गुरुवार, 31 मार्च 2016

मूर्खता में सुख

जी हां। मैं बचपन से मूर्ख हूं! यों कहिए, मूर्खता मेरी नस-नस में बसी है। बताते हैं, जिस हस्पताल में मैं पैदा हुआ था, वहां से मुझे दो सर्टिफिकेट मिले थे- एक जन्म का और दूसरा मूर्खता का। मूर्खता के सर्टिफिकेट को मैंने जन्म के सर्टिफिकेट से भी अधिक संभाल कर रखा है। क्या पता कब और कहां जरूरत पड़ जाए।

आज जिस तरह का माहौल है, उसे देखकर तो मैं मूर्खता के सर्टिफिकेट को हमेशा अपनी जेब में डालके चलता हूं। कोई मुझे निपट मूर्ख कहे, उससे पहले मैं अपनी मूर्खता के सर्टिफिकेट को दिखा तो सकूं। अपनी मूर्खता के प्रति शिकायत और संदेह मैं जरा भी रखना नहीं चाहता।

हालांकि स्कूल के दिनों में टीचर द्वारा मुझे एकाध बार मूर्ख कहने का बुरा तो लगा, बाद में आदत-सी पड़ गई। फिर चाहे कोई मुझे कित्ता ही मूर्ख या महा-मूर्ख क्यों न कह ले कभी बुरा नहीं माना। बुरा तो मैं आज भी नहीं मानता, जब पत्नी समेत कोई मुझे 'मूर्ख लेखक' करार देता है। दिल को इत्ती 'तसल्ली' मिलती है। इत्ती तो होशियार को होशियार कहने पर भी न मिलती होगी।

अपने इत्ते सालों के मूर्खता के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि मूर्खता में 'परम-आनंद' है। मूर्ख व्यक्ति हर तरह के बंधन, जाति, संप्रदाय, धर्म, विचारधारा, नैतिकता, सहमति, असहमति सबसे दूर होता है। वो अपनी किस्म-किस्म की मूर्खताओं में ही इत्ता बिजी रहता है कि उसे दुनियादारी की फिकर ही नहीं रहती।

सबसे बड़ी बात। मूर्ख अपनी बात कहने से कभी नहीं घबराता। जो उसे उचित लगता है, करता वो वही है। मूर्ख कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बनते। उनकी अपनी ही दुनिया और सोच होती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा बुद्धि-संपन्न मूर्ख होते हैं। हालांकि मूर्खों के बताए रास्तों पर कोई चलता नहीं। अगर चलने लगे तो उसका जीवन 'चमन' हो जाए।

यही वजह है कि मैं अपना ज्ञान अपने तक ही सीमित रखता हूं। लोग ऐसा कहते जरूर हैं कि ज्ञान बांटने की चीज है। परंतु आजकल के जमाने को देखते हुए, ज्ञान को केवल अपने तक ही महदूद रखना चाहिए। सामने वाले के दिमाग का कोई भरोसा नहीं, कब में आपके ज्ञान पर सीधा हो जाए।

कहने-सुनने के मामले में दुनियादारी तो बहुत दूर की चीज है, मैं तो कभी अपनी पत्नी के कहे की चिंता नहीं करता। भले मुझे वो कित्ता ही बड़ा मूर्ख लेखक क्यों न घोषित कर दे लेकिन मैं अपना लिखना बंद नहीं करूंगा। मैं आज भी उसी बिंदास अंदाज में लिख रहा हूं, जैसा शादी से पहले लिखा करता था। कोई नई बात नहीं- पत्नियों की निगाह में उनके पति मूर्ख ही होते हैं।

कोशिश हमें यही करनी चाहिए कि हम अपनी मूर्खताओं पर खीझे नहीं। मूर्खताओं का आनंद लें। दुनिया में एक अकेले आप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ही मूर्ख है। एक से बढ़कर एक मूर्ख यहां आपको देखने-सुनने को मिल जाएंगे। परंतु स्वीकारेगा कभी कोई नहीं कि वो मूर्ख है। मैं तो कहता हूं, होशियारी से कहीं ज्यादा सुख मूर्खता में है।

मैंने अपने दम पर अपनी मूर्खता को कायम रखा है। आगे भी रखूंगा। पैदा मूर्ख हुआ था। मरूंगा भी मूर्ख ही। मूर्खता के अपने फायदे हैं। जरा एक दफा मूर्ख होके तो देखिए।

बुधवार, 23 मार्च 2016

डिजिटल होली

बाहर झांक कर कई दफा देख चुका हूं सिवाय एकाध बच्चे के कोई नजर नहीं आ रहा। ऐसा लग ही नहीं रहा कि आज होली है। न होली का हुड़दंग है, न रंग है, न उमंग। लोगों के चेहरे और कपड़े सूखे हुए हैं। टोलियां तो अब नजर ही नहीं आतीं।

बचपन में जिस मोहल्ले में मैं कभी जमकर होली खेला करता था, वहां बच्चे अब घरों से बाहर नहीं निकलते। होली की छुट्टियों में भी पढ़ाई कर अपना समय काटते हैं।

वक्त ने ऐसी विकट करवट ली है कि लोग अब रंगों से नहीं बल्कि 'जिटल होली' खेलना ज्यादा पसंद करने लगे हैं। डिजिटल होली खेलने में न रंगों के लगाने-छुटाने का झंझट, न हल्ला-हुड़दंग, न तू-तू, मैं-मैं, न जोर-जबरदस्ती। आराम से घर के किसी कोने में बैठकर एक-दूसरे को अपने स्मार्टफोन से वाहट्एप और फेसबुक पर डिजिटल शुभकामनाएं देते-लेते रहो।

व्यवहारिक रूप में त्यौहार पर ग्रिटिंग कार्ड भेजने का रिवाज खत्म हो ही चुका है तो डिजिटल कार्ड भेज दीजिए। ये भी कोई जरूरी नहीं कि बधाईयां व्यक्तिगत तौर पर मिलकर ही दी जाएं। ये काम भी स्मार्टफोन कर देता है।

यही वजह है कि होली पर बच्चे रंग खेलने बाहर कम ही निकलते हैं। वे भी घर में डिजिटल होली खेलके बड़ों की राह पर चल निकले हैं।
डिजिटल होली की सबसे बड़ी खासियत यही है कि एक रंग, एक मैसेज, एक कार्ड, एक विश को आप कित्तों को ही भेज सकते हैं। हालांकि उनमें भावनाएं न के बराबर होती हैं पर भावनाओं को अब पूछता ही कौन है? हमारे समाज का ताना-बाना ही अब कुछ ऐसा बन गया है कि यहां भावनाएं-संवेदनाएं स्मार्टफोन से शुरू होकर, स्मार्टफोन पर ही खत्म हो जाती हैं।

होली डिजिटल हो जाने से बेचारे मोहल्ले के धोबियों का धंधा भी मंदा-सा पड़ गया है। नहीं तो पहले होली पर उनकी चांदी हो जाया करती थी। इत्ते रंग-बिरंगे कपड़े धुलने आया करते थे कि उन्हें सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। रंग ऐसे चटख कि धुलने के बाद भी निशान बाकी रह जाते थे।

अब लोग डिजिटल होली खेलके अपने-अपने स्मार्टफोन्स को ही रंग लेते हैं। डिजिटल रंग न चटख होते हैं, न टिकाऊ। हां, त्यौहार की रस्म-आदायगी जरूर हो जाती है।

आलम यह है कि बाहर वाले को तो जाने दीजिए खुद की पत्नी से भी 'होली खेलें...' कहने में डर-सा लगता है। वो तो दो-टूक कह देती है, मुझे नहीं पड़ना रंग लगाने-छुटाने के झंझट में। तुम्हें होली खेलने का इत्ता ही शौक है तो गुलाल लेके हवा में उड़ाते रहा करो। हो गई होली।

बताइए, ऐसा जवाब सुनके भला किसका मन करेगा होली खेलने का। इससे तो बेहतर है, घर में चुप्पा बैठके डिजिटल होली का ही लुत्फ (चाहे बेमन से) लिया जाए। जिस रंग में दुनिया ढल ली है, उसी में खुद को ढाल लेने में ही भलाई है प्यारे। पहले कभी होली पर रंग जीवन में उमंग भरने के काम आते होंगे, लेकिन अब उनकी जगह डिजिटल रंगों ने ले ली है। यही अब सबकी पसंद है।

तो होली जरूर डिजिटल खेलें पर गाने पुराने ही सुनें। बेचारा बहादुर तो आज भी होली पर यही गाता हुआ मिल जाता है, 'बहादुर नहीं छोड़गे...'।

हैप्पी डिजिटल होली।

सोमवार, 21 मार्च 2016

सेलिब्रिटी लेखक न बन पाने का अफसोस

यह 'गम' मुझे दिन-रात परेशान किए रहता है कि इत्ता लिखने के बाद भी मैं अभी तलक 'सेलिब्रिटी लेखक' का दर्ज नहीं पा सका हूं। घर-परिवार की तो खैर जाने दीजिए, उनके तईं तो मैं 'घर की मुर्गी दाल बराबर' ही हूं। किंतु दुनिया की निगाह में मेरा नाम न आना बेहद दुखद है। फिर इत्ता लिखने और छपने का क्या फायदा कि कोई मुझे जान-पहचान न सके। न जाने कित्ती दफा मुझे खुद लोगों को अपना परिचय बतौर लेखक के रूप में देना पड़ता है। बताना पड़ता है कि मैं यहां-यहां इन-इन अखबारों में निरंतर लिखता रहा हूं।

बेशक, कोई माने या माने मगर मैं मानता हूं कि भीड़ में टिके रहने के लिए बंदे का 'सेलिब्रिटी' होना बहुत जरूरी है। होंगे आप खुद की निगाह में कित्ते ही महान अगर दुनिया में निगाह में सेलिब्रिटी नहीं तो बेकार हैं। निष्ठा-प्रतिष्ठा के मानक व्यवहार से नहीं केवल सेलिब्रिटी होने से ही तय होते हैं।

आज जित्ते भी महापुरुषों के मोम के पुतले मैडम तुसाद म्यूजियम में लगे हैं, वे सभी अपनी-अपनी फील्ड के सेलिब्रिटी रहे हैं। चाहे महात्मा गांधी हों या करीना कपूर खान इनका सेलिब्रिटी चार्म अद्भूत है। भले ही दोनों के मध्य वैचारिक असमानताएं कित्ती ही क्यों न हों पर ग्लोबल महत्त्व तो है ही। शांति और खूबसूरती के स्तर पर लोग इन दोनों की शान में कसीदे गढ़ते हैं। यों भी, ग्लोबल होना सेलिब्रिटी होने की अहम निशानी है।

साथ-साथ यह खुशखबरी भी क्या कम बड़ी नहीं कि मैडम तुसाद म्यूजियम में अगला स्टैच्यू अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का होगा। मोदीजी अब मोम के प्रतिरूप में वहां नजर आएंगे। सेलिब्रिटियों की फेहरिस्त में एक और सेलिब्रिटी।

सच कहूं, मुझे तो मोदीजी प्रधानमंत्री कम सेलिब्रिटी अधिक लगते हैं। ग्लोबल और सोशल मीडिया में उनका 'रूतबा' है ही इत्ता विशाल कि सेलिब्रिटी होना लाजमी है। मोम के मोदीजी का मैडम तुसाद म्यूजियम में होना किसी 'कौतूहल' से कमतर न होगा। क्या पता, वहां मौजूद अन्य स्टैच्यू मोदीजी से उनका भाषण सुनने की डिमांड ही कर बैठें!

मोदीजी को मोम के स्टैच्यू में देखना सुखद तो रहेगा मगर मेरे मन के कोने में यह टीस कांटे की तरह हर वक्त चुभती रहेगी कि हाय! मैं क्यों उनके जैसा सेलिब्रिटी न हुआ? हाय! मेरा स्टैच्यू क्यों मैडम तुसाद म्यूजियम में नहीं खड़ा हुआ?

हिंदी के लेखक के साथ हमेशा से यही समस्या रही है कि वो चाहे कित्ते ही पन्ने काले-पीले कर ले मगर अंग्रेजी वालों की तरह सेलिब्रिटी राइट नहीं बन पाता। देखिए न, खुशवंत सिंह और चेतन भगत के क्या जलवे हैं। मेरे मोहल्ले का बच्चा-बच्चा तक इन लेखकों को जानता है। और एक मैं हूं, जिसे बतौर लेखक बीवी तक घास न डालती। ऊपर से ताना और मारती है- मेरी मती मारी गई थी, जो तुम जैसे बे-सेलिब्रिटी लेखक से शादी की।

खैर। अब कुछ नहीं हो सकता। लेखक हूं लेखक ही रहूंगा। हां लेकिन कोशिश में लगा हूं, किसी तरह सेलिब्रिटी लेखक बन जाऊं। ताकि एक दिन मेरा स्टैच्यू भी मैडम तुसाद म्यूजियम में स्थापित हो सके।

फिलहाल, तब तलक आप सब मेरे लिए 'दुआएं' कीजिए।

बुधवार, 16 मार्च 2016

प्रीति की शादी के बहाने

आखिरकार प्रीति जिंटा ने घर बसा ही लिया। बहुत-बहुत बधाई उन्हें। इसके साथ इत्ते दिनों से लग रहीं अटकलों को भी 'विराम' मिला। फिल्मी दुनिया में तो प्रायः यही होता है। जब तलक अगला शादी कर नहीं लेता, किस्म-किस्म के 'गॉस्पिस' का माहौल गर्म ही रहता है।

खैर...।

प्रीति की शादी करने के इरादे पर 'खुश' तो हूं पर दिल के एक कोने में यह 'शिकायत' भी रख छोड़ी है- काश! शादी करने से पहले मुझे एक दफा बताया होता। न न उनकी शादी में शामिल होने या मिठाई खाने का इरादा नहीं था। इत्ती मेरी औकात भी नहीं। पर अच्छा लगता अगर बता देतीं। कम से कम उनके प्रति अपने दिल में पाल रखे अरमानों को उसी वक्त दफन तो कर देता। हालांकि अब दफन कर दिया है किंतु थोड़ी तकलीफ के साथ।

यों, शादी करना या न करना व्यक्ति का नितांत निजी फैसला होता है। उसमें मुझे तो क्या स्वयं काजी को बोलने का कोई हक नहीं होता। कहते जरूर हैं कि शादी एक पवित्र बंधन टाइप होती है। दो व्यक्तियों का एक-दूसर के प्रति उम्र भर का साथ होता है। मगर प्रीति तुम्हारे बॉलीवुड में तो शादियां (अपवादों को छोड़कर) चाइनीज खिलौने की तरह होती हैं, कब तलक ठीक-ठाक चलेंगी कोई नहीं जानता। फिर भी शादियां हो रही हैं, अच्छी बात है।

तुम्हारी शादी की खबर आते ही सोशल मीडिया पर तुम्हें 'विश' करने का तांता-सा लग गया। मगर बीच-बीच में यह सवाल भी उठाए जाने लगे कि प्रीति को अपनी उम्र से दस साल छोटे लड़के से शादी करने की क्या जरूरत थी? यार कमाल है। प्रीति दस छोटे या बीस साल बड़े लड़के से शादी करे या न करे, यह फैसला उसका है। इसमें दूसरों को बोलने का तो कोई हक ही नहीं बनता। किंतु हम बहुत सियाने हैं। शादी-ब्याह के मौके पर जरूर बोलते हैं। कमियां भी खूब जमकर निकालते हैं।

वैसे, फिल्मी समाज में उम्र कोई खास मायने नहीं रखती। ऐसे तमाम किस्से हैं, जहां अपनी उम्र से बहुत कम या ज्यादा उम्र वालो के बीच शादियां हुई हैं। ये शादियां कित्ती चलीं, अलग बहस का मुद्दा है। मगर सारा दरोमदार रहता दिल पर ही है कि वो किस पर आता है। दिल के मामले में हमें कोई 'समझौता' करना भी नहीं चाहिए। नहीं तो बाद में पछतावा ही रह जाता है। जैसे- मेरी तमन्ना सनी लियोनी से शादी करने की थी। मगर नहीं हो सकती। कोई नहीं, अगले जन्म में देखूंगा।

उम्मीद है, प्रीति की शादी की खबर पाकर उसके दीवाने अपने टूटे दिलों को या तो जोड़ चुके होंगे या फिर प्रकिया में होंगे। अभी तो वक्त प्रीति को शादी की मुबारकां देने का है।

प्रीति ने तो शादी कर ली पता नहीं सलमान और राहुल कब करेंगे।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

न न वे भागे नहीं, हवाखोरी को गए हैं!

वरिष्ठ शराब किंग श्रीमान विजय माल्या को बार-बार 'भगौड़ा' कहा जाना मुझसे 'बर्दाशत' नहीं हो पा रहा! कहने वालों पर इत्ता गुस्सा आ रहा है। मन कर रहा है, उन्हें किंगफिशर के विमान में बैठाकर अरब सागर के तट पर छोड़ आऊं।

यों एक अति-सम्मानित बिजनसमैन-कम-सांसद को 'बेमतलब' भगौड़ा कहना ठीक नहीं। हां, यह सही है कि उन पर नौ हजार करोड़ रुपए का लोन बकाया है किंतु चिंता की कोई बात नहीं, वे सब चुका देंगे। ऐसा मुझे 'विश्वास' है। विश्वास हो भी क्यों न। जो शख्स टीपू सुल्तान की तलवार करोड़ों रुपए देकर खरीद सकता है, क्या वो करोड़ों का कर्ज नहीं चुकाएगा, जरूर चुकाएगा। आखिर कुछ 'लाज' उन्हें टीपू की भी तो रखनी है न।

यही बात मैं जाने कब से लोगों को समझा रहा हूं कि वे भागे नहीं हैं। यहां के शोर-शराबे से 'उक्ता' कर कुछ दिनों के लिए हवाखोरी करने विदेश चले गए हैं। इतिहास गवाह है, मीडिया के टेढ़े-मेढ़े सवालों से बचने के लिए अक्सर सेलिब्रिटी लोग विदेश चले जाया करते हैं। ललित मोदी ने भी तो यही किया। अब वे विदेश में 'सुकून' की जिंदगी बसर कर रहे हैं।

और फिर नौ हजार करोड़ होते ही कित्ते हैं! इत्ता रुपया तो माल्या साहब की दाईं जेब से यों ही झड़कर निकल आएगा। रुपए-पैसे की कोई कमी थोड़े न है उनके कने। इत्ता बड़ा एम्पायर उन्होंने हवा में थोड़े न खड़ा कर लिया। मेहनत की है अगले ने। कित्ती ही मॉडलस को अपने केलैंडरों में छाप-छापकर रात भर में स्टार बना दिया।

विपरित परिस्थितियों के चलते उनकी एअरलाइंस बंद जरूर हो गई पर हवा में जाने कित्तों को उन्होंने चड्डू खिलवाएं हैं। इश्क में मात खाए जाने कित्ते आशिकों को उनकी लालपरी (किंगफिशर) ने भावनात्मक सहारा दिया है। काफी कुछ एहसान उनके बॉलीवुड पर भी हैं।

यह मत भूलिए कि वे बड़े कॉरपोरेट बिजनसमैन हैं। सरकार उनसे नौ हजार करोड़ 'इज्जत' के साथ वसूलेगी। यही तो फर्क होता है, बड़े चोर और छोटे चोर से पैसा वसूलने में। यही अगर कोई गली-मोहल्ले का चोर-मवाली होता। भले उसने नौ रुपए ही चुराए होते, पकड़े जाने पर पुलिस उसका क्या हश्र करती, बतलाने की जरूरत नहीं।

मैं फिर कह रहा हूं, एंवई इत्ती 'टेंशन' न लें। आज नहीं तो कल वे वापस स्वदेश लौट आएंगे। अभी 2016 का केलैंडर बनना बाकी है। ये काम उनके तमाम जरूरी कामों में से एक है। जिसका इंतजार मुझे भी बहुत रहता है।

फिलहाल, अभी उन्हें हवाखोरी करने दें। रुपए का क्या है, आज नहीं तो कल चुका ही देंगे।

रविवार, 13 मार्च 2016

पत्नी को चाहिए आजादी

देख रहा हूं, आजादी की डिमांड लगातार बढ़ रही है। जेएनयू से शुरू हुई यह डिमांड घर-परिवार तक में फैल चुकी है। जब जिसे कुछ हाथ नहीं आता, तुरंत 'आजादी' की मांग करने बैठ जाता है। इसमें सबसे अधिक नुकसान मुझ जैसे लेखक टाइप के पतियों का हुआ है। मेरे पड़ोस में रहने वाले दो लेखक पतियों को अपनी पत्नियों से इसी आजादी की खातिर हाथ धोना पड़ा।

वैसे, आजादी की चिंगारी मेरे घर में भी बराबर सुलग रही है। वो तो मैं किसी न किसी तरह से चिंगारी को शांत किए बैठा हूं। अभी कल ही पत्नी कहने लगी- 'मुझे तुम्हारे लेखन से आजादी चाहिए। बहुत हुआ, अब और नहीं रह सकती मैं इन कलम-कागजों-किताबों-पत्रिकाओं के बीच। ये सब 'बोर' करते हैं मुझे।'

पत्नी से मुखातिब हो मैंने उसे समझाने की कोशिश की- 'प्रिय, आजादी बहुत कीमती होती है। इसे इत्ता हल्के में नहीं लेना चाहिए। तुम्हें मेरे लेखन से आजादी चाहिए लेकिन मैं बिना लेखन के रह नहीं सकता। मेरी जान बसती है इसमें।'

हल्के गुस्से के साथ पत्नी ने प्रतिउत्तर दिया- 'तुम्हारी जान हमेशा 'बेतूकी' चीजों में ही क्यों बसती है? अरे, तुमसे कहीं अच्छा तो वो कल का छोकरा कन्हैया है। देखा कित्ते उत्साह के साथ आजादी की मांग कर रहा है। अपनी एक ही स्चिप में राजनीति के बड़े-बड़े तोपचियों को धूल चटा दी। और, तुमने उम्रभर कागजों को काला-पीला करके क्या किया?'

पत्नी के वार को सहजता से लेते हुए मैंने पुनः समझाया- 'नहीं.. नहीं.. प्रियवर ऐसा कतई नहीं है। कन्हैया की आजादी की मांग सर्वथा अनुचित है। उसमें द्रेशद्रोह और अतिवाद की बू आती है। देख नहीं तुमने, जेल से अंतरिम जमानत पर छूटने के बाद भी वो किस बेशर्मी के साथ भाषण दे रहा था। और, लोग हैं कि उसे नए जमाने का भगत सिंह बनाने पर तुले हुए हैं। अतिवादी टाइप की आजादी किसी काम नहीं आती।'

बीच में ही मेरी बात को काटते हुए पत्नी बोली- 'अतिवाद। कैसे अतिवाद। वो लड़का एमदम ठीक जा रहा है। आगे चलकर राजनीति में बड़ा नाम कमाएगा, जैसे केजरीवालजी ने कमाया। अरे, तुम क्या जानों क्या होती है आजादी। हम पत्नियों की तरह दिनभर घर-बच्चों को संभालों तो पता चले। ये किताबों-पत्रिकाओ में विचारों के लेप लगाने से न रोटी मिलती है न आजादी। समझे...।'

इत्ता कहते और 'लेकर रहूंगी आजादी... लाल सलाम.. लाल सलाम..' का नारा लगाते हुए पत्नी भीतर चली गई। मैं भी अपने कमरे में लौट आया। यूट्यूब पर कन्हैया के भाषण को फिर से देखना शुरू किया। तब लगा अगर पत्नी के तेवर कन्हैया जैसे ही बने रहे तो एकदिन मुझे अपने लेखन से आजादी करके ही दम लेगी।

या खुदा जाने क्या होगा आगे।

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

क्या हुआ जो वह भाग गए!

मुझे बताइए, यहां कौन नहीं भाग रहा? हर कोई हर किसी से आगे निकल जाने की भाग-दौड़ में है। कोई नौकरी के लिए भाग रहा है। कोई पैसे के लिए भाग रहा है। कोई घर के लिए भाग रहा है। कोई इलाज के लिए भाग रहा है। दुनिया-समाज के बीच ऐसी भागम-भाग मची है, कभी-कभी तो यही समझ नहीं आता कि बंदा 'सही' के लिए भाग रहा है या 'गलत' के लिए।

भागा-भागी की इस बेला में अगर वह (विजय माल्या) भाग गए तो क्या गलत किया? अपने बचाव के लिए आदमी कहां-कहां, किन-किन जगहों पर नहीं भागता। वह भागकर विदेश चले गए तो क्या हुआ? हो सकता है, विदेश उन्हें भागने के लिए भारत से कहीं ज्यादा 'सुरक्षित' नजर आया हो। यों भी, सेलिब्रिटी टाइप के लोग अपनी खुश या गम जाहिर करने के लिए अक्सर विदेश की ओर ही भागते हैं।

इल्जाम लगाया जा रहा है कि वह बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपया लेके चंपत हो गए। सरकार, पुलिस, सीबीआइ, गुप्तचर एजेंसियां सब की सब देखती रह गईं। दो-चार दिन बीत जाने के बाद ज्ञात हुआ कि जनाब तो अपना तिया-तोमड़ा लेके पिछले दरवाजे से विदेश निकल लिए।

भागते नहीं तो और क्या करते? सब के सब उनके पीछे हाथ-पैर धोके यों पड़ गए थे मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा 'पाप' किया हो। कुछ हजार करोड़ रुपए का ही तो हेर-फेर किया था। यहां तो नेता लोग इत्ती बड़ी-बड़ी रकमें डकारें बैठे हैं कि पूछिए मत। उन बेचारो ने नौ हजार करोड़ अपने बिजनेस पर खर्च कर दिए तो पूरा देश उनके पीछे पड़ गया। बुद्धिजीवि और नेता-सांसद लोग उन्हें गरियाने लगे। सरकार से सवाल पूछा जाने लगा कि वह भाग क्यों गए? मानो, देश से भागने पर 'प्रतिबंध' हो जैसे!

शायद आपने पढ़ा नहीं। मेडिकल सांइस तक कहती है कि भागना शरीर के लिए लाभप्रद है। आदमी जित्ता भागेगा, जीवन में उत्ता ही निरोगी एवं सुखी रहेगा। हां, ये बात और है कि वह देश के भीतर न भागकर सीधा विदेश भाग गए। पर भागे तो। हो सकता है, उनके इस तरह भागने में शायद कोई स्वास्थ्य-जन्य लाभ छिपा हो। बड़े लोग, बड़ी बातें।

क्या जी, आपने तो उन्हें कतई चोर-उचक्का ही बना दिया। नौ हजार करोड़ अकेले लेके भागना इत्ता आसान नहीं होता। अंदर तक के टांके ढीले हो जाते हैं। हिम्मत चाहिए होती है हिम्मत। ऐसा हिम्मत या तो नेता लोग या फिर हाई-फाई बिजनेसमैन ही कर सकते हैं। कुछ दिन पहले ललित मोदी भी ऐसे ही भागे थे। आज तलक कोई भी पकड़ न पाया उन्हें। हां, संसद से लेकर सड़क तक बातें सब बड़ी ऊंची-ऊंची मार लेते हैं।

वैसे, इस बारे में न सरकार, न विपक्ष, न बुद्धिजीवियों को इत्ता दिमाग खराब करने की जरूरत नहीं। हो सकता है, वह भागे न हों, थोड़ा 'हवाखोरी' के वास्ते विदेश तक चले गए हों। बड़े आदमी हैं। विदेश है ही कित्ती दूर उनकी पहुंच से। जब विदेश में मन भर जाएगा, वापस लौट आएंगे अपने मुल्क। फिर मांग लीजिएगा, उनसे नौ हजार करोड़। दे दें। उनके लिए है ही कित्ती बड़ी रकम ये।

मेरे विचार में सरकार को अपनी 'ऊर्जा' विजय माल्या को विदेश से वापस लाने से कहीं ज्यादा दाऊद को पाकिस्तान से लाने में खर्च करनी चाहिए। दाऊद अधिक 'महत्त्वपूर्ण' है। अरे, विजय माल्या तो अपने घर के आदमी हैं। आज नहीं तो कल लौट ही आएंगे। क्यों ठीक है न!

गुरुवार, 10 मार्च 2016

विचारधारा की लड़ाईयां

विचारधारा के मसले तगड़े हैं। इसीलिए विचारधारा के मारे विचारवान आपस में लड़ते-भिड़ते बहुत हैं। लड़ाई इस बात पर ज्यादा होती है कि तेरी विचारधारा मेरी विचारधारा से 'पवित्र' कैसे! विचारधारा की यह गुथ्थम-गुथ्था कभी-कभी इत्ता विकराल रूप ले लेती है कि मामला 'व्यक्तिगत छीछालेदर' तक पहुंच जाता है।

आजकल विचारवान लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं की लड़ाईयां फेसबुक-टि्वटर पर अधिक लड़ रहे हैं। जमीन पर लड़ने के लिए न उनके पास वक्त है न हिम्मत। यों भी, कागजी लड़ाईयां प्रायः 'हवा' में ही लड़ी जाती हैं। सोशल नेटवर्किंग ऐसा प्लेटफार्म है, जहां आप हाथ-पैर खोलकर किसी को कुछ भी कह-लिख सकते हैं। भाषा की तमीज यहां मायने नहीं रखती। यही वजह है कि विचारवान लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं के मसले लेकर कभी फेसबुक तो कभी टि्वटर पर आपस में भिड़ जाते हैं। किंतु, अंत तक नतीजा कुछ नहीं निकलता। सिवाय एक-दूसरे को 'गरियाने' के।

सिर्फ विचाराधारा के वास्ते विचारवानों को आपस में लड़ते देखना अच्छा तो नहीं लगता पर कर भी क्या सकते हैं। आखिर वे ठहरे विचारवान-बुद्धिजीवि। बुद्धिजीवि की बुद्धि और विचार पर आप सवाल नहीं उठा सकते। सवाल उठाएंगे तो तुरंत 'जाहिल' करार दिए जाएंगे। इसीलिए मैं विचारवानों की कथित वैचारिक लड़ाईयों को 'खामोशी' से देखता-पढ़ता रहता हूं। बीच में कभी नहीं कूदता। यों भी, जब दो बुद्धिजीवि आपस में भिड़ रहे हों तो 'बे-बुद्धि' वालो को चुप ही बैठना चाहिए। मैं यही करता हूं।

हालांकि पहले बुरा लगता था विचाराधारा के वास्ते किसी को आपस में लड़ते देखना। मगर अब इन लड़ाईयां का 'लुत्फ' लेने लगा हूं। पहले मैं खुद को बुद्धिहीन समझा करता था पर बुद्धिजीवियों की कथित तू-तू मैं-मैं को देखकर अब मुझे अपनी बुद्धिहीनता पर गर्व होता है। बार-बार यही शुक्र मनाता हूं कि अच्छा हुआ जो मैं विचारवान-बुद्धिजीवि न हुआ।

विचारवान लोग मुझे हमेशा से ही 'खुराफाती' टाइप लगते रहे हैं। इन लोगों के साथ सबसे बड़ी 'समस्या' यह रहती है कि देश-दुनिया-समाज में इन्हें कभी कुछ अच्छा नहीं लगता। वो लोग इन्हें जरा भी पसंद नहीं आते, जो इनकी कथित विचाराधरा का समर्थन नहीं करते। दिमाग चौबीस घंटे बस इसी में लग रहता है कि फलां बात में 'खराबी' कैसे निकाली जाए। अगर विपरित विचाराधारा वाला कुछ अच्छा करने की सोचे भी तो ये विचारवान तुरंत अपनी टंगड़ी अड़ा देते हैं। नाक को न सीधे न उलटे कैसे भी पकड़ने में इन्हें सुख नहीं मिलता। पता नहीं रात को सोते कैसे होंगे।

फिलहाल, इन दिनों विचाराधारा की तगड़ी लड़ाईयां जेएनयू के मुद्दे पर चल रही हैं। ये लड़ाईयां जित्ती जमीन पर नहीं, उससे कहीं ज्यादा फेसबुक-टि्वटर पर छिड़ी हुई हैं। दोनों तरफ के विचारावानों के अपने-अपने मत-तर्के हैं। अगर आप इनके मतों-तर्कों को समझने की कोशिश करेंगे तो निश्चित ही 'पगला' जाएंगे। क्योंकि आधे से ज्यादा विचारवानों के पास बहस-तलब कुछ नहीं सिर्फ 'व्यक्तिगत छीछालेदर' है। सभी एक-दूसरे के इतिहास-भूगोल-दर्शन-पुराण की 'ऐसी-तैसी' करने में लगे हैं।

भावनाएं इस कदर आहत हैं कि कुछ पूछिए ही मत। वो तो जिस्म में इत्ती ताकत नहीं, नहीं तो पर्वत ही उखाड़कर एक-दूसरे के सिर पर दें मारें। सबसे ज्यादा 'दयनीय' स्थिति में तो वामपंथी विचारक हैं। बेचारे तय ही नहीं कर पा रहे कि जाएं तो कहां? भगवाधारियों से तो शुरू से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा है। ऊपर से मार्क्सवाद भी ज्यादा कुछ असर न दिखा पा रहा। भुनभुना कर, कभी सरकार पर तो कभी फेसबुक-टि्वटर पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। विचाराधारा जब 'यथास्थितवाद' की गर्त में मिल जाती है, तब यही हश्र होता है।

वैसे कथित विचारवानों की मानें तो देश-समाज में कुछ ठीक नहीं चल रहा। हर तरफ असहिण्णुता, अराजकता, लाठी-डंडे का माहौल है। उनके शब्दों में- देश इस वक्त 'आपातकाल' के दौर से गुजर रहा है।

सच बताऊं, कभी-कभी तो मैं भी उनके 'डरावने बयानों' को सुनकर घबरा-सा जाता हूं। खुद को कमरे में बंद कर लेता हूं। कहीं कोई असहिण्णु मुझे ठोक न जाए। लेकिन यह भी सोचता हूं अगर देश में वाकई सबकुछ इत्ता गड़बड़ है तो और लोग कैसे हंसी-खुशी के साथ रह रहे हैं। यों भी, विचारवानों की वैचारिक एवं शाब्दिक लफ्फबाजियों का भरोसा नहीं होता। कब, किसको 'सिरफिरा' घोषित कर दें। विचाराधारा के प्रति 'अंध-भक्ति' क्या-क्या नहीं करा-कहलवा देती।

बहुत सुकून में हूं, जो मैं किसी विचाराधारा से नहीं जुड़ा हूं। भले ही कोई मुझे बे-बुद्धि कहता फिरे फर्क नहीं पड़ता। बुद्धिजीवि होने से कहीं अच्छा है बे-बुद्धि होना। बे-बुद्धि लोग विचारावानों की तरह आपस में लड़ते-भिड़ते तो नहीं हैं। अपनी दुनिया में 'मस्त' रहते हैं।

विचाराधारा की लड़ाईयां यों ही चलती रहेंगी, जब तलक विचारावान अपने-अपने वैचारिक अहंकारों से बाहर नहीं निकलेंगे। बाकी तो जो है सो है ही प्यारे।

बुधवार, 9 मार्च 2016

देशभक्त, देशद्रोही और पागलखाना

प्यारे, मैं अभी तलक यह तय नहीं कर पाया हूं कि मैं 'देशभक्त' हूं या 'देशद्रोही'! कित्ती ही दफा आईने के सामने खड़े होकर अपनी शक्ल को गौर से देखा है, फिर भी, पता न चल पाया। उस दिन अपने करीबी पड़ोसी को बोला कि जरा मेरी हरकतों को देखकर बताए कि मैं व्यवहार में देशभक्त हूं या देशद्रोही। उसे भी कुछ समझ नहीं आया। चुप ही रहा।

पागलखाना मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं। वहां भी इसी उम्मीद में गया था कि पागलों से ही पूछूंगा अपनी देशभक्ति और देशद्रोह के बारे में। पगालखाने में अंदर घूसते ही दो-चार पागल मिले। मुझे देखकर मुस्कुराए। उनकी मुस्कुराहट में शायद यह बात छिपी थी, लो आ गया हमारा एक और साथी।

चलिए। खैर। वहां मुझे एक ठीक-ठाक ढंग का पागल दिखा- उसी से मैंने पूछा- अच्छा, ये बताओ कि मैं शक्ल से देशभक्त लगता हूं या देशद्रोही। एक मिनट तो उस पागल ने मेरी शक्ल देखी फिर जोर का एक झापड़ मेरी थोपड़े पर जमाया और हंसता-कूदता 'पागल है, पागल है, पागल है' कहता हुआ वहां से भाग निकला।

जीवन में संभवता यह पहला झापड़ था मेरे गाल पर किसी पागल का। कहिए कुछ भी पर पागल झापड़ बड़ा ही मस्त मारते हैं। दिन में तारे क्या साक्षात यमराज तक नजर आ जाते हैं।

खैर। कुछ आगे बढ़ने पर एक पागल और मिला। सेम वही सवाल मैंने उससे भी किया। उसने तो सवाल पूरा होने से पहले ही मेरा गिरेबान पकड़ लिया। और खींचकर अपने साथियों के बीच ले जाने लगा। वो तो गनीमत रही नजदीक ही खड़े कुछ डॉक्टर्स ने मुझे उससे छुड़वा लिया। नहीं सारे के सारे पागल मिलकर मुझे कंप्लीट पागल बना चुके होते।

बेहद झुंझलाहट में एक डॉक्टर ने मुझे कहा- 'क्या आप सिरफिरे हैं, जो इन पागलों के बीच ऐसे पगलैटी भरे सवाल पूछने आ गए। अरे, इन बेचारों को क्या मालूम आपकी शक्ल देशभक्त से मिलती है या देशद्रोही से। इन्हें तो सब अपने जैसे ही नजर आते हैं। इनकी दुनिया आप जैसे पढ़े-लिखों से बिल्कुल अलग और कहीं बेहतर है। ये न नेता, न भक्ति, न बयान, न संप्रदायिकता किसी के लिए नहीं लड़ते-झगड़ते। ये अपने ही संघर्ष में मस्त रहते हैं।'

चलिए भागिए यहां से। अपना ये सवाल जाके किसी नेता या भक्त टाइप बंदे से पूछिएगा। चले आते हैं, जाने कहां-कहां से।

फिलहाल, पागलखाने से तो मैं लौट आया। मगर मुझे ये सवाल अब भी पागल किए जा रहा है कि मेरी शक्ल देशभक्त से मिलती है या देशद्रोही से?

मंगलवार, 8 मार्च 2016

देशद्रोही कंडोम!

जेएनयू के बहाने बहुत कुछ चर्चे में आया। देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी चर्चोएं बहस के रास्ते होती हुईं विवाद का कारण बन गईं। वामपंथ एवं राष्ट्रवाद पर ऐसी चर्चे छिड़ी कि दोनों वदों के लोग एक-दूसरे को 'हिकारत' भरी नजरों से देखने लगे। सोशल मीडिया पर खुल्ला एक-दूसरे को गरियाया जाने लगा।

बहरहाल, इन सबके बीच सबसे दिलचस्प चर्चे रही- एक मंत्रीजी के खुलासे के बाद- जेएनयू में 3000 कंडोम का मिलना। एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में इत्ते सारे कंडोम मिलने की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। देखते-देखते कंडोम 'राष्ट्रीय बहस' से ज्यादा 'चिंता' का विषय बन गया। एक यूनिवर्सिटी में कंडोम के मिलने से न जाने क्या-क्या 'खतरे' में आ गया।

कंडोम पर बहस इत्ती बढ़ गई कि राष्ट्रवादियों ने उसे तुरंत 'देशद्रोही' घोषित कर दिया। अब तलक तो मैंने इंसानों को देशद्रोही होते देखा-सुना था लेकिन यहां तो कंडोम ही...। बेचारे कंडोम ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि इंसानों को 'प्लेजर' और 'सुरक्षा' देने के एवज में उस पर ही देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया जाएगा। कंडोम मन ही मन कित्ता रोया होगा, इसका एहसास शायद किसी को नहीं।

मैं तो इस बात पर बड़ा हैरान हूं कि उक्त मंत्रीजी ने 3000 कंडोम गिने कैसे होंगे? कैसे यह तय किया होगा कि कित्ते कंडोम यूजड हैं, कित्ते अनयूजड? एक साथ इत्ते कंडोम की गिनती आसान न होती प्यारे। यहां मुझे 10-10 के सौ नोट गिनने में 'हांफ' आ जाती है और वहां मंत्रीजी एक सांस में 3000 कंडोम गिन गए। शाबाश है उन्हें।

खैर, जिन्होंने कंडोम को देशद्रोही घोषित किया उनकी वे जानें। परंतु मुझे कंडोम अपने जन्म से ही देशभक्त टाइप लगता रहा है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि इंसानों के प्रति देशभक्ति का जज्बा जित्ता कंडोम के भीतर होता है, उत्ता अन्य किसी चीज में नहीं। कंडोम न केवल अति-उत्तेचना बल्कि परिवार-नियोजन में भी महत्ती भूमिका निभाता है। कंडोम ने एचआईवी से बचाव में क्रांतिकारी असर छोड़ा है।
फिर भी कंडोम पर इत्ता बड़ा इल्जाम, यह ठीक नहीं।

कहां हैं वो सामाजिक-लेखकीय संगठन जो बात-बेबात सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक पर क्रांति-क्रांति चिल्लाते रहते हैं? अब क्यों कोई संगठन-लेखक-पत्रकार-बुद्धिजीवि कंडोम के पक्ष में खुलकर सामने नहीं आ रहा? क्या सबको सांप सूंघ गया है?

यहां अक्सर यही होता है, टेढ़े वक्त में जब किसी को सहारे की जरूरत होती है, तो सब के सब पीठ दिखा जाते हैं। यों, वैचारिक, शाब्दिक और किताबी लफ्फबाजियां करने में हमारा जवाब नहीं।

कोई चाहे न हो किंतु मैं कंडोम को देशद्रोही मानने पर बेहद 'आहत' हूं। बहुत जल्द इसके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाने की सोच रहा हूं। कंडोम बोल नहीं सकता तो क्या भावनाएं तो उसके भीतर भी हैं। जब कथित राष्ट्रवाद या असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद की जा सकता है, तो कंडोम पर लगे देशद्रोह के इल्जाम के खिलाफ क्यों नहीं?

तुम चिंता न करो प्यारे कंडोम मैं तुम्हारी आवाज बनकर इस सोई हुई दुनिया को अवश्य जगाऊंगा। तुम्हारी लड़ाई मैं लडूंगा। बस तुम हिम्मत न हराना। लंबा संघर्ष करना है तुम्हें-मुझे मिलकर। तैयार रहो।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

बजट और बीड़ी

आम बजट में किसकी झोली में क्या आया, क्या गया; इस पर मनन-चिंतन जानकार लोग कर रहे हैं। उन्हें करने दें। इससे मुझे खास मतलब भी नहीं, क्योंकि मुझे जित्ते में गुजारा करना है, यह मैं अच्छे से जानता हूं।

फिलहाल, मेरे मनन-चिंतन का सबब दूसरा है।

वित्तमंत्रीजी ने आम बजट में सिगरेट को महंगा कर ठीक ही किया। न न यह 'ठीक' मैं इस लिहाज से नहीं कह रहा कि सिगरेट के महंगा होने पर लोग इसे पीना त्याग देंगे। या पैकेट खरीदने से पहले सौ दफा सोचेंगे। गम गलत करने वाली चीजों की एक दफा लत पड़ जाए तो भला इत्ती आसानी से कैसे छूट पाती है। या तो पीने वाला 'बर्बाद' हो लेता है या पिलाने वाला। फिर भी, जिंदगी यों ही चलती रहती है।

बजट में सिगरेट महंगी हुई। कोई गम नहीं। किंतु बीड़ी जस की तस रही। बीड़ी पर किसी प्रकार का कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डाला गया। यह बड़ी राहत की बात है।

सच बताऊं, मैं खुद महंगी सिगरेट पीने से 'मुक्ति' चाहता था। कई दफा सोचा कि छोड़ दूं। जरा से शौक में अच्छा-खासा खरचा हो जाता है। लेकिन सिगरेट भला कहां छुटने वाली। तलब बड़ी चीज होती है यारों।

सालों से मेरी आदत में शुमार रहा है कि जब तलक मैं चार-पांच डंडियां सुलगा न लूं, तब तलक न ढंग से नीचे उतरती है, न चैन से लिख ही पाता हूं। कहने में शर्म कैसी- सिगरेट मेरे लेखन एवं गम की 'हमसफर' रही है। दो-चार तगड़े कश में मुझे पूरी कायनात हसीन नजर आने लगती है।

लेकिन बीड़ी फूंकने का अपना ही मजा है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि जो 'आत्मीय सुख' बीड़ी का एक कश दे सकता है, वो सिगरेट के चार-पांच बंडल भी नहीं। बीड़ी पीके महसूस होता है कि हम हिंदुस्तान की मीटी से गहरे जुड़े हुए हैं। सिगरेट के मुकाबले बीड़ी पीने में 'देशभक्ति' का एहसास ज्यादा होता है।

वित्तमंत्रीजी ने कुछ सोचकर ही बीड़ी को महंगा नहीं किया होगा। चूंकि बजट का पूरा फोकस ही गांव-किसान पर केंद्रित है। इस नाते बीड़ी को तो महंगा होना ही नहीं था। बीड़ी किसान की शान है। आज भी गांव-देहात में ज्यादातर लोग बीड़ी पीते ही नजर आते हैं। बीड़ी की सौंधी गंध को अगर महसूस करना है तो एक दफा ट्रेन के जनरल कोच में यात्रा कर लीजिए। बीड़ी का रह-रहकर उठने वाला धुंआ, दिल को खासा सुकून दे जाता है।

मैं तय कर चुका हूं कि सिगरेट छोड़कर अब से बीड़ी ही पिया करूंगा। बीड़ी पीने में खरचा तो कम है ही, साथ-साथ देशभक्ति की फीलिंग भी बनी रहती है। अगर हीरोईन को बीड़ी का साथ न मिला होता तो 'बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है'- न गा पाती। महज एक बीड़ी ने इस गाने को इत्ता हिट कर डाला कि लोग बीड़ी पीते वक्त गाने की मिसाल देना नहीं भूलते।

उम्मीद करता हूं, वित्तमंत्रीजी का सहारा पाके बीड़ी उद्योग आगे नए मुकाम हासिल करेगा। बीड़ी का उपयोग तो 'स्टार्ट-अप' में भी किया जा सकता है। इस बहाने बीड़ी पर थोड़ा आधुनिकता का पानी ही चढ़ जाएगा। पर अच्छा है न। बीड़ी बढ़ेगी तो देश भी बढ़ेगा। देश का विकास होना चाहिए, चाहे कैसे या कहीं से भी हो।

बजट में हुईं खेती-किसानी की घोषणाओं से जित्ता किसानों के चेहरे खिले हैं, उत्ता ही मेरा भी। देखा दुनिया वालों ऐसे आते हैं 'अच्छे दिन'। बीड़ी की आग को बरकरार रखने के लिए वित्तमंत्रीजी का तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं।