सोमवार, 18 जनवरी 2016

शुक्रिया टि्वटर

शुक्र है, टि्वटर ने मुझे बचा लिया। 'अवसाद' में जाने से रोक लिया। न जाने क्या हाल होता मेरा?

जबकि हजार दफा कह चुका हूं, मुझे न कविता लिखने का शौक है, न पढ़ने का। मेरे लिए कविता 'काला अक्षर, भैंस बराबर' है। मगर लिंक ठेलने वाले कहां मानते हैं। जब भी फेसबुक खोलो इन-बॉक्स में पांच-दस लिंक (किस्म-किस्म की कविताओं के) पड़े मिल ही जाते थे। साथ में, शर्त ये भी रहती थी कि 'प्रतिक्रिया' जरूर दें। कुछ ने तो ये 'धमकी' तक दे डाली थी, अगर समय पर प्रतिक्रिया नहीं दी तो 'ब्लॉक' या 'अनफ्रेंड' कर देंगे।

मतलब, उलटा चोर कोतवाल को डांटे।

खैर, कुछ दिनों तक तो 'इग्नोर' ही किया। सोचा चलने दो जैसा चल रहा है। वर्चुअल फ्रेंड हैं, रियल नहीं। दो-चार शब्द 'तारीफ' के लिखने में अपने पास से क्या जाता है। अगला खुश होकर 'दुआएं' ही देगा। मगर पानी जब सिर के ऊपर से बहने की हिमाकत करने लगा फिर 'डिसाइड' किया कि अब फेसबुक और कथित कवियों की कविताओं से 'छुटकारा' पा ही लेना चाहिए। ऊपर वाले ने जैसे-तैसे करके मुझे एक दिमाग दिया है, उसे भी आड़ी-तिरछी कविताओं में घुसेड़े रहूंगा, तो कैसे चलेगा। दिमाग का क्या भरोसा! परेशान होकर एक दिन चलना ही बंद कर दिया तो। मैं तो 'बे-दिमाग' हो जाऊंगा।

मैं अपने दिमाग को कतई खोना नहीं चाहता हूं। जित्ता भी है, मेरा काम तो चला ही रहा है न। काफी है। गलत कहते हैं लोग कि दुनिया दिमाग वालों से चलती है। अगर दिमाग वालों के सहारे ही चल रही होती तो फेसबुक पर हर कोई कवि न होता। ऐसे-ऐसे भयंकर कवियों की कविताओं को पढ़ने के बाद खुद को 'गरियाने' का दिल न करता- रे बुड़बक तूने कविता पढ़ी ही क्यों?

मुझे लगता है, फेसबुक पर अस्सी फीसद अकांउट में सत्तर फीसद तो कवि ही होंगे! जिसे देखो वो फेसबुक पर कविता पेलने में लगा हुआ है। माना कि आपको कविता लिखने का शौक है। लिखें, खूब लिखें। मगर जिसे कविता पढ़ने का शौक ही नहीं, उसे तो लिंक न ठेलें। बार-बार इन-बॉक्स में घुस-घुसकर कविता न पढ़ने पर 'ब्लॉक' करने की धमकी तो न दें। आदमी की लाइफ में मुसीबतों का रायता क्या कम फैला हुआ है, जो बेतुकी कविताओं को पढ़के दिमाग का दही और बना ले।

इन्हीं सब कथित कवियों-कविताओं से 'परमानेंट मुक्ति' पाने के लिए मैंने फेसबुक का दामन त्यागकर टि्वटर का साथ पकड़ लिया। जब से टि्वटर पर आया हूं, कसम से बड़ी दिमागी शांति महसूस कर रहा हूं। सबसे खास बात यह है कि टि्वटर पर न कविता है, न कवि (अपवाद छोड़कर)। 140 शब्दों की लिमिट है। अब 140 शब्दों में नंगा क्या नहाएगा, क्या निचोड़ेगा।

अभी हमारे इलाके के कवि इत्ते महान नहीं हुए हैं कि 140 शब्दों में कविता पेल सकें। यहां तो कवि पांच-दस किलोमीटर से कम लंबी कविता लिखना खुद की 'तौहीन' मानता है। जब से फेसबुक आया है, तब से तो कवि हर विषय, हर मुद्दे पर कविता लिखने को यों तैयार बैठे रहतें हैं, जैसे पूनम पांडे कपड़े उतारने को।

टि्वटर पर बहुत 'आराम' है। यहां न तो कोई किसी की दीवाल फंदाता है, न झांकता। सब अपनी ढफली, अपना राग बजाने में व्यस्त रहते हैं। 'न तुम हमें जानों, न हम तुम्हें जाने' जैसा हिसाब-किताब रहता है यहां।

हां, टि्वटर पर 'वन-लाइनर' गजब के होते हैं। बंदा जो बात पांच-छह सौ शब्दों के व्यंग्य में नहीं कह पाता 140 शब्दों में खूब कह लेता है। मेरा तो मानना है कि भविष्य में सबसे ज्यादा व्यंग्य टि्वटर पर ही लिखा जाएगा। और वो भी चंद शब्दों में। टि्वटर के वन-लाइन पढ़के तबीयत हरी और दिमाग टेंशन-फ्री हो जाता है।

मैं तो लाख-लाख बार टि्वटर का 'शुक्रिया' अदा करता हूं कि उसने मुझे 'पकने' से बचा लिया। अगर टि्वटर न होता तो आज मैं भी बरेली के पागलखाने में पड़ा कविताएं ही पढ़ रहा होता।

2 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

ज्यादा खुशी न मनाएँ.
क्षणिक है.
ट्विटर पर भी ट्विटरिया कवियों की फ़ौज है जो
140 अक्षरों में हाइकुनुमा कविताएँ ठेलते रहते हैं.

और -

ट्विटर अपनी शब्द सीमा बढ़ाने का परीक्षण कर रहा है. जल्द ही 140 की सीमा खत्म होगी. तब?

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और सीमान्त गाँधी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।