मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

मेरी देशभक्ति, तेरी देशभक्ति

इन दिनों देशभक्ति का जज्बा अपने चरम पर है। जिसे देखो वही देशभक्त बनने को आतुर हुआ बैठा है। जो देशभक्त नहीं हैं, वे होने की प्रक्रिया में तन-मन से लगे हैं। उम्मीद है, जल्द ही वे इस 'उपलब्धि' को पा लेंगे।

सबको देशभक्त बनता देख भला मेरी देश के प्रति भक्ति कैसे नहीं जागेगी। आखिर मैं भी इस देश का बाशिंदा हूं। अपनी देशभक्ति का वर्तमान-भविष्य जानने के लिए कल मैं अपने ज्योतिषी के पास गया था। उन्होंने मेरा हाथ देखकर 'आश्वस्त' कर दिया है कि मेरे भीतर देशभक्ति की लकीरें बहुत लंबी व गहरी हैं। बस करना मुझे इत्ता है कि अपनी देशभक्ति को हर वक्त जिंदा रखने के लिए कुछ मंत्र पढ़ने व कायदे मानने हैं। वो तो मैं कर ही लूंगा। आखिर देशभक्ति का सवाल है।

देख रहा हूं, आजकल बुद्धिजीवि टाइप के लोग मेरी देशभक्ति, तेरी देशभक्ति की तगड़ी बहस में उलझे हुए हैं। ताजा जेएनयू प्रकरण से तो देशभक्ति और देशद्रोह पर बड़ी जमकर बमचक मची है। विडंबना ये है कि देशद्रोह-देशद्रोह चिल्लाने वाले खुद को 'डिफेंड' करने में लगे हैं। और, उधर देशभक्त टाइप के लोग उन पर उबले चले जा रहे हैं। शिक्षा संस्थान का मामला सड़क से लेकर नेताओं के दरबार तक पहुंच गया है। सब अपने-अपने तरीके से मुद्दे का मजा ले रहे हैं।

कुछ को ऐसा महसूस हो रहा है कि देशभक्ति ने नाम पर एक विचारधारा को दबाने की कोशिशें हो रही हैं। अतः वे अपनी विचाराधारा के साथ-साथ अपने अस्तित्व को जिंदा रखने के लिए सरकार की ईंट से ईंट बजाने में लगे हैं। जगह-जगह हो-हल्ले का दौर जारी है। पर सबसे ज्यादा हंगामा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कट रहा है। चूंकि ये खुला प्लेटफार्म है, तो जिसके मन में जो आ रहा है, यहां चेंपने में लगा हुआ है।

असहमतियों से होती हुई बात हाथापाई तक उतर आई है। बहस के दरवाजे हमने एकदम बंद कर दिए हैं। देशभक्ति का करंट कथित देशभक्तों की रगों में इत्ती तेजी से दौड़ रहा है कि कुछ पूछिए मत। माहौल को भांपते हुए मैंने अपने मोहल्ले के सभासद से अपनी देशभक्ति का सार्टिफिकेट बनवाकर अपनी जेब में रख लिया। क्या पता, कब जरूरत पड़ जाए।

जेएनयू प्रकरण को देखते हुए, ऐसा महसूस हो रहा है कि हमारे देश से तमाम सामाजिक एवं आर्थिक चिंताओं का अंत हो गया है। सब सुखी एवं समृद्ध हो लिए हैं। देश में विकास का ढांचा इत्ता मजबूत हो गया है कि कई बरसों तक इसका टूट पाना असंभव-सा जान पड़ता है। इसीलिए दीन-दुनिया से बेखबर होकर हम सब जेएनयू के बहाने अपनी-अपनी देशभक्ति को दिखाने में लगे हैं।

अच्छा देशभक्त वो भी कम बड़े नहीं थे, जिन्होंने कन्हैया कुमार की पिटाई कर दी। शायद उन्हें अपनी देशभक्ति से इत्ता प्यार है कि वे असहमति पर बहस से ज्यादा मार-कुटाई में यकीन रखते हैं। चलिए खैर जैसी उनकी मर्जी। लोकतंत्र में तो हर बंदा अपनी इच्छा का मालिक होता है।
इसीलिए तो मैंने पहले ही अपनी देशभक्त को सेट कर लिया। ताकि कल को कोई मुझ पर उंगुली न उठा पाए।

वाकई, देशभक्ति के मसले बड़े तगड़े होते हैं। मेरी विचार में तो सरकार को आधार कार्ड की तर्ज पर देशभक्ति कार्ड बनवाने की मुहिम शुरू करवा देनी चाहिए। ताकि कल को कोई 'मेरी देशभक्ति तेरी देशभक्ति से पवित्र कैसे' टाइप झगड़े न करने लगे।

आगे कथित देशभक्ति, देशभक्तों एवं देशद्रोह का मामला कैसे बैठे, यह तो वक्त ही बताएगा। मगर हां जेएनयू प्रकरण के बहाने वैचारिक मत-भिन्नताओं की जो ऐसी-तैसी की-करी गई, वाकई दिलचस्प अनुभव रहा। वाद और विचारधारा के प्रति लगाव 'अलगाव' का रास्ता भी अख्तियार कर सकता है। गजब।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन देश की पहली मिसाइल 'पृथ्वी' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...