गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

'जीका' बनाम 'जी' का वायरस

ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं कि दुनिया किसी न किसी बात पर 'परेशान' न हुई हो। बहाना चाहे कोई भी हो दुनिया अपने तईं परेशान होने की वजह ढूंढ ही लेती है। आदिकाल से दुनिया का कुछ ऐसा ही 'नेचर' रहा है। ऐसे मौके कम ही आए हैं, जब मैंने दुनिया को पूरी तरह से 'खुश' देखा हो।

ताजा खबर यह है कि दुनिया इस वक्त जीका नाम के वायरस से परेशान है। लगभग हर रोज एकाध खबर जीका वायरस के प्रभाव पर अखबारों में होती ही है। जीका वायरस के लक्षण बताकर, उससे बचने की हिदायदें लोगों को दी जा रही हैं। दुनिया भर के साइंटिस्ट लगे हुए हैं, जीका वायरस के अंत की दवा खोजने में।

सुनाई में आ रहा है कि जीका वायरस कोई नया नहीं है। संभवता सत्तर के दशक से दुनिया के कुछ देशों में अपना असर रख चुका है। लेकिन इधर काफी तेजी से बढ़ा है, ठीक स्वाइन फ्लू और डेंगू की तरह। गौरतलब ये है कि इस वायरस को फैलाने में मच्छर का ही हाथ है। अभी हम डेंगू के मच्छर से तो कंप्लीट मुक्ति पाए नहीं हैं, ऊपर से जीका वायरस का मच्छर और आ गया है, दहशत फैलाने को।

मैंने देखा है, आदमी अब शेर या चीते से इत्ता नहीं, जित्ता कथित मच्छर से डरने लगा है। शरीर के किसी भाग पर मच्छर बैठ तो जाए जरा, तुरंत यों उड़ता है, जैसे पतंग। मच्छर भीतर न आए या रात को सोते वक्त परेशान न करे, इसके लिए तमाम प्रकार की कवायदें, आदमी करता रहता है। बेचारे मच्छरों को मारने के लिए जाने कित्ते प्रकार के तो 'हिट' और 'क्वाइल' आ गए हैं। मच्छर भी बड़ा 'बेशर्म' है, उस पर किसी कीटनाशक का अब असर ही न होता।

इंसानों को काट-कूटके मच्छर चैन से अपनी जिंदगी जी रहा है। उसके काटे का करते रहो इलाज और खोजते रहो किस्म-किस्म की दवाईयां, उसकी सेहत पर कोई फर्क न पड़ने वाला।

दुनिया तो अब जीका वायरस के उत्पीड़न का शिकार हुई है, यहां तो इश्क में धोखा खाया, हर आशिक अपने जी के वायरस का शिकार है। आशिकों के लिए इश्क जी का वायरस ही तो है। ये तो ऐसा वायरस है, जिसकी दवा हकिम लुकमान से लेकर चचा गालिब कने तक न थी। जो इश्क के जंजाल में पड़ा, समझो अपने जी से गया। जीका वायरस का तो इलाज देर-सवेर साइंटिस्ट खोज ही लेंगे लेकिन आशिकों के जी का इलाज खोज पाना किसी के बस की बात नहीं प्यारे।

लुत्फ ये है कि दुनिया जीका वायरस का जिक्र कर परेशान तो होती रहती है किंतु इश्क में चोट खाए अपने जी का जिक्र किसी से न करती। जबकि इंसान के शरीर का सारा दरोमदार जी पर ही टिका है।

थोड़ी गलती दुनिया की भी है कि वो प्रत्येक वायरस को यों ही दिल पर ले लेती है। हालांकि बहुत अच्छी तरह से जानती है कि इस वायरस की वजह वो खुद है। मगर स्वीकार नहीं करेगी। फिजा में जब इत्ती गंदगी घोल दोगे तो जीका-डेंगू टाइप के वायरस-मच्छर की पनपेंगे। फिर रोते हैं कि हाय! हवा प्रदूषित हो रही है।

मेरी मानो तो जीका की चिंता छोड़कर अपने जी की फिकर करो। जी मस्त तो हर वायरस को पस्त समझिए। मुझे तो अक्सर दया आती है, उन बेचारे आशिकों पर जिन्होंने इश्क में पड़कर अपने जी को वायरस सरीखा बना दिया है। जबकि आज के भयंकर तकनीकी दौर में एक छोड़ दूसरे से दिल बहलाने के इत्ते ऑप्शन मौजूद हैं। मगर क्या करें, उन्हें तो कथित इश्क में अपने जी को गंवाना ही मंजूर है।

एक दफा अपने 'जी' को साफ कर लो फिर मजाल है जीका वायरस की जो दुनिया को परेशान करना तो दूर छू भी पाए!

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