मैं-मैं को देखकर अब मुझे अपनी बुद्धिहीनता पर गर्व होता है। बार-बार यही शुक्र मनाता हूं कि अच्छा हुआ जो मैं विचारवान-बुद्धिजीवि न हुआ।

विचारवान लोग मुझे हमेशा से ही 'खुराफाती' टाइप लगते रहे हैं। इन लोगों के साथ सबसे बड़ी 'समस्या' यह रहती है कि देश-दुनिया-समाज में इन्हें कभी कुछ अच्छा नहीं लगता। वो लोग इन्हें जरा भी पसंद नहीं आते, जो इनकी कथित विचाराधरा का समर्थन नहीं करते। दिमाग चौबीस घंटे बस इसी में लग रहता है कि फलां बात में 'खराबी' कैसे निकाली जाए। अगर विपरित विचाराधारा वाला कुछ अच्छा करने की सोचे भी तो ये विचारवान तुरंत अपनी टंगड़ी अड़ा देते हैं। नाक को न सीधे न उलटे कैसे भी पकड़ने में इन्हें सुख नहीं मिलता। पता नहीं रात को सोते कैसे होंगे।

फिलहाल, इन दिनों विचाराधारा की तगड़ी लड़ाईयां जेएनयू के मुद्दे पर चल रही हैं। ये लड़ाईयां जित्ती जमीन पर नहीं, उससे कहीं ज्यादा फेसबुक-टि्वटर पर छिड़ी हुई हैं। दोनों तरफ के विचारावानों के अपने-अपने मत-तर्के हैं। अगर आप इनके मतों-तर्कों को समझने की कोशिश करेंगे तो निश्चित ही 'पगला' जाएंगे। क्योंकि आधे से ज्यादा विचारवानों के पास बहस-तलब कुछ नहीं सिर्फ 'व्यक्तिगत छीछालेदर' है। सभी एक-दूसरे के इतिहास-भूगोल-दर्शन-पुराण की 'ऐसी-तैसी' करने में लगे हैं।

भावनाएं इस कदर आहत हैं कि कुछ पूछिए ही मत। वो तो जिस्म में इत्ती ताकत नहीं, नहीं तो पर्वत ही उखाड़कर एक-दूसरे के सिर पर दें मारें। सबसे ज्यादा 'दयनीय' स्थिति में तो वामपंथी विचारक हैं। बेचारे तय ही नहीं कर पा रहे कि जाएं तो कहां? भगवाधारियों से तो शुरू से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा है। ऊपर से मार्क्सवाद भी ज्यादा कुछ असर न दिखा पा रहा। भुनभुना कर, कभी सरकार पर तो कभी फेसबुक-टि्वटर पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। विचाराधारा जब 'यथास्थितवाद' की गर्त में मिल जाती है, तब यही हश्र होता है।

वैसे कथित विचारवानों की मानें तो देश-समाज में कुछ ठीक नहीं चल रहा। हर तरफ असहिण्णुता, अराजकता, लाठी-डंडे का माहौल है। उनके शब्दों में- देश इस वक्त 'आपातकाल' के दौर से गुजर रहा है।

सच बताऊं, कभी-कभी तो मैं भी उनके 'डरावने बयानों' को सुनकर घबरा-सा जाता हूं। खुद को कमरे में बंद कर लेता हूं। कहीं कोई असहिण्णु मुझे ठोक न जाए। लेकिन यह भी सोचता हूं अगर देश में वाकई सबकुछ इत्ता गड़बड़ है तो और लोग कैसे हंसी-खुशी के साथ रह रहे हैं। यों भी, विचारवानों की वैचारिक एवं शाब्दिक लफ्फबाजियों का भरोसा नहीं होता। कब, किसको 'सिरफिरा' घोषित कर दें। विचाराधारा के प्रति 'अंध-भक्ति' क्या-क्या नहीं करा-कहलवा देती।

बहुत सुकून में हूं, जो मैं किसी विचाराधारा से नहीं जुड़ा हूं। भले ही कोई मुझे बे-बुद्धि कहता फिरे फर्क नहीं पड़ता। बुद्धिजीवि होने से कहीं अच्छा है बे-बुद्धि होना। बे-बुद्धि लोग विचारावानों की तरह आपस में लड़ते-भिड़ते तो नहीं हैं। अपनी दुनिया में 'मस्त' रहते हैं।

विचाराधारा की लड़ाईयां यों ही चलती रहेंगी, जब तलक विचारावान अपने-अपने वैचारिक अहंकारों से बाहर नहीं निकलेंगे। बाकी तो जो है सो है ही प्यारे।

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