रविवार, 17 जनवरी 2016

छपने के लिए बटरिंग न की है, न करूंगा

छपने-छपाने के बड़े मसले हैं। जहां कुछ छपने को भेजो, वहां से जवाब मिलना तो दूर की बात है, छपेगा भी या नहीं; यही पता नहीं चल पाता। केवल इंतजार करते रहो। इंतजार करते-करते मैटर भी पुराना हो लेता है। अब कोसते रहिए न छापने वाले को पर उसकी सेहत पर भला कौन-सा फर्क पड़ना है। वो बेचारा तो अपने आका के निर्देश का गुलाम ठहरा।

न जी न फर्क इससे कोई नहीं पड़ता कि आप कित्ता अच्छा या खराब लिखते हैं। फर्क इससे पड़ता है कि कुर्सी पर बैठे बंदे से आपके संबंध कैसे हैं। संबंध अगर मधुर हैं तो आपका लिखा घास-कूड़ा भी सिर आंखों पर। संबंधों में अगर तना-तनी है या अगला आपको पसंद ही नहीं करता, फिर तो आप ऐड़ी-चोटी तक का दम लगा लो, छप ही नहीं सकते।

ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। फिर भी अपवाद हर जहां होते हैं।

अच्छा, बटरिंग करना मेरी आदत नहीं। ठोक कर लिखता हूं। ठसक के साथ छपने को भेजता हूं। अगला छापता है तो बढ़िया। नहीं छापता तो उसकी मर्जी। अगले को बार-बार फोन करके छापने के लिए जी-हुजूरी करना मेरा स्वभाव नहीं। माल में दम होगा तो छपेगा। नहीं होगा तो पड़ा-पड़ा सड़ जाएगा।

यों भी मेरे लिए लेखन एक तरह से 'दुकानदारी' की तरह है। रोज माल बनाता हूं। रोज बेचने को बाजार में ले जाता हूं। माल अच्छा होता है तो बिकता है। अच्छा नहीं होता, नहीं बिकता। अफसोस करने से क्या फायदा? बिके माल का पैसा मेरे खाते में आते ही, उसे 'रात गई, बात गई' की तरह भूला देता हूं।

अपने लेखन में फोकट की गंभीरता-रचनात्मकता-कलात्मकता का राग मैं पालता नहीं। जैसा खोपड़ी में आ गया, लिख दिया। बाकी छापना, न छापना अगले की मर्जी पर निर्भर।

मैंने ऐसे तमाम बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों को देखा है, जो इधर कुछ भेजते ही संपादक की नाक में दम कर देते हैं फोन कर-करके। लिखते भले ही 'घासलेट' हों चूंकि बड़े नाम हैं तो छापना अगले ही मजबूरी है। इसलिए छपते भी हैं। जबकि उनसे कहीं बेहतर तो आजकल के नए लेखक लिख रहे हैं। मगर वरिष्ठ लेखक कहां जूनियर लेखकों का 'दम' मानने को तैयार होंगे। वो तो हमेशा अपनी वरिष्ठता की रस्सी में ही ऐंठे रहते हैं।

खैर कहिए कुछ भी किंतु लेखन का असली सुख अपनी मर्जी और शर्तें पर लिखने में ही है, मंटो की तरह। इस-उस की बटरिंग कर-कराके छपना भी कोई छपना है लल्लू।

5 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

एक बार रचनाकार.ऑर्ग को आजमा देखें. अभी ही एक रचना भेजें और दस मिनट के भीतर प्रकाशन की सूचना पाएँ!

:)

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मौत का व्यवसायीकरण - ब्लॉग बुलेटिन" , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर।

sunita agarwal ने कहा…

बढ़िया कटाक्ष सोलह आने सच :)

Kavita Rawat ने कहा…

कोई छापे न छापे, सूचना दे या ना दे लेकिन अपना blogspot तो publish बटन पर क्लिक करते हैं छाप देता है...