बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

विचाराधारा से परे रहने का सुख

सबसे बड़ा 'सुकून' यह है कि मेरे कने विचारधारा का डंडा नहीं है। जीवन और लेखन में कभी ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मेरी विचारधारा भी होनी चाहिए। विचाराधारा से बंधा-लिपटा आदमी वैचारिक तौर पर 'अपाहिज' ही होता है। हर वक्त अपनी विचाराधारा के डंडे से कभी इसे तो कभी उसे 'लठियाता' रहता है। जो उसकी विचाराधारा से मेल नहीं खाता, वो उसकी निगाह में घोषित 'फासीवदी' होता है।

मेरे ऐसे तमाम मित्र हैं, जो किसी न किसी विचाराधारा से लगे-बंधे हैं। कई दफा कोशिश भी कर चुके हैं, मुझे अपनी विचाराधारा के दंगल में शामिल करने की। किंतु, हर बार मैंने साफ मना कर दिया है कि प्यारे, मुझे स्वतंत्र ही रहने दो। विचाराधारा का बोझ उठा पाना मेरे बस की बात नहीं। अभी जो संबंध तुम लोगों से हैं, विचाराधारा की लत पड़ने के बाद ये भी जाते रहेंगे।

यों भी, इंसान को अपनी औकात देखकर चादर में पैर फैलाने चाहिए। चादर से बाहर निकले पैर अच्छे नहीं लगते।

विचाराधारा से बंधे रहने की सबसी बड़ी मुसीबत यह है कि जहां कहीं कोई 'विपरित' बात हुई तुरंत विचाराधारा पर संकट आ जाता है। विचारवान लोग कलम लेके ऐसे पिल पड़ते हैं मानो कुतुबमीनार दिल्ली से खिसक कर बरेली शिफ्ट हो गई हो। विचाराधारा को बचाने के वास्ते ऐसे-ऐसे तर्क गढ़ते हैं कि हंसते-हंसते पेट में दर्द हुए बिना नहीं रहता। विचाराधारा पर जब कथित संकट हो तब किसी विचारवान से मिलकर देखिए, मियां ऐसे मुंह लटकाए रहते हैं, जैसे तबेले से कोई उनकी भैंस खोल ले गया हो। चेहरे पर गंभीरता की लकीरें इत्ती गहरी हो जाती हैं अगर उन्हें पढ़ने की कोशिश की जाए तो अगला पागला ही जाए।

विचाराधारा के संकट को वे देश पर संकट मानते हैं। जैसे, देश उन्हीं की विचाराधारा के दम पर चल-फिर रहा हो। किस्म-किस्म की 'खुशफहमियां' पाले रखने में विचारावानों का कोई सानी नहीं। वो तो बस नहीं चलता, नहीं तो वे जानवरों को भी विचारधारा के हिसाब से जीना-रहना बता दें।

यों, जिंदगी में परेशानियां क्या कम हैं, जो विचाराधारा का वबाल अपने सिर और ले लूं। खुद ही देख लीजिए, आजकल तरह-तरह की विचाराधारा वाले आपस में कैसे गुथ्म-गुथ्था हुए जा रहे हैं। मानो, देश भर से सामाजिक चिंताएं बिल्कुल खत्म होके, केवल विचारधारात्म चिंताएं ही बची हों। विचार के नाम पर हर कोई एक-दूसरे की टांग तोड़ने को तैयार है।

बातें चाहे जित्ती लंबी और ऊंची क्यों न पेल लीजिए पर अंतिम सच यही है कि विचारधारा 'रोटी' नहीं दे सकती। रोटी पाने के लिए आपको विचारधारा की खुशफहमियां तो त्यागनी ही होंगी। जमाना अब पहले जैसा न रहा गुरु। कि- विचाराधारा का झंडा पकड़े यहां-वहां दौड़ लगाए जा रहे हैं। जिंदगी दिन-ब-दिन कठिन से कठिन होती जा रही है। ऐसे में विचाराधारा को पाले रखने की ऐंठ, कहीं न रख छोड़ेगी।

इसीलिए मैंने सबसे पहले खुद को विचारवानों और विचारधारों के जाल-जंजाल से मुक्त किया। स्वतंत्र रहकर मैं ज्यादा खुश रह लेता हूं। ये क्या कि मैं अपनी विचारधारा की ऐंठ में दूसरे से मन ही मन कुढ़ता रहूं। न जी न यह मुझे कतई मंजूर नहीं।

जिंदगी को विचारधारा से परे रखकर और भी 'मस्त' तरीके से जिया जा सकता है। तब आपके साथ किस्म-किस्म की वैचारिक छूआ-छूता तो नहीं रहती। यों भी, दुनिया में और भी गम हैं, विचाराधारा के सिवा।

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