सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

किस्मत के धनी कबीर बेदी

वाकई। क्या 'हैंडसम' किस्मत पाई है कबीर बेदी ने। सत्तर की उम्र में भी 'जोश-ए-जवानी' बरकरार। यहां मैं महज चालीस की उम्र में ही खुद को पिछड़ा-सा महसूस करने लगा हूं। हालांकि फॉटी में नॉटी होना स्वभाविक प्रक्रिया है। लेकिन नॉटी होने मात्र के ख्याल से ही मेरे तो रौंटे खड़े हो जाते हैं। क्या करूं, नॉटी होने के लिए दम चाहिए और मुझमें वो है नहीं। एक बीवी के होते भला कौन अपनी शामत खुद बुलाना चाहेगा।

यकीनन। कबीर बेदी में दम था, जो महज सत्तर साल की उम्र में भी दुल्हा बन गए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी दुल्हन उनसे मात्र तीस साल छोटी है। यों भी, इश्क में उम्र या सीरत नहीं केवल 'दीवानगी' देखी जाती है। सैफ-करीना की एक-दूसरे के प्रति दीवानगी ही तो थी, जो उम्र की दीवार उनके आड़े न आई। अपने आस-पड़ोस में ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे, जहां इश्क की दीवानगी ने अपना रंग जमकर दिखाया है।

काश! ऐसा रंग मैं भी जमा पाता। मगर हर किसी की किस्मत में कबीर बेदी जैसे सुख कहां लिखे होते हैं!

यों भी, बदलते वक्त के साथ इश्क के मायने और पैमाने दोनों बदल गए हैं। अब वो पहले जैसा इश्क न रहा, जहां प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को या तो छतों से ताका करते थे या 'दिल के अरमां आंसूओं में बह गए' टाइप गाने गाया करते थे। अपवाद हो सकते हैं किंतु, मुझे नहीं लगता कि, अब कोई इश्क में आंसू बहाता होगा। तू नहीं कोई और सही की थीम पर चलकर इश्क की राहें अब बहुत आसान और खुल गई हैं।

कबीर बेदी की जिंदगी में भी तो यही सीन रहा। तू नहीं और सही। और नहीं कोई और सही। बनते-बिगड़ते रिश्तों के बीच उन्होंने अपनी बात आखिरकार बना ही ली। इसके कहते हैं लगन। सत्तर की उम्र में कमसीन हसीना का साथ किस्मत वालों को ही नसीब होता है प्यारे। कोई मेरी तरह थोड़े न कि एक के साथ बंध गए तो ताउम्र की वसीयत उसके नाम लिख दी। इस मामले में खुशवंत सिंह क्या कमाल के आदमी थे। अंत तक औरतों के प्रति अपने मोह को उन्होंने जवान व बिंदास बनाए रखा। चचा गालिब भी शराब और शबाब के बीच कित्ता मस्त रहते थे।

आज के जमाने में इश्क की न कोई गारंटी है न वारंटी। जब तलक साथ निभ जाए तो किस्मत मानिए। वरना तो इश्कवालों के लिए हर दिन 'वेलेंटाइन डे' है यहां। दिल का तोता एक डाल से कूदकर दूसरी डाल की मैना को साथ लेकर कब उड़ ले- कोई नहीं जानता।

दिल तो वैसे भी बच्चा है जी। उस पर इल्जाम लगाना बेफजूल है।

अब सोचता हूं तो मुझे खुद पर शर्म आती है कि मैं कैसों-कैसों को अपना 'आदर्श' बनाए बैठे था। काश! कि कबीर बेदी जैसों को अपना आदर्श बनाया होता तो आज मेरी जिंदगी की रौनक कुछ और ही होती। मैं तो 'किस-किस को प्यार करूं' फिल्म के हीरो को भी बड़ा सहासी मानता हूं, जिसने एक-साथ चार बीवियों को संभाला- वो भी हंसी-खुशी।

वैसे, कहिए कुछ भी सब ससुरी किस्मत का खेल है। कुछ ऐसे बंदे भी होते हैं, जिन्हें रीयल में सनी लियोनी जैसी बीवी मिल जाती है। कुछ ऐसे होते हैं, जो सनी लियोनी के वीडियो को देख-देखकर ही अपना दिल बहलाते रहते हैं।

चलिए खैर मेरी न सही पर कबीर बेदी की किस्मत में यों ही चांद-सितारे लटके रहें। उनकी राहें आगे भी खुली रहें। इश्क वो शै है गालिब जिस पर कोई रोक-टोक नहीं। एक से करो या हजारों से फिर भी कम ही लगता है।

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