बुधवार, 13 जनवरी 2016

बे-किताब ही प्रसन्न हूं

जब भी दिल्ली में पुस्तक मेला शुरू होता है, मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। दिमाग काम करना बंद कर देता है। न कुछ लिखने का मन करता है, न पढ़ने का। मित्र लोग सवाल पूछ-पूछ कर मेरी नाक में दम किए रहते हैं। कि, 'इस बार मेरी कौन-सी किताब आ रही है? किताब का लोकार्पण किस साहित्यकार से करवा रहा हूं? समीक्षा के लिए किताब किस लेखक या पत्रिका को भेजी है?'

जबकि मैं उन्हें पहले भी हजार दफा समझा चुका हूं कि मेरी कोई किताब-सिताब नहीं आ रही। चूंकि मैं साहित्य का आदमी नहीं हूं इसलिए साहित्यकारों से न दूर का कोई वास्ता है न करीब का। मेरा काम सिर्फ लिखना है। और मैं लिख रहा हूं। लिख इसलिए रहा हूं ताकि चार पैसों की कमाई को सके। लेखन में मुझे कोई 'बड़ा तीर' नहीं मारना। न चेतन भगत बनने का इरादा रखता हूं, न हरीशंकर परसाई। मैं जो हूं मेरे तईं ये ही बहुत है।

लोग कह तो बड़ी आसानी से देते हैं कि तुमने बहुत लिख लिया। अब ये सब किताब के रूप में आना चाहिए। किताब से ही तो लेखक को 'पहचान' मिलती है। बात सही है। मगर आज के दौर में किताब छपवाना कोई इत्ता 'सरल' थोड़े न है। मैं अब इत्ता बड़ा या महान लेखक भी नहीं हूं कि प्रकाशक मुझसे खुद कहेगा, जी हम आपकी किताब छापना चाहते हैं। आपको छापकर हम 'सम्मानित' फील करेंगे।

हां, अपनी अंटी से पैसा खरच कर किताब कहीं भी किसी से भी छपवाई जा सकती है। पहले किताब छपवाने में पैसा खरच करो। फिर उसकी मुफ्त कापियां लेखकों-मित्रों को डाक से भेजने में पैसा स्वाह करो। फिर समीक्षों-पत्रिकाओं से चिरोरियां करते फिरो कि किताब की समीक्षा जरा बढ़िया करके कर देना। किताब छपने के बाद फिर यहां-वहां जुगाड़ बैठाते रहो सम्मान-पुरस्कार के वास्ते। फिर प्रकाशक से रॉयल्टी के लिए जी-हुजूरी करो। रॉयल्टी समय पर न मिले तो लड़ाई-झगड़े।

न प्यारे न मुझसे न होने के ये दंद-फंद। अपने यहां किताब छपवाना पर्वत पर चढ़ाई करने से भी बड़ा और कठिन काम है। आज तलक मैंने कभी अपने बॉस की बटरिंग नहीं की, लेखक-प्रकाशक की क्या खाक करूंगा। बे-किताब जैसा हूं, ठीक हूं। किताब कहीं 'हिट' हो गई तो 'मशहूर' होने का झंझट। मशहूरियत भी न कभी-कभी जी का जंजाल बन जाती है प्यारे।

एक बात और; मेरे घर में पढ़ने-लिखने की 'बीमारी' सिर्फ मुझे ही है। मेरा लिखा मेरे घर में न पत्नी पढ़ना चाहती है, न बच्चे। गजब यह है कि शहर के ज्यादातर लोग तो यह भी नहीं जानते कि मैं लेखक भी हूं! पत्नी को तो मेरा लिखना खामखा पन्ने काले-नीले-पीले करना टाइप ही लगता है। वो तो साफ कह देती है, ऐसे लेखन से भी क्या फायदा, जिससे दमदार कमाई न हो सके।

इत्ता खरचा करके। दिमागी टेंशन को पालके किताब लाने का क्या फायदा? कल को कहीं अगर मैं निपट लिया तो न किताब का कोई मोल रहेगा, न रॉयल्टी का अता-पता। इसीलिए मुझे बिदआउट टेंशन लेखन करने में ज्यादा मजा आता है। इधर लिखा। उधर भेजा। जिधर छपा वहां से पैसे सीधा खाते में। जय श्रीराम।

देखते-देखते पुस्तक मेला भी अब 'सेल्फी मेला' में परिवर्तित होता जा रहा है। बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों संग सेल्फी लेना। उनके हाथों किताब का लोकर्पण करवाना। तुरंत 'आत्ममुग्धता' पाल लेना कि अब हम भी बड़े लेखक हो लिए।

मैं बे-किताब ही प्रसन्न हूं। जब दुकान ऐसे ही मस्त चल रही है, फिर किताब छपवाके झंझट क्यों मोल लेना?

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