गुरुवार, 21 जनवरी 2016

मजाक न करियो

हां, वाकई समय बहुत तेजी से बदल रहा है। इत्ती तेजी से कि सामने वाले से मजाक करना तक 'दूभर' हो गया है। क्या भरोसा आपके मजाक को वो कैसे ले ले। मजाक-मजाक में थाने पहुंच जाए और आपके खिलाफ मुकदमा लिखवा दे। फिर लगाते रहें आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर खुद को 'निर्दोष' साबित करने के लिए।

लोगों की भावनाओं का टेंपरामेंट अब पहले जैसा नहीं रहा। जरा-सी बात में 'आहत' हो लेती हैं। जहां आहत होने का कोई सीन नहीं होता, वहां इस बात पर आहत हो जाती हैं कि चर्चा में बने रहने के लिए कुछ तो चाहिए। ये ही सही।

मीडिया और समाज के बीच 'फेमस' होने के लिए भावनाओं को आहत कर लेना सबसे उम्दा गेम है। कल तलक जिन चेहरों को कोई नहीं पहचानता था, आज पहचान गया है क्योंकि वे किसी न किसी आहत भावना के मारे हैं।

अभी भक्त लोगों की भावनाएं मजाक से आहत हुईं हैं। कल को हो सकता है जरा मुस्कुराने भर से हो जाएं। आज के दौर में आदमी के दिमाग का कोई ठौर नहीं, कब में सांप की मानिंद पलट कर किसे डस ले। पहले मैं यह मजाक समझता था लेकिन अब मुझे यकीन-सा होता चला जा रहा है कि मिलावटी खाना खा-खाके आदमी का दिमाग भी गड़बड़ा गया है। चौबीस में से तेइस घंटे शक और आहत भावनाओं के बीच ही गंवा देता है।

इसीलिए मैंने दूसरों से छोड़िए खुद तक से मजाक करना बंद कर दिया है। अब तो मैं खुद पर हंसता भी नहीं हूं। अपनी मजाक, अपनी हंसी, अपनी बतकही केवल अपने मन में ही रखता हूं। या फिर मूड हुआ तो पन्नों पर दर्ज कर देता हूं। मगर लिखा हुआ न किसी को दिखाता हूं, न कहीं छपने-छपाने भेजता हूं। क्या मालूम पढ़कर किस सियाने की भावनाएं आहत हो लें। यहां तो मेरे कने इत्ते पैसे भी नहीं कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर ला पाऊं। फुटकर लेखन से जो गाड़ी चल रही है, बस चल ही रही है।

हां, इस बात की इज्जात मैंने सबको दे रखी है कि कोई भी कैसा भी मजाक मुझसे खुलकर कर सकता है। गारंटी है न बुरा मानूंगा, न भावनाओं को आहत करूंगा। खुद की मजाक उड़ने से ज्यादा फर्क मुझे इसलिए भी नहीं पड़ता, यहां तो पूरी जिंदगी ही मजाक-मजाक में गुजरी है। ऐसे में कोई मजाक-प्रेमी मेरा मजाक उड़ाकर अपनी हसरत पूरी कर भी ले, तो खामखा क्या गुस्सा होना।

यों भी, मजाक करते और हंसते-हंसाते रहने से दिमाग और शरीर 'टनाटन' बना रहता है। भावनाएं काबू में रहती हैं। पर समझेगा कौन, यहां तो आहत होना अब फैशन का हिस्सा बनता जा रहा है। देखिए न, कुछ लोगों की तो भावनाएं मात्र स्याही फेंकने भर से ही आहत हो लीं। मन चाहे कित्ता भी काला क्यों न हो किंतु चेहरा काला नहीं होना चाहिए। कमाल है।

उधर किसानों के खेत सूखे पड़े हैं, इधर सियानों की आहत भावनाओं की खेती जमकर लह-लहा रही है। हर दूसरे दिन आहत भावनाओं से जुड़ा कोई किस्सा सामने आ ही जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे क्लास का कोई स्टूडेंट टीचर से जाकर ये शिकायत करे कि सर/मैडम सुरेश मुझे नकोच रहा है।

मजाक, आहत भावनाओं, सहिष्णुता-असहिष्णुता जैसे मसलों पर आपस में ही लड़ता-भिड़ता हमारा बौद्धिक वर्ग मुझे उन अपरिपक्व लोगों की तरह लगता है, जिनका एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल 'हल्ला' मचाना है। तब ही तो मजाक पर भी पहरेदारी इत्ती बढ़ गई है। कि, खामोश! किसी ने मजाक किया तो...।

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