रविवार, 28 फ़रवरी 2016

सेल्फी स्टिक की मार्केटिंग

पिछले दिनों एक मार्केटिंग का बंदा मुझसे टकराया। टकराते ही पूछा- 'क्या आपके पास सेल्फी स्टिक है?' मैं कहा- 'नहीं'। उसने बेहद आश्चर्यात्मक नजरों से मुझे घूरा और कहा- 'क्या बात करते हैं सर। आपके पास सेल्फी स्टिक नहीं है।' दो सेकेंड को तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरे कने सेल्फी स्टिक का 'न' होना दुनिया का सबसे अजूबा वाकया है। और, मैं बिना सेल्फी स्टिक के दोयम दर्जे का प्राणी हूं।

फिर भी, खुद को संभालते हुए मैंने उसे जवाब दिया- 'क्या हुआ अगर मेरे पास सेल्फी स्टिक नहीं है। ऐसा कोई शौक नहीं मुझे।' इत्ता सुनते ही उसने जोर का ठहाका लगाया। मेरे कंधे पर हाथ जमाते हुए बोला- 'सर, आपको मालूम नहीं। सेल्फी स्टिक स्मार्टफोन रखने वालों का 'स्टेटस सिंबल' है। इस स्टिक की हेल्प से आप खुद की कभी भी, कहीं भी ले सकते हैं सेल्फी। आज का दौर सेल्फी का है। अगर शौक नहीं है तो पालिए सर।'

मैंने उसे बीच में टोकते हुए कहा- 'यार, पहले से जो शौक पाल रखे हैं, वो तो कम हो न रहे। और तुम और शौक पालने को कह रहे हो। ये भी क्या शौक है कि आड़े-तिरछे मुंह या होंठ बनाकर भिन्न-भिन्न ऐंगल से अपनी ही सेल्फियां लेते रहो। छड़ी की हेल्प से सेल्फी लेने का नया रिवाज चल पड़ा है। हद है।'

मार्केटिंग का बंदा थोड़ा कूल हुआ। मुझे पड़ोस के रेस्त्रां में ले गया। दो कोल्ड ड्रिंक और पिज्जा आर्डर किए। फिर अपने बैग से एक छड़ी और कुछ पेपर्स निकाले। अब वो मुझे समझाने की मुद्रा में आया। बोला- सर, हमारी कंपनी सेल्फी स्टिक बनाती है। ये रही हमारी कंपनी की बनाई सेल्फी स्टिक। दूसरी कंपनियों से लाख गुना बेहतर। देखने में हॉट। चलने में कूल। पकड़ने में मोर-कंफर्टेबल। किसी भी आकार-प्रकार के स्मार्टफोन को आप इसमें फंसाकर अपनी 'यूनिक सेल्फी' ले सकते हैं।

फिर उसने मेरा स्मार्टफोन लेकर उस कथित छड़ी में घुसेड़ा। और सेल्फी ली। एक सेल्फी कोल-ड्रिंक पीते और एक पिज्जा खाते हुए, जिसे उसने अपने बॉस को वाट्सएप कर दिया। ताकि बॉस को भी लगे बंदा कस्मटर को खिला-पिलाकर पटा रहा है।

इत्ते पर भी मैंने उससे यही कहा- 'यार, फिलहाल तो मुझे इस छड़ी की अभी जरूरत नहीं। जब होगी तुम्हें कॉल कर दूंगा।' मगर वो ठहरा मार्केटिंग का घाघ बंदा। इत्ती जल्द कैसे हार मान जाता। फिर उसने मुझे 'इमोशनली ब्लैकमेल' करना शुरू किया। बोला- 'आपकी वाइफ की बर्थडे कब है?' मैंने कहा- 'अभी टाइम है। क्यों?' 'अरे कुछ नहीं सर यों ही पूछा। मेरी मानो इस बर्थडे आप अपनी वाइफ को सेल्फी स्टिक का गिफ्ट दे डालो। गारंटी इसे पाकर वे बहुत खुश होंगी। जरा सोचिए, सेल्फी स्टिक से जब आप अपनी 'कपल-सेल्फी' फेसबुक पर पोस्ट करेंगे। कित्ते सारे लाइक आपके खाते में जमा होंगे। तब आप भी सीना तानकर कह सकेंगे, मेरे कने सेल्फी स्टिक है।'

'सर, एक दफा इस्तेमाल करके तो देखिए। अभी हमारी कंपनी एक पर दो का ऑफर दे रही है। बेहद रीजनेबल रेट्स में। डू ट्राई दिस सर।'

बातों ही बातों में कोल-ड्रिंक और पिज्जा दोनों खत्म हो चुके थे। वेटर बिल ले आया था। मैंने पे करने को जैसे ही पर्स निकाला बंदे ने मुझे रोककर खुद ही पेमेंट कर दिया। बोला- 'कस्टमर गॉड समान होता है।'

वाकई मार्केटिंग के लिए अक्ल से ज्यादा व्यवहार की जरूरत होती है। नए बकरे कैसे फंसाए जाते हैं, यही तो मार्केटिंग का सबसे पहला टेक्ट होता है।

'तो क्या सोचा सर आपने।' मुझे ध्यान से भटकाते हुए उसने पूछा। 'ले लीजिए। कहीं बाद में आपको पछताना न पड़े। वाइफ का बर्थडे गिफ्ट... याद है न सर।'

अब ज्यादा उससे मैं क्या हुज्जत करता। इत्ता टाइम तो मेरा वो पहले की खराब कर चुका था। फिलहाल, सेल्फी छड़ी (स्टिक) लाने के लिए मैंने हां कर ही दी। सोचा, बदलते वक्त के साथ जब स्मार्टफोन जरूरत बन गया है तो सेल्फी स्टिक भी बन जाएगी। यों, आज के दौर में आदमी की पहचान या तो एचडी टीवी से होती है या फिर स्मार्टफोन से। व्यवहार, रूतबा या आदत बाद की बातें हैं।

बहरहाल, सेल्फी स्टिक के आ जाने से घर में 'उत्सव' का सा माहौल है। कुछ कद्र मेरी भी बढ़ गई है।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

विचाराधारा से परे रहने का सुख

सबसे बड़ा 'सुकून' यह है कि मेरे कने विचारधारा का डंडा नहीं है। जीवन और लेखन में कभी ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मेरी विचारधारा भी होनी चाहिए। विचाराधारा से बंधा-लिपटा आदमी वैचारिक तौर पर 'अपाहिज' ही होता है। हर वक्त अपनी विचाराधारा के डंडे से कभी इसे तो कभी उसे 'लठियाता' रहता है। जो उसकी विचाराधारा से मेल नहीं खाता, वो उसकी निगाह में घोषित 'फासीवदी' होता है।

मेरे ऐसे तमाम मित्र हैं, जो किसी न किसी विचाराधारा से लगे-बंधे हैं। कई दफा कोशिश भी कर चुके हैं, मुझे अपनी विचाराधारा के दंगल में शामिल करने की। किंतु, हर बार मैंने साफ मना कर दिया है कि प्यारे, मुझे स्वतंत्र ही रहने दो। विचाराधारा का बोझ उठा पाना मेरे बस की बात नहीं। अभी जो संबंध तुम लोगों से हैं, विचाराधारा की लत पड़ने के बाद ये भी जाते रहेंगे।

यों भी, इंसान को अपनी औकात देखकर चादर में पैर फैलाने चाहिए। चादर से बाहर निकले पैर अच्छे नहीं लगते।

विचाराधारा से बंधे रहने की सबसी बड़ी मुसीबत यह है कि जहां कहीं कोई 'विपरित' बात हुई तुरंत विचाराधारा पर संकट आ जाता है। विचारवान लोग कलम लेके ऐसे पिल पड़ते हैं मानो कुतुबमीनार दिल्ली से खिसक कर बरेली शिफ्ट हो गई हो। विचाराधारा को बचाने के वास्ते ऐसे-ऐसे तर्क गढ़ते हैं कि हंसते-हंसते पेट में दर्द हुए बिना नहीं रहता। विचाराधारा पर जब कथित संकट हो तब किसी विचारवान से मिलकर देखिए, मियां ऐसे मुंह लटकाए रहते हैं, जैसे तबेले से कोई उनकी भैंस खोल ले गया हो। चेहरे पर गंभीरता की लकीरें इत्ती गहरी हो जाती हैं अगर उन्हें पढ़ने की कोशिश की जाए तो अगला पागला ही जाए।

विचाराधारा के संकट को वे देश पर संकट मानते हैं। जैसे, देश उन्हीं की विचाराधारा के दम पर चल-फिर रहा हो। किस्म-किस्म की 'खुशफहमियां' पाले रखने में विचारावानों का कोई सानी नहीं। वो तो बस नहीं चलता, नहीं तो वे जानवरों को भी विचारधारा के हिसाब से जीना-रहना बता दें।

यों, जिंदगी में परेशानियां क्या कम हैं, जो विचाराधारा का वबाल अपने सिर और ले लूं। खुद ही देख लीजिए, आजकल तरह-तरह की विचाराधारा वाले आपस में कैसे गुथ्म-गुथ्था हुए जा रहे हैं। मानो, देश भर से सामाजिक चिंताएं बिल्कुल खत्म होके, केवल विचारधारात्म चिंताएं ही बची हों। विचार के नाम पर हर कोई एक-दूसरे की टांग तोड़ने को तैयार है।

बातें चाहे जित्ती लंबी और ऊंची क्यों न पेल लीजिए पर अंतिम सच यही है कि विचारधारा 'रोटी' नहीं दे सकती। रोटी पाने के लिए आपको विचारधारा की खुशफहमियां तो त्यागनी ही होंगी। जमाना अब पहले जैसा न रहा गुरु। कि- विचाराधारा का झंडा पकड़े यहां-वहां दौड़ लगाए जा रहे हैं। जिंदगी दिन-ब-दिन कठिन से कठिन होती जा रही है। ऐसे में विचाराधारा को पाले रखने की ऐंठ, कहीं न रख छोड़ेगी।

इसीलिए मैंने सबसे पहले खुद को विचारवानों और विचारधारों के जाल-जंजाल से मुक्त किया। स्वतंत्र रहकर मैं ज्यादा खुश रह लेता हूं। ये क्या कि मैं अपनी विचारधारा की ऐंठ में दूसरे से मन ही मन कुढ़ता रहूं। न जी न यह मुझे कतई मंजूर नहीं।

जिंदगी को विचारधारा से परे रखकर और भी 'मस्त' तरीके से जिया जा सकता है। तब आपके साथ किस्म-किस्म की वैचारिक छूआ-छूता तो नहीं रहती। यों भी, दुनिया में और भी गम हैं, विचाराधारा के सिवा।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

मेरी देशभक्ति, तेरी देशभक्ति

इन दिनों देशभक्ति का जज्बा अपने चरम पर है। जिसे देखो वही देशभक्त बनने को आतुर हुआ बैठा है। जो देशभक्त नहीं हैं, वे होने की प्रक्रिया में तन-मन से लगे हैं। उम्मीद है, जल्द ही वे इस 'उपलब्धि' को पा लेंगे।

सबको देशभक्त बनता देख भला मेरी देश के प्रति भक्ति कैसे नहीं जागेगी। आखिर मैं भी इस देश का बाशिंदा हूं। अपनी देशभक्ति का वर्तमान-भविष्य जानने के लिए कल मैं अपने ज्योतिषी के पास गया था। उन्होंने मेरा हाथ देखकर 'आश्वस्त' कर दिया है कि मेरे भीतर देशभक्ति की लकीरें बहुत लंबी व गहरी हैं। बस करना मुझे इत्ता है कि अपनी देशभक्ति को हर वक्त जिंदा रखने के लिए कुछ मंत्र पढ़ने व कायदे मानने हैं। वो तो मैं कर ही लूंगा। आखिर देशभक्ति का सवाल है।

देख रहा हूं, आजकल बुद्धिजीवि टाइप के लोग मेरी देशभक्ति, तेरी देशभक्ति की तगड़ी बहस में उलझे हुए हैं। ताजा जेएनयू प्रकरण से तो देशभक्ति और देशद्रोह पर बड़ी जमकर बमचक मची है। विडंबना ये है कि देशद्रोह-देशद्रोह चिल्लाने वाले खुद को 'डिफेंड' करने में लगे हैं। और, उधर देशभक्त टाइप के लोग उन पर उबले चले जा रहे हैं। शिक्षा संस्थान का मामला सड़क से लेकर नेताओं के दरबार तक पहुंच गया है। सब अपने-अपने तरीके से मुद्दे का मजा ले रहे हैं।

कुछ को ऐसा महसूस हो रहा है कि देशभक्ति ने नाम पर एक विचारधारा को दबाने की कोशिशें हो रही हैं। अतः वे अपनी विचाराधारा के साथ-साथ अपने अस्तित्व को जिंदा रखने के लिए सरकार की ईंट से ईंट बजाने में लगे हैं। जगह-जगह हो-हल्ले का दौर जारी है। पर सबसे ज्यादा हंगामा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कट रहा है। चूंकि ये खुला प्लेटफार्म है, तो जिसके मन में जो आ रहा है, यहां चेंपने में लगा हुआ है।

असहमतियों से होती हुई बात हाथापाई तक उतर आई है। बहस के दरवाजे हमने एकदम बंद कर दिए हैं। देशभक्ति का करंट कथित देशभक्तों की रगों में इत्ती तेजी से दौड़ रहा है कि कुछ पूछिए मत। माहौल को भांपते हुए मैंने अपने मोहल्ले के सभासद से अपनी देशभक्ति का सार्टिफिकेट बनवाकर अपनी जेब में रख लिया। क्या पता, कब जरूरत पड़ जाए।

जेएनयू प्रकरण को देखते हुए, ऐसा महसूस हो रहा है कि हमारे देश से तमाम सामाजिक एवं आर्थिक चिंताओं का अंत हो गया है। सब सुखी एवं समृद्ध हो लिए हैं। देश में विकास का ढांचा इत्ता मजबूत हो गया है कि कई बरसों तक इसका टूट पाना असंभव-सा जान पड़ता है। इसीलिए दीन-दुनिया से बेखबर होकर हम सब जेएनयू के बहाने अपनी-अपनी देशभक्ति को दिखाने में लगे हैं।

अच्छा देशभक्त वो भी कम बड़े नहीं थे, जिन्होंने कन्हैया कुमार की पिटाई कर दी। शायद उन्हें अपनी देशभक्ति से इत्ता प्यार है कि वे असहमति पर बहस से ज्यादा मार-कुटाई में यकीन रखते हैं। चलिए खैर जैसी उनकी मर्जी। लोकतंत्र में तो हर बंदा अपनी इच्छा का मालिक होता है।
इसीलिए तो मैंने पहले ही अपनी देशभक्त को सेट कर लिया। ताकि कल को कोई मुझ पर उंगुली न उठा पाए।

वाकई, देशभक्ति के मसले बड़े तगड़े होते हैं। मेरी विचार में तो सरकार को आधार कार्ड की तर्ज पर देशभक्ति कार्ड बनवाने की मुहिम शुरू करवा देनी चाहिए। ताकि कल को कोई 'मेरी देशभक्ति तेरी देशभक्ति से पवित्र कैसे' टाइप झगड़े न करने लगे।

आगे कथित देशभक्ति, देशभक्तों एवं देशद्रोह का मामला कैसे बैठे, यह तो वक्त ही बताएगा। मगर हां जेएनयू प्रकरण के बहाने वैचारिक मत-भिन्नताओं की जो ऐसी-तैसी की-करी गई, वाकई दिलचस्प अनुभव रहा। वाद और विचारधारा के प्रति लगाव 'अलगाव' का रास्ता भी अख्तियार कर सकता है। गजब।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

251 का मोबाइल, इससे सस्ता और क्या लोगे

दुनिया या लोग चाहे कुछ कहें मगर मैं सस्ती चीज के प्रति अपना आकर्षण कभी नहीं छोड़ सकता। सस्ती चीज को पाने के लिए चाहे मुझे पताल लोक तक का चक्कर क्यों न काटना पड़े, कभी पीछे नहीं हटूंगा। मेरा मानना है, जो शांति, सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता एवं सुकून सस्ती चीज को पाने में हैं, वो अन्यत्र कहीं नहीं। लगे हाथ बता दूं, अपनी शादी में मैं उसी घोड़ी पर बैठा था, जो बाजार में सबसे सस्ती थी। कुछ घंटों के लिए महंगी को प्रिफरेंस देना, मैं अपनी शान के खिलाफ समझता हूं।

भई, ऐसा कौन सा गुनाह कंपनी ने कर दिया, जो मात्र 251 रुपए में मोबाइल दे रही है। 251 रुपए में तो ढंग की 'चिप' तक न मिलती और कंपनी मोबाइल दे रही है। वो भी चोरी-छिपे नहीं, गा-बजाके और लंबे-चौड़े विज्ञापन देके दे रही है। मेरा दावा है, इत्ते सस्ते मोबाइल की कल्पना तो कभी स्टीव ने भी न की होगी।

मगर हम भी अजीब हैं। बंदा इत्ते सस्ते में मोबाइल दे रहा है और हम हैं उसकी नीयत पर शक कर रहे हैं। अब तक न जाने कित्ते ही लोगों ने मुझसे यही कहा है- देख लेना, एक दिन कंपनी सारे पैसे लेके चंपत हो लेगी। सब हाथ रगड़ते रह जाएंगे। मैंने भी उलटे उन्हें हड़का दिया- अमां, जब चंपत होगी, तब की तब देखी जाएगी। अभी जो मिल रहा है, कम से कम उसे तो ले लो। बाद में कहीं पछताओ न कि हाय हम ही चूक गए।

मेरा तो मन बार-बार उस बंदे के चरण छू लेने को कर रहा है, जिसकी खोपड़ी में इत्ता सस्ता मोबाइल देने का प्लान आया। इसके कहते हैं, मार्केटिंग स्किल। पूरी दुनिया को हिलाके रख दिया। बताइए, दो करोड़ लोगों ने सस्ते मोबाइल के वास्ते रजिस्ट्रेशन ही करवा दिए। मिलेगा कित्तों को यह अलग बात है। पर बंदे ने भीड़ के बीच से 'रिस्क' लेने की हिम्मत तो की। यह कम बड़ी बात नहीं प्यारे।

अच्छा... सियाने भी हम खूब हैं। एक तरफ कंपनी को 'पैसा लेके भाग जाएगी, कुछ हाथ-पल्ले नहीं पड़ेगा' कहकर गरिया रहे हैं, दूसरी तरफ खुद सस्ते फोन का रजिस्ट्रेशन भी करवाए बैठे हैं। वाह जी वाह दूसरों को नसीहत और खुद चांद पाने की तमन्ना।

मुझे तो इत्ते सस्ते फोन का कॉस्पेट वाकई 'ग्रेट' लगा। इससे कम से कम उन मोबाइल कंपनियों के पेट में हौला तो जरूर उठा होगा, जो महंगे से महंगा फोन लाने को अपनी शान समझती हैं। अब देखना होगा, वे क्या खास करती हैं।

फिलहाल, मुझे मेरे सस्ते फोन के आने का इंतजार है। फिर मैं भी गर्व से कह सकूंगा- मेरे कने 251 रुपए का फोन का। यही तो होता है सस्ती चीज को पाने सुख।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

'जीका' बनाम 'जी' का वायरस

ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं कि दुनिया किसी न किसी बात पर 'परेशान' न हुई हो। बहाना चाहे कोई भी हो दुनिया अपने तईं परेशान होने की वजह ढूंढ ही लेती है। आदिकाल से दुनिया का कुछ ऐसा ही 'नेचर' रहा है। ऐसे मौके कम ही आए हैं, जब मैंने दुनिया को पूरी तरह से 'खुश' देखा हो।

ताजा खबर यह है कि दुनिया इस वक्त जीका नाम के वायरस से परेशान है। लगभग हर रोज एकाध खबर जीका वायरस के प्रभाव पर अखबारों में होती ही है। जीका वायरस के लक्षण बताकर, उससे बचने की हिदायदें लोगों को दी जा रही हैं। दुनिया भर के साइंटिस्ट लगे हुए हैं, जीका वायरस के अंत की दवा खोजने में।

सुनाई में आ रहा है कि जीका वायरस कोई नया नहीं है। संभवता सत्तर के दशक से दुनिया के कुछ देशों में अपना असर रख चुका है। लेकिन इधर काफी तेजी से बढ़ा है, ठीक स्वाइन फ्लू और डेंगू की तरह। गौरतलब ये है कि इस वायरस को फैलाने में मच्छर का ही हाथ है। अभी हम डेंगू के मच्छर से तो कंप्लीट मुक्ति पाए नहीं हैं, ऊपर से जीका वायरस का मच्छर और आ गया है, दहशत फैलाने को।

मैंने देखा है, आदमी अब शेर या चीते से इत्ता नहीं, जित्ता कथित मच्छर से डरने लगा है। शरीर के किसी भाग पर मच्छर बैठ तो जाए जरा, तुरंत यों उड़ता है, जैसे पतंग। मच्छर भीतर न आए या रात को सोते वक्त परेशान न करे, इसके लिए तमाम प्रकार की कवायदें, आदमी करता रहता है। बेचारे मच्छरों को मारने के लिए जाने कित्ते प्रकार के तो 'हिट' और 'क्वाइल' आ गए हैं। मच्छर भी बड़ा 'बेशर्म' है, उस पर किसी कीटनाशक का अब असर ही न होता।

इंसानों को काट-कूटके मच्छर चैन से अपनी जिंदगी जी रहा है। उसके काटे का करते रहो इलाज और खोजते रहो किस्म-किस्म की दवाईयां, उसकी सेहत पर कोई फर्क न पड़ने वाला।

दुनिया तो अब जीका वायरस के उत्पीड़न का शिकार हुई है, यहां तो इश्क में धोखा खाया, हर आशिक अपने जी के वायरस का शिकार है। आशिकों के लिए इश्क जी का वायरस ही तो है। ये तो ऐसा वायरस है, जिसकी दवा हकिम लुकमान से लेकर चचा गालिब कने तक न थी। जो इश्क के जंजाल में पड़ा, समझो अपने जी से गया। जीका वायरस का तो इलाज देर-सवेर साइंटिस्ट खोज ही लेंगे लेकिन आशिकों के जी का इलाज खोज पाना किसी के बस की बात नहीं प्यारे।

लुत्फ ये है कि दुनिया जीका वायरस का जिक्र कर परेशान तो होती रहती है किंतु इश्क में चोट खाए अपने जी का जिक्र किसी से न करती। जबकि इंसान के शरीर का सारा दरोमदार जी पर ही टिका है।

थोड़ी गलती दुनिया की भी है कि वो प्रत्येक वायरस को यों ही दिल पर ले लेती है। हालांकि बहुत अच्छी तरह से जानती है कि इस वायरस की वजह वो खुद है। मगर स्वीकार नहीं करेगी। फिजा में जब इत्ती गंदगी घोल दोगे तो जीका-डेंगू टाइप के वायरस-मच्छर की पनपेंगे। फिर रोते हैं कि हाय! हवा प्रदूषित हो रही है।

मेरी मानो तो जीका की चिंता छोड़कर अपने जी की फिकर करो। जी मस्त तो हर वायरस को पस्त समझिए। मुझे तो अक्सर दया आती है, उन बेचारे आशिकों पर जिन्होंने इश्क में पड़कर अपने जी को वायरस सरीखा बना दिया है। जबकि आज के भयंकर तकनीकी दौर में एक छोड़ दूसरे से दिल बहलाने के इत्ते ऑप्शन मौजूद हैं। मगर क्या करें, उन्हें तो कथित इश्क में अपने जी को गंवाना ही मंजूर है।

एक दफा अपने 'जी' को साफ कर लो फिर मजाल है जीका वायरस की जो दुनिया को परेशान करना तो दूर छू भी पाए!

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

एक थप्पड़ मुझे भी

फिल्म-स्टार गोविंदा द्वारा थप्पड़-पीड़ित को पांच लाख रुपए देने की खबर जब से पड़ी है, मेरा दिल जज्बाती-सा हो गया है। बार-बार यही दुआएं कर रहा है कि कोई सेलिब्रिटी आए और मुझे गोविंदा से भी तगड़ा थप्पड़ जड़ जाए। एक दो क्या दस-पंद्रहा भी मारेगा, मारने दूंगा। कसम से- ऊफ्फ तक न करूंगा। जरा-बहुत हुई बेइजज्ती को 'मीठा दर्द' समझकर सह लूंगा। यों भी, पैसा कमाने के लिए आदमी क्या-क्या मेहनत नहीं करता। मेरे तईं ये सही।

मुझे पड़े थप्पड़ के यहां-वहां चर्चे होंगे। सोशल मीडिया और अखाबारों में मेरा नाम आएगा। पत्रकार लोग मेरा इंटरव्यू लेंगे। मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुंचेगा। बात आगे और आगे बढ़कर दूर तलक जाएगी। फिर उस सेलिब्रिटी को अपनी इज्जत बचाने की खातिर मुझे भी कुछ लाख देकर मामले को सुलटाना पड़ेगा। वल्लाह! कित्ता मजा आएगा न इस सब में।

केवल थप्पड़ के सहारे ही अगर मुझे 'फेम' और 'मनी' मिलेगी तो क्यों न लूंगा। मुफ्त की चीज लेने में जरा भी शरम-वरम नहीं करनी चाहिए। एक थप्पड़ आपको रातों-रात लखपति बना सकता है। दुनिया-जहान की नजरों में सेलिब्रिटी होने का दर्जा दिलवा सकता है। ऐसे में हजारों थप्पड़ खाने को तैयार हूं।

यह बात दिमाग से कतई निकाल दें कि थप्पड़ पड़ने से चार लोगों के बीच इज्जत का फलूदा बनता है। हां, जब थप्पड़ या जूता पड़ता है बस केवल उस क्षण को थोड़ा 'बुरा' टाइप जरूर फील होता है। लेकिन बाद में पूरी दुनिया की निगाह में आप 'सेलिब्रिटी' बन जाते हैं। घर-घर आपको पड़े थप्पड़ या जूते के चर्चे होते हैं।

देखिए न, अपने केजरीवालजी थप्पड़ से लेकर स्याही तक का स्वाद चखा पर आज वे दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। अपनी सरकार चला रहे हैं। वक्त निकल जाने के बाद सब सबकुछ भूल जाते हैं प्यारे। पहचान सिर्फ नाम और कद की हुआ करती है। कथित बदनामियां अब 'हिट' होने की निशानियां हैं। इसलिए बदनाम होने से रत्तीभर घबराना नहीं चाहिए।

यों भी, केवल लेखन के दम पर गुजारा करना अब कठिन होता जा रहा है। रात-दिन बस यही दुआ करता रहता हूं कि एक थप्पड़ मुझे भी पड़ जाए तो मेरे सारे 'दल्लीद्दर' दूर हो जाएं। मैं तो थप्पड़ खाने को अपना 'प्रोफेशन' बनाने पर भी विचार रहा हूं। इसमें लेखन से कहीं ज्यादा 'पैसा' है। सेलिब्रिटी बनने की पूरी संभावनाएं हैं।

वाकई कित्ता नसीब वाला होगा वो बंदा, जो एक सेलिब्रिटी का थप्पड़ खाके रातभर में लखपति बन गया। बंदे ने पूरे परिवार का मान-सम्मान बढ़ा दिया। काश! ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी घटित हो जाए। कृपया, दुआ करें।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

सेंसेक्स और वैलेंटाइन

यों सेंसेक्स का गिरना मेरे दिल को बड़ी चोट देता है। ये एक ऐसा दर्द है, जिसे किसी पर बयां करने में भी मुझे सौ दफा सोचना पड़ता है। अगले का क्या भरोसा- कहने ही लग जाए, तुम्हें बेजान सेंसेक्स की बड़ी चिंता है। सेंसेक्स के दर्द में दुबले हुए जा रहो हो। अब उन्हें क्या बतलाऊं कि सेंसेक्स मेरे लिए क्या है। मेरे दिल में जो जगह सेंसेक्स के लिए है, उत्ती तो किसी 'खास' के लिए भी नहीं!

कसम से कलेजा मुंह को आ जाता है, जब सेंसेक्स अपने हाथ-पैर छोड़के औंधे मुंह धड़ाम हो जाता है। तब उसके दिल पर क्या बितती होगी, नहीं जानता, पर मैं जरूर 'मायूस' हो जाता हूं।

इधर, सेंसेक्स ने अपनी जो हालत बना रखी है, देखकर बड़ा दुख होता है। न जाने उसकी जान को ऐसा कौन-सा अंदरूनी गम लग गया है, जिसकी पीड़ा में निरंतर घुले ही चला जा रहा है। इत्ता तो आशिक भी अपनी महबूबा के लिए नहीं रोता, जित्ता सेंसेक्स रो रहा है। मगर यहां ऐसा कौन है, जो बेचारे सेंसेक्स की भावनाओं को समझने की कोशिश करेगा। सब अपने में मस्त हैं। ऊपर से सेंसेक्स को ही गरियाने में लगे हैं, देखो सुसरा हर रोज गिर-गिरकर पूरे बाजार की ऐसी-तैसी किए हुए है।

कोई न समझे पर मैं सेंसेक्स की भावनाओं को समझता हूं। उससे पूरी 'सहानुभूति' रखता हूं। उसके गम और खुशी में बराबर का शरीक हूं। क्योंकि सेंसेक्स को मैं अपना वैलेंटाइन मानता हूं। उससे दिली मोहब्बत करता हूं।

हो सकता है, आपको सेंसेक्स के प्रति मेरी 'सिम्पथी' देखकर थोड़ा अजीब-सा लग रहा हो लेकिन ये सच है। गिरते हुए को सहारा देने में भला कैसी शर्म। दिल तो सेंसेक्स का भी है। हां, ये बात और है कि सेंसेक्स दिल का बेहद कमजोर होता है। किसी की जरा-सी छींक से भी बैठ जाता है। पर ये क्या कम बड़ी बात नहीं कि कमजोर दिल के बावजूद वो पूरे बाजार, पूरी अर्थव्यवस्था को अपने दम पर चला रहा है।

कभी-कभी तो मुझे भी सेंसेक्स के मूडी होने से डर लगता है। ये आभास ही नहीं रहता कि कब कौन सी राह चल पड़ेगा। क्या करें, बरसों से सेंसेक्स का ऐसा ही स्वभाव रहा है। निवेशक तो क्या सरकार भी उसके इस मूडी व्यवहार से अक्सर घबरा जाती है। मैं तो प्रायः यही कहता हूं कि सेंसेक्स और बीवी के मूड का कोई भरोसा नहीं रहता, कब में पलटी मार दे।

जो भी हो लेकिन लग बड़ा बुरा रहा है कि वैलेंटाइन डे के मौके पर सेंसेक्स की हालत इत्ती नाजुक है। सेंसेक्स का मर्ज भी ऐसा है कि इसकी दवा वित्तमंत्री के पास भी नहीं। अगर जबरन डोज दे भी दो तो क्या भरोसा कि उसे बुरी तरह से उल्टी कर निकाल न दे। हद है, चीन के गम में हमारा सेंसेक्स अपनी हालत की ऐसी-तैसी करने पर तुला हुआ है। कुछ समझाओ तो समझने को तैयार नहीं होता।

काश! सेंसेक्स की भी कोई महबूबा होती। टेढ़े वक्त में कम से कम उसके साथ तो खड़ी होती। जब गिरता तो आगे बढ़कर संभाल लेती। उसके लिए दुनिया-जहान से लड़-भिड़ लेती। अच्छा लगता मेरी जगह वो सेंसेक्स की वैलेंटाइन होती। मैंने तो बेचारे सेंसेक्स का दिल रखने के लिए ही उसे वैलेंटाइन माना है।

सिर्फ दुआ ही कर सकता हूं कि सेंसेक्स की गिरताऊ सेहत में जल्द सुधार हो। चीन और ग्लोबल दर्द से जल्द बाहर निकले। खुद भी मस्त रहे और हम भी उसकी खुशी में साझीदार बनें। सेंसेक्स भी अपना वैलेंटाइन डे हमारी तरह खुशी-खुशी सेलिब्रेट करे। आमीन।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

दिल और इश्क में 'नो' गारंटी

दिल और इश्क दोनों हर बंधन से मुक्त होते हैं। दिल कब, कहां, किस पर आ जाए कुछ कह नहीं सकते। इश्क कब, कहां, किससे हो जाए कोई नहीं जानता। हालांकि इश्क का रास्ता दिल की गली से होकर गुजरता जरूर है पर बीच में कहां अटक जाए कोई गारंटी नहीं।

फिर भी, जो लोग गारंटी के आधार पर इश्क करते या दिल देते हैं, वो बड़े ही 'यथास्थितिवादी' होते हैं। अमां, जब फैशन के दौर में स्टाइल की गारंटी नहीं मिलती फिर भला इश्क में गारंटी कैसी। वो भी आज के दौर में दिल और इश्क को काबू में रखना, सूरज को दीया दिखाने समान है।

बीत गए वो जमाने जब प्रेमी-प्रेमिका इश्क में साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाया करते थे। 'हम बने, तुम बने एक-दूजे के लिए' टाइप गाने गाया करते थे। अब सबकुछ 'इंस्टेंट' है। इश्क अब निगाहों से नहीं, फेसबुक-वाट्सएप के माध्यम से होता है। चूंकि प्रेमी-प्रेमियों कने वक्त की कमी रहती है, तो वे सोशल मीडिया पर ही एक-दूसरे से मिल लिया करते हैं। यहीं खुलकर इश्क फरमाते हैं। दो-चार काम-चलाऊ कसमें-वसमें खा लेते हैं। जब नहीं संभाल पाते, तब यहीं 'ब्रेक-अप' भी कर लेते हैं। 'बोल्ड' इत्ते होते हैं कि ब्रेक-अप के बाद अपने चेहरों पर न गम रखते हैं न शिकन। रात गई, बात गई।

बदलते वक्त के साथ इश्क में विकल्प बढ़े हैं। इश्कबाजों के लिए तो हर दिन वैलेंटाइन और प्रपोज डे है। यहां से छूटे तो वहां अटके। जहां अटके हैं, वहां की कोई गारंटी नहीं कि कब तलक अटके रहेंगे। जहां बेहतर 'चॉव्इस' मिलेगी, बंदा वहीं भागेगा।

सही भी है न। इश्क को ज्यादा लंबा खींचने से क्या फायदा। न ही कोई फायदा लंबे-चौड़े वायदे करने से है। पहले किसी जमाने में प्रेमी-प्रेमिका करते रहते होंगे ताउम्र एक-दूसरे का 'इंतजार' मगर अब ऐसा कोई लफड़ा नहीं। इंतजार तो बहुत दूर की बात रही, यहां तो वाट्सएप का मैसेज सेंड करने में बंदा अगर दो सेकेंड की देरी कर दे, तो दुनियाभर की गालियां उसे सुनने को मिल जाती हैं। विकट टाइप के झगड़े हो लेते हैं अगर प्रेमिका फेसबुक पर अपनी सेल्फी पोस्ट करे और प्रेमी लाइक न ठोके। बेचारे को एक लाइक न देने के कीमत ब्रेक-अप के रूप में चुकानी पड़ती है।

वैलेंटाइन डे तो महज बहाना है। असली मकसद तो भिन्न-भिन्न टाइप के विकल्प तलाश करना है। जिसके कने जित्ते विकल्प होंगे, वो ही सबसे अधिक सुखी होगा। बाकी तो सब बातें हैं, बातों का क्या। इश्क बातों से नहीं दिमाग से किया जाता है। दिल जिसे दिया जाता है, उसकी न कोई गारंटी होती है, न वारंटी।

इश्क में वैरिएशन आ जाने से, उम्मीद करता हूं, दिल को काफी तसल्ली मिली होगी। नहीं तो पहले बेचारा दिल एक ही के गम में जाने कित्ते जुलम सहा करता था। हर वक्त 'जब दिल ही टूट गया, जीके क्या करेंगे' टाइप फीलिंग से ग्रस्त रहता था। देवदास पी-पीके दिल की वाट लगाए रहता था। 'इस दिल के टुकड़े हजार हुए, इक यहां गिरा, इक वहां गिरा'- जैसे गानों के हाथों मजबूर था।

सोशल नेटवर्किंग और टेक्नॉलजी ने इश्क में दिल की टूटन को बहुत हद तक बचाया है। दिल अब ज्यादा उन्मुक्त होकर जीता है। न प्रेमी न प्रेमिका अपने दिल की कोई गारंटी नहीं देते। जहां जिस पर आ गया ठीक। नहीं आया कोई बात नहीं। भीड़ में हजारों विकल्प मौजूद हैं।

कुछ भी कहिए पर मुझे इंस्टेंट इश्क मस्त लगता है। दो मिनट में मैगी की तरह सबकुछ तैयार। खा-पीके चैन से रहो। न कोई रोक, न कोई टोक। तुम अपने फेसबुक पर खुश, हम अपने वाट्सएप पर। दिल को भी सुकून खामखा की टेंशन मोल लेने से।

इश्क और दिल में गारंटियां जित्ती कम रहेंगी, लाइफ में मस्तियां उत्ती अधिक रहेंगी। चाहे वैलेंटाइन डे हो या किस डे विकल्प हमेशा अपने पास रखो ताकि बाद में पछताना न पड़े। समझ गए न प्यारे।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

किस्मत के धनी कबीर बेदी

वाकई। क्या 'हैंडसम' किस्मत पाई है कबीर बेदी ने। सत्तर की उम्र में भी 'जोश-ए-जवानी' बरकरार। यहां मैं महज चालीस की उम्र में ही खुद को पिछड़ा-सा महसूस करने लगा हूं। हालांकि फॉटी में नॉटी होना स्वभाविक प्रक्रिया है। लेकिन नॉटी होने मात्र के ख्याल से ही मेरे तो रौंटे खड़े हो जाते हैं। क्या करूं, नॉटी होने के लिए दम चाहिए और मुझमें वो है नहीं। एक बीवी के होते भला कौन अपनी शामत खुद बुलाना चाहेगा।

यकीनन। कबीर बेदी में दम था, जो महज सत्तर साल की उम्र में भी दुल्हा बन गए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी दुल्हन उनसे मात्र तीस साल छोटी है। यों भी, इश्क में उम्र या सीरत नहीं केवल 'दीवानगी' देखी जाती है। सैफ-करीना की एक-दूसरे के प्रति दीवानगी ही तो थी, जो उम्र की दीवार उनके आड़े न आई। अपने आस-पड़ोस में ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे, जहां इश्क की दीवानगी ने अपना रंग जमकर दिखाया है।

काश! ऐसा रंग मैं भी जमा पाता। मगर हर किसी की किस्मत में कबीर बेदी जैसे सुख कहां लिखे होते हैं!

यों भी, बदलते वक्त के साथ इश्क के मायने और पैमाने दोनों बदल गए हैं। अब वो पहले जैसा इश्क न रहा, जहां प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को या तो छतों से ताका करते थे या 'दिल के अरमां आंसूओं में बह गए' टाइप गाने गाया करते थे। अपवाद हो सकते हैं किंतु, मुझे नहीं लगता कि, अब कोई इश्क में आंसू बहाता होगा। तू नहीं कोई और सही की थीम पर चलकर इश्क की राहें अब बहुत आसान और खुल गई हैं।

कबीर बेदी की जिंदगी में भी तो यही सीन रहा। तू नहीं और सही। और नहीं कोई और सही। बनते-बिगड़ते रिश्तों के बीच उन्होंने अपनी बात आखिरकार बना ही ली। इसके कहते हैं लगन। सत्तर की उम्र में कमसीन हसीना का साथ किस्मत वालों को ही नसीब होता है प्यारे। कोई मेरी तरह थोड़े न कि एक के साथ बंध गए तो ताउम्र की वसीयत उसके नाम लिख दी। इस मामले में खुशवंत सिंह क्या कमाल के आदमी थे। अंत तक औरतों के प्रति अपने मोह को उन्होंने जवान व बिंदास बनाए रखा। चचा गालिब भी शराब और शबाब के बीच कित्ता मस्त रहते थे।

आज के जमाने में इश्क की न कोई गारंटी है न वारंटी। जब तलक साथ निभ जाए तो किस्मत मानिए। वरना तो इश्कवालों के लिए हर दिन 'वेलेंटाइन डे' है यहां। दिल का तोता एक डाल से कूदकर दूसरी डाल की मैना को साथ लेकर कब उड़ ले- कोई नहीं जानता।

दिल तो वैसे भी बच्चा है जी। उस पर इल्जाम लगाना बेफजूल है।

अब सोचता हूं तो मुझे खुद पर शर्म आती है कि मैं कैसों-कैसों को अपना 'आदर्श' बनाए बैठे था। काश! कि कबीर बेदी जैसों को अपना आदर्श बनाया होता तो आज मेरी जिंदगी की रौनक कुछ और ही होती। मैं तो 'किस-किस को प्यार करूं' फिल्म के हीरो को भी बड़ा सहासी मानता हूं, जिसने एक-साथ चार बीवियों को संभाला- वो भी हंसी-खुशी।

वैसे, कहिए कुछ भी सब ससुरी किस्मत का खेल है। कुछ ऐसे बंदे भी होते हैं, जिन्हें रीयल में सनी लियोनी जैसी बीवी मिल जाती है। कुछ ऐसे होते हैं, जो सनी लियोनी के वीडियो को देख-देखकर ही अपना दिल बहलाते रहते हैं।

चलिए खैर मेरी न सही पर कबीर बेदी की किस्मत में यों ही चांद-सितारे लटके रहें। उनकी राहें आगे भी खुली रहें। इश्क वो शै है गालिब जिस पर कोई रोक-टोक नहीं। एक से करो या हजारों से फिर भी कम ही लगता है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

नहाने से एलर्जी

मैं नहाने का चोर हूं। मन नहीं होता तो हफ्तों तक नहीं नहाता। न नहाने का सिलसिला जैसा गर्मियों में बना रहता है, वैसा ही जाड़ों में भी। बल्कि जाड़ों में थोड़ा और बढ़ जाता है। जाड़ों में नहाने का झंझट गर्मियों से अधिक होता है। जित्ती एलर्जी मुझे जाड़े से है, उत्ती ही नहाने से भी। मेरा बस चले तो मैं दोनों के खिलाफ 'असहिष्णुता' फैलाने का केस दर्ज करवा दूं।

नहाना मुझे वक्त की बर्बादी सरीखा काम लगता है। कोई काम पास न हो तो चलो नहा ही लो। ये क्या बात हुई भला? मैंने तो नहाने के ऐसे-ऐसे 'दीवाने' देखे हैं, जो गर्मियों-जाड़ों-बरसातों में दो-तीन दफा नहा लेते हैं। पूछने पर तर्क देते हैं- नहाने से शरीर का मैल दूर है। शरीर सुंदर-स्वस्थ बनता है। दिनभर ऊर्जा बनी रहती है। अच्छे विचार दिमाग में आते हैं।

है न कित्ती बेतुकी बातें। नहाने से अगर शरीर का मैल दूर हो रहा होता तो मैं रोज न नहाता! मेरा तो हफ्तों न नहाने के बाद भी शरीर टनाटन चमकता रहता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बाजार में हजारों तरीके के क्रीम-पॉउडर-डियो-परफ्यूम मौजूद हैं, उन्हें लगाइए न। पता भी नहीं चलेगा कि आप नहाए हुए हैं या नहीं।

मेरे शरीर में बिन नहाए ही इत्ती 'ऊर्जा' बनी रहती है, जित्ती रोज नहाने वालों के पास भी न होती होगी। जित्ती देर लोग नहाने में लगाते हैं न, उत्ती देर में तो मैं दो-तीन व्यंग्य लिख सकता हूं। कभी-कभी तो मैं नहाना इसलिए भी कैंसल कर देता हूं क्योंकि मुझे लिखना होता है। लिखने के लिए मैं नहाना तो क्या दाढ़ी बनाना भी छोड़ सकता हूं। वैसे, दाढ़ी बनाना भी कम 'बोरिंग' काम नहीं। इसमें भी बहुत सारा टाइम खोटी होता है।

जरूर वो धरती का सबसे महामूर्ख प्राणी रहा होगा, जिसने नहाने और दाढ़ी बनाने का कॉसेप्ट हमें दिया। खुद तो नहाके निकल लिया, मुसीबत हमारी जान को छोड़ गया। नहाने को आदमी ने अपना ऐसा रोटिन बना लिया कि हवा-पानी निपटाने के बाद दूसरा काम वो नहाने का ही करता है। खुद तो नहाता ही है, दूसरे की जान यह पूछ-पूछकर सांसत में डाल देता कि अभी नहाए कि नहीं। जैसे- नहाकर आदमी गंगाजल जित्ता पवित्र हो जाएगा।

मुझमें और पत्नी में अक्सर नहाने को लेकर ही तगड़े झगड़े होते रहते हैं। उसे नहाना पसंद है, मुझे नहाने से ऐलर्जी। एक नहाने-ना-नहाने की बात पर अक्सर हमारे बीच तलाक लेने तक की नौबत आ जाती है। मैंने उसे कित्ती ही दफा समझाया कि नहाना वक्त की बर्बादी है। पर बात उसके पल्ले ही नहीं पड़ती। हर वक्त यही जिद करती रहती है, नहाकर ऑफिस जाया करो।.. नहाकर नाशता किया करो।.. नहाकर पूजा किया करो।..

इत्ती सर्दी में कोई मूर्ख ही होगा, जो सुबह उठकर नहाएगा। सर्दियां सुबह-सुबह रजाई में लेटे रहने के लिए होती हैं या नहाने के लिए। एंवई गरम शरीर को कष्ट देने से क्या फायदा! नहाने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है। कभी भी नहा लेंगे। नहाकर मुझे कौन-सा चुस्त और स्वस्थ लोगों की मंडली में शामिल होना है। फिलहाल, कैसे भी करके मैं खुद को नहाने से बचाने में कामयाब हो ही जाता हूं। भले ही हमारे बीच लफड़े कित्ते भी होते रहें।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। जब यहां सबको अपनी मर्जी का बोलने-लिखने-पढ़ने-खाने-पीने-देखने-घूमने-नाचने-सोने-रहने-अफेयर करने की आजादी है, तो न नहाने की भी तो आजादी होनी चाहिए कि नहीं। बंदे की मर्जी होगी तो नहाएगा। नहीं होगी नहीं नहाएगा। न नहाने वालों के प्रति भी हमें 'सभ्य' बना होगा। जरूर नहीं सारे पवित्र या अच्छे काम नहाकर ही किए जाएं। न नहाकर भी तो किए जा सकते हैं। कोई लिखकर थोड़े न देना होता है कि फलां काम नहाकर किया है, अलां काम न नहाकर।

मैंने तो खैर बरसों पहले निकाल दिया था, आप भी अपने दिमाग से निकाल दीजिए कि नहाना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है। कोई निशानी-फिशानी नहीं है। खुद को 'खुशफहमी' में बनाए रखने के चोचलें हैं। क्रांति नहाकर भी की जा सकती है और न नहाए भी। बस सोच-सोच का फर्क है।