गुरुवार, 14 जनवरी 2016

सेंसेक्स का सेंटिमेंट

किसी को न हो मगर मुझे तो सेंसेक्स की हर वक्त 'फिकर' रहती है। जब भी सेंसेक्स को गिरते देखता हूं कसम से बड़ा 'दुख' होता है। मन करता है 'हथेली' लगाकर उसे संभाल लूं। लेकिन मेरे संभालने से भला कहां वो संभलने वाला है। जब गिरता है तो गिरता ही चला जाता है। फिर यह भी नहीं देखता कि उसकी गिरावट से दूसरों को कित्ती चोट पहुंच रही है।

बेचारा सेंसेक्स भी क्या करे? अपनी मर्जी से चल नहीं सकता। ग्लोबल सेंटिमेंट जैसे बनते हैं, उन्हीं के अनुरूप उसे चलना होता है। ग्लोबल मंदी और तेजी का समान प्रभाव रहता है उस पर। संवेदनशील इत्ता है अगर कोई जरा-सा छींक भी दे तो भर-भराकर यों लुढ़क पड़ता है मानो जलजला आ गया हो। इसमें कोई शक नहीं कि सेंसेक्स दिल का बहुत कमजोर है। कब, कहां, कैसे अटैक पड़ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता।

अब देखिए न, चीनी शेयर बाजार में आई भयंकर गिरावट का असर हमारे सेंसेक्स पर भी साफ दिखा। सेंसेक्स ने एक ही दिन पांच सौ प्वाइंट से अधिक लुढ़क कर जतला दिया कि वो चीनियों के गम में बराबर का शरीक है। क्या करे, गिरना उसकी मजबूरी है। नहीं गिरेगा तो अड़ोसी-पड़ोसी शेयर बाजार वाले ताने देंगे कि देखो कित्ता मतलबी है, गिरने में दोस्त का साथ भी नहीं दे सकता।

सेंसेक्स को क्या मालूम कि दोस्त के प्रति दरियादिली की भारी कीमत यहां निवेशकों को चुकानी पड़ती है। बेचारे जैसे-तैसे कर-कराके इस बाजार से कुछ कमा पाते हैं, सेंसेक्स क्षणभर में उनकी कमाई पर पानी फेर डालता है। सेंसेक्स तो गिरकर फिर भी उठ जाता है मगर उसकी मार खाया बंदा इत्ती आसानी से नहीं उठ पाता।

इसमें कोई शक नहीं कि सेंसेक्स न सरकार का सगा है न निवेशकों का। जब मूड में होता है तो खूब चलता है। नई-नई ऊंचाईयां लाघंता है। मगर जब बे-मूड हो जाता है फिर तो तगड़ी वाट लगाकर ही चैन लेता है। कभी-कभी तो मुझे पत्नी और सेंसेक्स के मूड में जरा-भी अंतर नजर नहीं आता। दोनों ही कब में खुश हो जाएं, कब में नाराज कुछ नहीं कहा जा सकता। भलाई इसी में हैं कि दोनों से 'उचित दूरी' बनाकर रखी जाए।

चीन की अर्थव्यवस्था भी हाथी के दांत जैसी होती जा रही है। दिखाने के लिए कुछ और खाने के लिए कुछ। जानकर पंडितों का कहना है कि चीनी अर्थव्यवस्था अपने विषम-दिनों में चल रही है। युआन को संभालने की कोशिशें तो खूब की जा रही हैं मगर वो काबू में नहीं आ पा रहा। अमां, चादर से बाहर पैर फैलाओगे तो ऐसे ही होगा। खुद तो बुरे दौर से गुजर ही रहे हो साथ में दुनिया भर के बाजारों को भी लपेट रखा है।

खबरें तो लगातार यही आ रही थीं कि 2016 सेंसेक्स की सेहत के लिए अच्छा साल रहेगा। किंतु यहां तो साल के पहले ही हफ्ते में सेंसेक्स की हालत बिगड़ गई। अभी तो पूरा साल शेष है। बाजार के सेंटिमेंट अगर ऐसे ही रहे फिर तो हमारा सेंसेक्स सेंटिमेंटल हो-होके न जाने कित्तों को निपटा देगा। बेगानी शादी में अबदुल्ला दिवाना।

सेंसेक्स की फिकर है तभी तो उससे ज्यादा कुछ नहीं कहता। पता चला समझाने के चक्कर में कहीं वो मुझ पर ही सीधा न हो ले। सेंटिमेंटल लोगों का कोई भरोसा न रहता कब में क्या कर जाएं। इसीलिए केवल विनती ही कर सकता हूं कि हे! प्यारे सेंसेक्स, अपने सेंटिमेंट पर काबू रखो। यों घड़-घड़ी बहक कर न लुढ़क जाया करो। बाकी तुम्हारी मर्जी।

1 टिप्पणी:

Satish Saxena ने कहा…

वैरी गुड , आपको व्यंग्य में ही लिखना चाहिए , मंगलकामनाएं !!