शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

दिल और इश्क में 'नो' गारंटी

दिल और इश्क दोनों हर बंधन से मुक्त होते हैं। दिल कब, कहां, किस पर आ जाए कुछ कह नहीं सकते। इश्क कब, कहां, किससे हो जाए कोई नहीं जानता। हालांकि इश्क का रास्ता दिल की गली से होकर गुजरता जरूर है पर बीच में कहां अटक जाए कोई गारंटी नहीं।

फिर भी, जो लोग गारंटी के आधार पर इश्क करते या दिल देते हैं, वो बड़े ही 'यथास्थितिवादी' होते हैं। अमां, जब फैशन के दौर में स्टाइल की गारंटी नहीं मिलती फिर भला इश्क में गारंटी कैसी। वो भी आज के दौर में दिल और इश्क को काबू में रखना, सूरज को दीया दिखाने समान है।

बीत गए वो जमाने जब प्रेमी-प्रेमिका इश्क में साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाया करते थे। 'हम बने, तुम बने एक-दूजे के लिए' टाइप गाने गाया करते थे। अब सबकुछ 'इंस्टेंट' है। इश्क अब निगाहों से नहीं, फेसबुक-वाट्सएप के माध्यम से होता है। चूंकि प्रेमी-प्रेमियों कने वक्त की कमी रहती है, तो वे सोशल मीडिया पर ही एक-दूसरे से मिल लिया करते हैं। यहीं खुलकर इश्क फरमाते हैं। दो-चार काम-चलाऊ कसमें-वसमें खा लेते हैं। जब नहीं संभाल पाते, तब यहीं 'ब्रेक-अप' भी कर लेते हैं। 'बोल्ड' इत्ते होते हैं कि ब्रेक-अप के बाद अपने चेहरों पर न गम रखते हैं न शिकन। रात गई, बात गई।

बदलते वक्त के साथ इश्क में विकल्प बढ़े हैं। इश्कबाजों के लिए तो हर दिन वैलेंटाइन और प्रपोज डे है। यहां से छूटे तो वहां अटके। जहां अटके हैं, वहां की कोई गारंटी नहीं कि कब तलक अटके रहेंगे। जहां बेहतर 'चॉव्इस' मिलेगी, बंदा वहीं भागेगा।

सही भी है न। इश्क को ज्यादा लंबा खींचने से क्या फायदा। न ही कोई फायदा लंबे-चौड़े वायदे करने से है। पहले किसी जमाने में प्रेमी-प्रेमिका करते रहते होंगे ताउम्र एक-दूसरे का 'इंतजार' मगर अब ऐसा कोई लफड़ा नहीं। इंतजार तो बहुत दूर की बात रही, यहां तो वाट्सएप का मैसेज सेंड करने में बंदा अगर दो सेकेंड की देरी कर दे, तो दुनियाभर की गालियां उसे सुनने को मिल जाती हैं। विकट टाइप के झगड़े हो लेते हैं अगर प्रेमिका फेसबुक पर अपनी सेल्फी पोस्ट करे और प्रेमी लाइक न ठोके। बेचारे को एक लाइक न देने के कीमत ब्रेक-अप के रूप में चुकानी पड़ती है।

वैलेंटाइन डे तो महज बहाना है। असली मकसद तो भिन्न-भिन्न टाइप के विकल्प तलाश करना है। जिसके कने जित्ते विकल्प होंगे, वो ही सबसे अधिक सुखी होगा। बाकी तो सब बातें हैं, बातों का क्या। इश्क बातों से नहीं दिमाग से किया जाता है। दिल जिसे दिया जाता है, उसकी न कोई गारंटी होती है, न वारंटी।

इश्क में वैरिएशन आ जाने से, उम्मीद करता हूं, दिल को काफी तसल्ली मिली होगी। नहीं तो पहले बेचारा दिल एक ही के गम में जाने कित्ते जुलम सहा करता था। हर वक्त 'जब दिल ही टूट गया, जीके क्या करेंगे' टाइप फीलिंग से ग्रस्त रहता था। देवदास पी-पीके दिल की वाट लगाए रहता था। 'इस दिल के टुकड़े हजार हुए, इक यहां गिरा, इक वहां गिरा'- जैसे गानों के हाथों मजबूर था।

सोशल नेटवर्किंग और टेक्नॉलजी ने इश्क में दिल की टूटन को बहुत हद तक बचाया है। दिल अब ज्यादा उन्मुक्त होकर जीता है। न प्रेमी न प्रेमिका अपने दिल की कोई गारंटी नहीं देते। जहां जिस पर आ गया ठीक। नहीं आया कोई बात नहीं। भीड़ में हजारों विकल्प मौजूद हैं।

कुछ भी कहिए पर मुझे इंस्टेंट इश्क मस्त लगता है। दो मिनट में मैगी की तरह सबकुछ तैयार। खा-पीके चैन से रहो। न कोई रोक, न कोई टोक। तुम अपने फेसबुक पर खुश, हम अपने वाट्सएप पर। दिल को भी सुकून खामखा की टेंशन मोल लेने से।

इश्क और दिल में गारंटियां जित्ती कम रहेंगी, लाइफ में मस्तियां उत्ती अधिक रहेंगी। चाहे वैलेंटाइन डे हो या किस डे विकल्प हमेशा अपने पास रखो ताकि बाद में पछताना न पड़े। समझ गए न प्यारे।

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

इश्क और दिल में गारंटियां जित्ती कम रहेंगी, लाइफ में मस्तियां उत्ती अधिक रहेंगी। चाहे वैलेंटाइन डे हो या किस डे विकल्प हमेशा अपने पास रखो ताकि बाद में पछताना न पड़े.... बहुत सही ..चाबी अपने हाथ में ...
जब किसी के भी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं रहता कब छूट जाय तो फिर क्यों का खुश रहना बस दिखावा न हो ...