रविवार, 31 जनवरी 2016

स्मार्ट सिटी के पचड़े

इत्ती मेहनत। इत्ती कवायदें। इत्ती हसरतें। सब की सब 'बेकार' गईं। मेरे शहर का स्मार्ट सिटी होने-बनने का सपना अंततः सपना ही रह गया। सरकार को यूपी-बिहार में एक भी शहर इस लायक न लगा, जिसे स्मार्ट बनाया जा सके। केवल उन्हीं शहरों को चुना गया, जो पहले से ही स्मार्ट हैं। संभवता अब और स्मार्ट हो लेंगे।

लेकिन मैं सरकार के इस फैसले पर रत्तीभर भी हैरान-परेशान नहीं हूं। स्पष्ट कर दूं, मुझे स्मार्ट सिटी का कॉस्पेट ही 'बोरिंग' टाइप लगता है। दरअसल, स्मार्ट होना स्मार्ट होने की निशानी कम 'बीमारी' अधिक है। इत्ते दिनों से अखबारों में लगातार स्मार्ट होने-बनने का ज्ञान बांटा जा रहा था। यहां कचरा न फैलाओ। वहां पान की पीक से दिवारों पर चित्रकारी न करो। पॉलीथिन का प्रयोग बंद करो। बाइक पर हेलमेट पहनकर चलो। प्रदूषण कम करो। पेड़-पौधे लगाकर शहर को हरा-भरा बनाओ। आदि-इत्यादि।

चूंकि हम सदियों पुरानी आदतों से मजबूर हैं इसलिए कुछ भी करने या मानने को यों ही तैयार नहीं हो जाते। लोग थोड़े-बहुत दिन तो रौ में दिखते हैं, फिर वापस अपनी उन्हीं कथित हरकतों-आदतों पर लौट आते हैं। जिंदगी को इत्ता व्यवस्थित या स्मार्ट होके जिएंगे, तो माहौल में घुटन कित्ती बढ़ जाएगी, ये न सरकार समझ पा रही है, न कथित अफसरान।

स्मार्ट तो हम 'ऑलरेडी' हैं और ज्यादा स्मार्ट होकर क्या करेंगे? कभी-कभी जरूरत से अधिक खाना भयंकर अपच का कारण बन जाता है। सरकार जित्ता पैसा शहरों को स्मार्ट बनाने में खरचा करेगी, उससे तो अच्छा है कि गरीबों-बेरोजगारों के वास्ते कुछ नई स्कीमें ले आए। कम से कम बेचारे सरकार को 'दुआएं' तो देंगे।

शहरों के स्मार्ट होने से ज्यादा से ज्यादा हमारा स्टेटस ही तो ऊंचा उठ जाएगा। यहां सोशल मीडिया पर एक तगड़ी-सी पोस्ट डालकर देखें दो मिनट नहीं लगेंगे स्टेटस ऊंचा होने में। चार जने जानेंगे सो अलग। लगता सुनने में बहुत अच्छा है स्मार्ट सिटी, स्मार्ट लोग, स्मार्ट लिविंग, स्मार्ट सिस्टम लेकिन स्मार्ट होने-बनने के अपने ही पचड़े हैं। मतलब, बंदा हर वक्त कोट-पैंट-टाई लगाए रहना-दिखना चाहिए।

अभी हाल सरकार ने एक ट्रेन (महामना एक्सप्रेस) को स्मार्ट बनाकर ज्यों ही जनता की सेवा के वास्ते उतारा, अगली दफा ही उसमें से सामान गायब होने लगा। गंदगी का वो आलम कर दिया कि जिसने देखा अपना माथा ही पीटा। इत्ती साफ-सुधरी, एकदम होटलनुमा ट्रेन में चढ़कर ही आधे से ज्यादा यात्रियों का सिर चकरा गया होगा। बहुत देर तलक तो इस सोच में ही पड़े रहें होंगे कि इन सीटों पर बैठें या वाजू में खड़े रहें। मौका पाते ही कुछ लोगों ने साफ-सफाई के प्रति अपना वास्तविक चरित्र दुनिया को दिखा दिया।

इसीलिए तो कहता हूं, ये स्मार्ट-विस्मार्ट बनना हमारे बस का रोग नहीं। हम सदियों से जैसे रहते आए हैं, उसी में खुश हैं। सिटी को स्मार्ट बनाके क्या कर लेंगे, जब नागरिकों ने दिवारों को पीक-दान बनाने की ठान ही रखी है। खामखा इत्ती मेहनत से क्या फायदा हुजूर। केवल ऊपर के कपड़े बदल लेने भर से क्या होता है, जब हमारा तन-मन ही गंदा हो।

सरकार ने जिन शहरों को स्मार्ट सिटी की सूची में नहीं शामिल किया तो कुछ सोच-समझकर ही नहीं किया होगा। सरकार सब जानती है कि कौन-सा शहर स्मार्ट हो सकता है और कौन-सा नहीं। फायदा तो उसमें है, जो शहर पहले से स्मार्ट हैं, उन्हें फिर से स्मार्ट बना दिया जाए।

चलो खैर मेरे शहर का नाम स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल नहीं हुआ, एक झंझट से तो मुक्ति पाई। अब मैं और स्वतंत्र होके यहां-वहां पान की पीके उछाल सकूंगा। अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर बिखेर सकूंगा। जिन्हें जो समझना है समझें, अपनी बला से।

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