सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

नहाने से एलर्जी

मैं नहाने का चोर हूं। मन नहीं होता तो हफ्तों तक नहीं नहाता। न नहाने का सिलसिला जैसा गर्मियों में बना रहता है, वैसा ही जाड़ों में भी। बल्कि जाड़ों में थोड़ा और बढ़ जाता है। जाड़ों में नहाने का झंझट गर्मियों से अधिक होता है। जित्ती एलर्जी मुझे जाड़े से है, उत्ती ही नहाने से भी। मेरा बस चले तो मैं दोनों के खिलाफ 'असहिष्णुता' फैलाने का केस दर्ज करवा दूं।

नहाना मुझे वक्त की बर्बादी सरीखा काम लगता है। कोई काम पास न हो तो चलो नहा ही लो। ये क्या बात हुई भला? मैंने तो नहाने के ऐसे-ऐसे 'दीवाने' देखे हैं, जो गर्मियों-जाड़ों-बरसातों में दो-तीन दफा नहा लेते हैं। पूछने पर तर्क देते हैं- नहाने से शरीर का मैल दूर है। शरीर सुंदर-स्वस्थ बनता है। दिनभर ऊर्जा बनी रहती है। अच्छे विचार दिमाग में आते हैं।

है न कित्ती बेतुकी बातें। नहाने से अगर शरीर का मैल दूर हो रहा होता तो मैं रोज न नहाता! मेरा तो हफ्तों न नहाने के बाद भी शरीर टनाटन चमकता रहता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बाजार में हजारों तरीके के क्रीम-पॉउडर-डियो-परफ्यूम मौजूद हैं, उन्हें लगाइए न। पता भी नहीं चलेगा कि आप नहाए हुए हैं या नहीं।

मेरे शरीर में बिन नहाए ही इत्ती 'ऊर्जा' बनी रहती है, जित्ती रोज नहाने वालों के पास भी न होती होगी। जित्ती देर लोग नहाने में लगाते हैं न, उत्ती देर में तो मैं दो-तीन व्यंग्य लिख सकता हूं। कभी-कभी तो मैं नहाना इसलिए भी कैंसल कर देता हूं क्योंकि मुझे लिखना होता है। लिखने के लिए मैं नहाना तो क्या दाढ़ी बनाना भी छोड़ सकता हूं। वैसे, दाढ़ी बनाना भी कम 'बोरिंग' काम नहीं। इसमें भी बहुत सारा टाइम खोटी होता है।

जरूर वो धरती का सबसे महामूर्ख प्राणी रहा होगा, जिसने नहाने और दाढ़ी बनाने का कॉसेप्ट हमें दिया। खुद तो नहाके निकल लिया, मुसीबत हमारी जान को छोड़ गया। नहाने को आदमी ने अपना ऐसा रोटिन बना लिया कि हवा-पानी निपटाने के बाद दूसरा काम वो नहाने का ही करता है। खुद तो नहाता ही है, दूसरे की जान यह पूछ-पूछकर सांसत में डाल देता कि अभी नहाए कि नहीं। जैसे- नहाकर आदमी गंगाजल जित्ता पवित्र हो जाएगा।

मुझमें और पत्नी में अक्सर नहाने को लेकर ही तगड़े झगड़े होते रहते हैं। उसे नहाना पसंद है, मुझे नहाने से ऐलर्जी। एक नहाने-ना-नहाने की बात पर अक्सर हमारे बीच तलाक लेने तक की नौबत आ जाती है। मैंने उसे कित्ती ही दफा समझाया कि नहाना वक्त की बर्बादी है। पर बात उसके पल्ले ही नहीं पड़ती। हर वक्त यही जिद करती रहती है, नहाकर ऑफिस जाया करो।.. नहाकर नाशता किया करो।.. नहाकर पूजा किया करो।..

इत्ती सर्दी में कोई मूर्ख ही होगा, जो सुबह उठकर नहाएगा। सर्दियां सुबह-सुबह रजाई में लेटे रहने के लिए होती हैं या नहाने के लिए। एंवई गरम शरीर को कष्ट देने से क्या फायदा! नहाने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है। कभी भी नहा लेंगे। नहाकर मुझे कौन-सा चुस्त और स्वस्थ लोगों की मंडली में शामिल होना है। फिलहाल, कैसे भी करके मैं खुद को नहाने से बचाने में कामयाब हो ही जाता हूं। भले ही हमारे बीच लफड़े कित्ते भी होते रहें।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। जब यहां सबको अपनी मर्जी का बोलने-लिखने-पढ़ने-खाने-पीने-देखने-घूमने-नाचने-सोने-रहने-अफेयर करने की आजादी है, तो न नहाने की भी तो आजादी होनी चाहिए कि नहीं। बंदे की मर्जी होगी तो नहाएगा। नहीं होगी नहीं नहाएगा। न नहाने वालों के प्रति भी हमें 'सभ्य' बना होगा। जरूर नहीं सारे पवित्र या अच्छे काम नहाकर ही किए जाएं। न नहाकर भी तो किए जा सकते हैं। कोई लिखकर थोड़े न देना होता है कि फलां काम नहाकर किया है, अलां काम न नहाकर।

मैंने तो खैर बरसों पहले निकाल दिया था, आप भी अपने दिमाग से निकाल दीजिए कि नहाना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है। कोई निशानी-फिशानी नहीं है। खुद को 'खुशफहमी' में बनाए रखने के चोचलें हैं। क्रांति नहाकर भी की जा सकती है और न नहाए भी। बस सोच-सोच का फर्क है।

2 टिप्‍पणियां:

निशांत मिश्र ने कहा…

लोग पता नहीं कैसे महीना भर तक बिना नहाए रह जाते हैं. मुझे तो दो हफ्ते में ही खुजली होने लगती है.

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन निर्दोष साबित हों भगत सिंह और उनके साथी में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...