शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

पुस्तक मेला और सेल्फी

पुस्तक मेला में लेखकों के बीच किताबों का 'क्रेज' कित्ता है, यह तो मैं नहीं जानता, मगर हां 'सेल्फी' का क्रेज खूब नजर आ रहा है। लेखकों की सेल्फियां फेसबुक पर छाई हुई हैं। लेखक जित्ती चर्चा अपनी या दूसरे के किताब की नहीं कर रहा, उससे कहीं ज्यादा सेल्फी की कर रहा है। बिन सेल्फी पुस्तक मेला में पुस्तक का लोकार्पण अधूरा है।

सेल्फी के प्रति दीवानगी अभी तलक नए-नए लड़कों-लड़कियों में ही देखने-सुनने को मिला करती थी। मगर अब लेखक लोग भी सेल्फी की गंगा में हाथ धोने को बेताब दिखते हैं। चलो अच्छा है, इस बहाने लेखकों के चेहरों पर हल्की-फुल्की मुस्कुराहट तो देखने को मिल जाती है। वरना तो हिंदी का लेखक 'मुस्कुराता' कम 'रोता' अधिक है।

हर लेखक की यह 'तमन्ना' होती है कि उसकी किताब पुस्तक मेला में जरूर आए। ताकि वो भी 'गर्व' के साथ कह सके कि इस दफा मेरी किताब भी पुस्तक मेला में फलां-फलां स्टॉल पर मौजूद रहेगी। नजर अवश्य डालें। फिर अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए फेसबुक से बेहतर प्लेटफॉर्म कौन-सा है भला।

लेखक लोग आजकल फेसबुक का इस्तेमाल पोस्ट लिखने में कम अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए अधिक कर रहे हैं। बढ़िया है इस बहाने लेखकों को 'मार्केटिंग का महत्त्व' तो पता चल रहा है। वरना तो हिंदी का लेखक मार्केट से यों खार खाए बैठा रहता है, जैसे कुत्ता बिल्ली से।

फेसबुक पर छाईं पुस्तक मेला की सेल्फियों को देखकर साफ पता चल रहा है, जैसे ये 'पुस्तक मेला' न होकर कोई 'सेल्फी मेला' हो। क्या लेखक, क्या आम लोग सभी लगे हुए हैं अपनी गर्दन को दूसरे की गर्दन से आगे रखने में ताकि सेल्फी में उनका चेहरा भी आ सके। इस बात का जिक्र 'न' के बराबर हो रहा है कि फलां लेखक की किताब पर अन्य लेखकों की 'प्रतिक्रिया' क्या रही, क्रेज वरिष्ठ लेखकों के साथ सेल्फी का ज्यादा दिख रहा है। मानो, लोकार्पण तो केवल बहाना है, असली मकसद सेल्फी लेना है।

लेखक होने की परिभाषा अब थोड़ी बदल-सी गई है। अब आपको लेखक तब ही माना जाएगा, जब किसी बड़े-वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार के साथ (मय पुस्तक) आपकी सेल्फी होगी। बिन सेल्फी आप खुद को कित्ता ही बड़ा लेखक मानते-समझते रहिए पर बेकार है। सेल्फी वो सार्टिफिकट है, जिसे मोबाइल में लेकर आप यहां-वहां घूम-घामकर एक-दूसरे को दिखा सकते हैं। कि, देखो अब मैं भी बड़ा लेखक हो लिया हूं फलां वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार के साथ सेल्फी लेके।

इस दफा पत्नी की भी काफी जिद रही कि मेरी पुस्तक भी पुस्तक मेला में आए। मेरी किताब भी किसी बड़े प्रकाशक के बुक स्टॉल पर सजी मिले। पुस्तक लोकार्पण के वक्त मेरी सेल्फी भी बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों संग हो। अखबारों में मेरी किताब का जिक्र हो। आस-पड़ोस व नाते-रिश्तेदार मेरी किताब पर बधाईयां देने घर आएं।

लेकिन किताब के लिए मैंने ही मना कर दिया। क्या करना है किताब लाके। अपनी लेखन की दुकान बिन किताब ही 'टनाटन' चल रही है। अपनी किताब लाने का मतलब है खामखा की सरदर्दी मोल ले लेना। प्रकाशक से रॉयल्टी के लिए कौन लगड़ता-झगड़ता रहेगा। कौन समीक्षकों से चिरौरी करता फिरेगा कि मेरी किताब पर भी कुछ लिख दीजिए। कौन किताब को बेचने का झंझट मोल लेगा। किताब नहीं है तो सुकून है। किताब के साथ सम्मान-पुरस्कार की भी तो जुगाड़ करनी पड़ती है न। न यार न ये सब मुझसे न हो पाएगा।

मैं तो दूसरों की किताबों के लोकार्पण और उनकी सेल्फियों को देख-देखकर ही खुश हो लेता हूं। दूसरे की खुशी में मुझे अपनी खुशी नजर आ जाती है। और क्या चाहिए प्यारे।

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