मंगलवार, 1 मार्च 2016

बजट और बीड़ी

आम बजट में किसकी झोली में क्या आया, क्या गया; इस पर मनन-चिंतन जानकार लोग कर रहे हैं। उन्हें करने दें। इससे मुझे खास मतलब भी नहीं, क्योंकि मुझे जित्ते में गुजारा करना है, यह मैं अच्छे से जानता हूं।

फिलहाल, मेरे मनन-चिंतन का सबब दूसरा है।

वित्तमंत्रीजी ने आम बजट में सिगरेट को महंगा कर ठीक ही किया। न न यह 'ठीक' मैं इस लिहाज से नहीं कह रहा कि सिगरेट के महंगा होने पर लोग इसे पीना त्याग देंगे। या पैकेट खरीदने से पहले सौ दफा सोचेंगे। गम गलत करने वाली चीजों की एक दफा लत पड़ जाए तो भला इत्ती आसानी से कैसे छूट पाती है। या तो पीने वाला 'बर्बाद' हो लेता है या पिलाने वाला। फिर भी, जिंदगी यों ही चलती रहती है।

बजट में सिगरेट महंगी हुई। कोई गम नहीं। किंतु बीड़ी जस की तस रही। बीड़ी पर किसी प्रकार का कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डाला गया। यह बड़ी राहत की बात है।

सच बताऊं, मैं खुद महंगी सिगरेट पीने से 'मुक्ति' चाहता था। कई दफा सोचा कि छोड़ दूं। जरा से शौक में अच्छा-खासा खरचा हो जाता है। लेकिन सिगरेट भला कहां छुटने वाली। तलब बड़ी चीज होती है यारों।

सालों से मेरी आदत में शुमार रहा है कि जब तलक मैं चार-पांच डंडियां सुलगा न लूं, तब तलक न ढंग से नीचे उतरती है, न चैन से लिख ही पाता हूं। कहने में शर्म कैसी- सिगरेट मेरे लेखन एवं गम की 'हमसफर' रही है। दो-चार तगड़े कश में मुझे पूरी कायनात हसीन नजर आने लगती है।

लेकिन बीड़ी फूंकने का अपना ही मजा है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि जो 'आत्मीय सुख' बीड़ी का एक कश दे सकता है, वो सिगरेट के चार-पांच बंडल भी नहीं। बीड़ी पीके महसूस होता है कि हम हिंदुस्तान की मीटी से गहरे जुड़े हुए हैं। सिगरेट के मुकाबले बीड़ी पीने में 'देशभक्ति' का एहसास ज्यादा होता है।

वित्तमंत्रीजी ने कुछ सोचकर ही बीड़ी को महंगा नहीं किया होगा। चूंकि बजट का पूरा फोकस ही गांव-किसान पर केंद्रित है। इस नाते बीड़ी को तो महंगा होना ही नहीं था। बीड़ी किसान की शान है। आज भी गांव-देहात में ज्यादातर लोग बीड़ी पीते ही नजर आते हैं। बीड़ी की सौंधी गंध को अगर महसूस करना है तो एक दफा ट्रेन के जनरल कोच में यात्रा कर लीजिए। बीड़ी का रह-रहकर उठने वाला धुंआ, दिल को खासा सुकून दे जाता है।

मैं तय कर चुका हूं कि सिगरेट छोड़कर अब से बीड़ी ही पिया करूंगा। बीड़ी पीने में खरचा तो कम है ही, साथ-साथ देशभक्ति की फीलिंग भी बनी रहती है। अगर हीरोईन को बीड़ी का साथ न मिला होता तो 'बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है'- न गा पाती। महज एक बीड़ी ने इस गाने को इत्ता हिट कर डाला कि लोग बीड़ी पीते वक्त गाने की मिसाल देना नहीं भूलते।

उम्मीद करता हूं, वित्तमंत्रीजी का सहारा पाके बीड़ी उद्योग आगे नए मुकाम हासिल करेगा। बीड़ी का उपयोग तो 'स्टार्ट-अप' में भी किया जा सकता है। इस बहाने बीड़ी पर थोड़ा आधुनिकता का पानी ही चढ़ जाएगा। पर अच्छा है न। बीड़ी बढ़ेगी तो देश भी बढ़ेगा। देश का विकास होना चाहिए, चाहे कैसे या कहीं से भी हो।

बजट में हुईं खेती-किसानी की घोषणाओं से जित्ता किसानों के चेहरे खिले हैं, उत्ता ही मेरा भी। देखा दुनिया वालों ऐसे आते हैं 'अच्छे दिन'। बीड़ी की आग को बरकरार रखने के लिए वित्तमंत्रीजी का तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। 

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बच्चों का नैसर्गिक विकास होने दें - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...