रविवार, 31 जनवरी 2016

स्मार्ट सिटी के पचड़े

इत्ती मेहनत। इत्ती कवायदें। इत्ती हसरतें। सब की सब 'बेकार' गईं। मेरे शहर का स्मार्ट सिटी होने-बनने का सपना अंततः सपना ही रह गया। सरकार को यूपी-बिहार में एक भी शहर इस लायक न लगा, जिसे स्मार्ट बनाया जा सके। केवल उन्हीं शहरों को चुना गया, जो पहले से ही स्मार्ट हैं। संभवता अब और स्मार्ट हो लेंगे।

लेकिन मैं सरकार के इस फैसले पर रत्तीभर भी हैरान-परेशान नहीं हूं। स्पष्ट कर दूं, मुझे स्मार्ट सिटी का कॉस्पेट ही 'बोरिंग' टाइप लगता है। दरअसल, स्मार्ट होना स्मार्ट होने की निशानी कम 'बीमारी' अधिक है। इत्ते दिनों से अखबारों में लगातार स्मार्ट होने-बनने का ज्ञान बांटा जा रहा था। यहां कचरा न फैलाओ। वहां पान की पीक से दिवारों पर चित्रकारी न करो। पॉलीथिन का प्रयोग बंद करो। बाइक पर हेलमेट पहनकर चलो। प्रदूषण कम करो। पेड़-पौधे लगाकर शहर को हरा-भरा बनाओ। आदि-इत्यादि।

चूंकि हम सदियों पुरानी आदतों से मजबूर हैं इसलिए कुछ भी करने या मानने को यों ही तैयार नहीं हो जाते। लोग थोड़े-बहुत दिन तो रौ में दिखते हैं, फिर वापस अपनी उन्हीं कथित हरकतों-आदतों पर लौट आते हैं। जिंदगी को इत्ता व्यवस्थित या स्मार्ट होके जिएंगे, तो माहौल में घुटन कित्ती बढ़ जाएगी, ये न सरकार समझ पा रही है, न कथित अफसरान।

स्मार्ट तो हम 'ऑलरेडी' हैं और ज्यादा स्मार्ट होकर क्या करेंगे? कभी-कभी जरूरत से अधिक खाना भयंकर अपच का कारण बन जाता है। सरकार जित्ता पैसा शहरों को स्मार्ट बनाने में खरचा करेगी, उससे तो अच्छा है कि गरीबों-बेरोजगारों के वास्ते कुछ नई स्कीमें ले आए। कम से कम बेचारे सरकार को 'दुआएं' तो देंगे।

शहरों के स्मार्ट होने से ज्यादा से ज्यादा हमारा स्टेटस ही तो ऊंचा उठ जाएगा। यहां सोशल मीडिया पर एक तगड़ी-सी पोस्ट डालकर देखें दो मिनट नहीं लगेंगे स्टेटस ऊंचा होने में। चार जने जानेंगे सो अलग। लगता सुनने में बहुत अच्छा है स्मार्ट सिटी, स्मार्ट लोग, स्मार्ट लिविंग, स्मार्ट सिस्टम लेकिन स्मार्ट होने-बनने के अपने ही पचड़े हैं। मतलब, बंदा हर वक्त कोट-पैंट-टाई लगाए रहना-दिखना चाहिए।

अभी हाल सरकार ने एक ट्रेन (महामना एक्सप्रेस) को स्मार्ट बनाकर ज्यों ही जनता की सेवा के वास्ते उतारा, अगली दफा ही उसमें से सामान गायब होने लगा। गंदगी का वो आलम कर दिया कि जिसने देखा अपना माथा ही पीटा। इत्ती साफ-सुधरी, एकदम होटलनुमा ट्रेन में चढ़कर ही आधे से ज्यादा यात्रियों का सिर चकरा गया होगा। बहुत देर तलक तो इस सोच में ही पड़े रहें होंगे कि इन सीटों पर बैठें या वाजू में खड़े रहें। मौका पाते ही कुछ लोगों ने साफ-सफाई के प्रति अपना वास्तविक चरित्र दुनिया को दिखा दिया।

इसीलिए तो कहता हूं, ये स्मार्ट-विस्मार्ट बनना हमारे बस का रोग नहीं। हम सदियों से जैसे रहते आए हैं, उसी में खुश हैं। सिटी को स्मार्ट बनाके क्या कर लेंगे, जब नागरिकों ने दिवारों को पीक-दान बनाने की ठान ही रखी है। खामखा इत्ती मेहनत से क्या फायदा हुजूर। केवल ऊपर के कपड़े बदल लेने भर से क्या होता है, जब हमारा तन-मन ही गंदा हो।

सरकार ने जिन शहरों को स्मार्ट सिटी की सूची में नहीं शामिल किया तो कुछ सोच-समझकर ही नहीं किया होगा। सरकार सब जानती है कि कौन-सा शहर स्मार्ट हो सकता है और कौन-सा नहीं। फायदा तो उसमें है, जो शहर पहले से स्मार्ट हैं, उन्हें फिर से स्मार्ट बना दिया जाए।

चलो खैर मेरे शहर का नाम स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल नहीं हुआ, एक झंझट से तो मुक्ति पाई। अब मैं और स्वतंत्र होके यहां-वहां पान की पीके उछाल सकूंगा। अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर बिखेर सकूंगा। जिन्हें जो समझना है समझें, अपनी बला से।

सोमवार, 25 जनवरी 2016

गणतंत्र दिवस पर सेल

यों गणतंत्र दिवस का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। इस दिन देश एवं शहीदों के प्रति हमारी भक्ति अचानक से जाग जाती है। देश के स्वाभिमान पर मर-मिटने की हम कसमें खाते हैं। स्कूलों से लेकर गली-मोहल्लों तक में झंडा-वंदन किया जाता है। मिठाईयां (समोसे के साथ) बांटी-बंटावाईं जाती हैं। किस्म-किस्म के सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। नौकरीपेशा वर्ग को यह 'आराम' रहता है कि आज 26 जनवरी की छुट्टी है। ऐसी छुट्टियां उनके तईं किसी 'वरदान' से कम नहीं होतीं।

साथ-साथ गणतंत्र दिवस का हमारे जीवन में एक और खास महत्त्व है, 'महा-सेल' का। जी हां, मौका चाहे गणतंत्र दिवस का हो या स्वतंत्रता दिवस का बाजार खुद को भुनाना कभी नहीं भूलता। बाजार के लिए तो हर त्यौहार या दिवस सेल का महा-आयोजन समान है। इन दिवसों पर सेल-डिस्काउंट का वो हाल रहता है, मानो मार्केट में सबकुछ फ्री-फ्री है। जो चाहे खरीद लो।

गणतंत्र दिवस पर सेल के लालच ने लोगों को भी खासा 'स्मार्ट' बना दिया है। कुछ लोग इस दिवस का इंतजार ही इसलिए करने लगे हैं ताकि सेल से कुछ सस्ता खरीद सकें। कपड़े से लेकर मोबाइल तक पर कंपनियां इत्ता-इत्ता डिस्काउंट दे देती हैं, बंदा न चाहते हुआ भी खरीद ले। सेल और डिस्काउंट का हमारे यहां उत्ता ही क्रेज है, जित्ता पुस्तक मेला में वरिष्ठ लेखकों संग सेल्फी लेने का।

ऐसा नहीं है कि देश पर जान कुर्बान करने वाले हमारे दिलों में नहीं रहते। सब रहते हैं मगर उनको याद करने का रंग-ढंग अब बदल-सा गया है। हर दिवस अब 'सेलिब्रेशन' के तौर पर मनाया जाने लगा है। नए लोग हैं। नया मिजाज है। नया ऐटमॉसफेयर है। अब लोगों कने इत्ता वक्त भी कहां होता कि पूरा दिन किसी को याद करने में ही बिता दे। इत्ती फुर्सत भी किसी के पास नहीं बची है कि वो ढंग से खुद के बारे में ही कुछ सोच-समझ सके। पूरा समय तो नौकरी और सफर करने में ही खत्म हो जाता है।

फिर भी, ये जज्बा क्या कम है कि देश के प्रति निष्ठा व सम्मान लोगों के दिलों में कायम है।

लोगों के पास वक्त की कमी का फायदा बाजार ने खूब उठाया है। अब किसी को कहीं जाने या भीड़ में धक्के खाने की जरूरत नहीं। ऑन-लाइन बाजार हाजिर है, हर तरह की खरीद-बेच के लिए। लुत्फ देखिए, त्यौहारों पर जो सेल लगती है वो तो है ही, गणतंत्र दिवस पर ऑन-लाइन प्रॉडेक्ट्स पर इत्ता हैवी डिस्काउंट मिलता है कि बंदा ललचाए बिना रह ही नहीं पाता।

ऑन-लाइन बाजार ने तो गणतंत्र दिवस के महत्त्व को ही बदलकर रख दिया है। बंदे को गणतंत्र दिवस पर सेल का इंतजार यों रहता है मानो 'अंधे के हाथ बटेर' लगने को हो। अपने देश के लोग भी खूब महान हैं। सेल चाहे ऑन-लाइन हो या फिर सीधे मार्केट में जमकर खरीददारी करते हैं। बाजार तो छोड़िए मॉल तक में पैर रखने की जगह नहीं बचती। कहना न होगा, खरीददारी के मामले में हम हिंदुस्तानियों का जवाब नहीं।

मैंने तो ऐसे लोग भी देखे हैं, जो किसी के मातम में शामिल होने दूसरे शहर जाते ही इसलिए हैं ताकि समय मिलने पर कुछ खरीददारी कर सकें। वहां तो वो अपने मुताबिक सेल की शॉप भी तलाश लेते हैं।

सेल के चसके ने हर दिवस और त्यौहार को खरीददारी में बदल दिया है। बाजार चलकर सीधा हमारे घरों में आ गया है। मुझे तो कभी-कभी भारत गरीब नहीं बल्कि खरीददारी के मामले में सबसे अमीर देश लगता है। आंकड़ें बताते हैं कि लोग सत्तर फीसद खरीददारी अब ऑन-लाइन करने लगे हैं। गणतंत्र दिवस आदि पर यह आंकड़ा और बढ़ जाता है।

अभी ये हाल है तो आगे आने वाली पीढ़ी गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस को शायद 'सेल' और 'डिस्काउंट दिवस' के नाम से ही जाना करेगी!

चलिए फिर मैं भी निकलता हूं गणतंत्र दिवस पर लगी सेल का लाभ उठाने।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

मजाक न करियो

हां, वाकई समय बहुत तेजी से बदल रहा है। इत्ती तेजी से कि सामने वाले से मजाक करना तक 'दूभर' हो गया है। क्या भरोसा आपके मजाक को वो कैसे ले ले। मजाक-मजाक में थाने पहुंच जाए और आपके खिलाफ मुकदमा लिखवा दे। फिर लगाते रहें आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर खुद को 'निर्दोष' साबित करने के लिए।

लोगों की भावनाओं का टेंपरामेंट अब पहले जैसा नहीं रहा। जरा-सी बात में 'आहत' हो लेती हैं। जहां आहत होने का कोई सीन नहीं होता, वहां इस बात पर आहत हो जाती हैं कि चर्चा में बने रहने के लिए कुछ तो चाहिए। ये ही सही।

मीडिया और समाज के बीच 'फेमस' होने के लिए भावनाओं को आहत कर लेना सबसे उम्दा गेम है। कल तलक जिन चेहरों को कोई नहीं पहचानता था, आज पहचान गया है क्योंकि वे किसी न किसी आहत भावना के मारे हैं।

अभी भक्त लोगों की भावनाएं मजाक से आहत हुईं हैं। कल को हो सकता है जरा मुस्कुराने भर से हो जाएं। आज के दौर में आदमी के दिमाग का कोई ठौर नहीं, कब में सांप की मानिंद पलट कर किसे डस ले। पहले मैं यह मजाक समझता था लेकिन अब मुझे यकीन-सा होता चला जा रहा है कि मिलावटी खाना खा-खाके आदमी का दिमाग भी गड़बड़ा गया है। चौबीस में से तेइस घंटे शक और आहत भावनाओं के बीच ही गंवा देता है।

इसीलिए मैंने दूसरों से छोड़िए खुद तक से मजाक करना बंद कर दिया है। अब तो मैं खुद पर हंसता भी नहीं हूं। अपनी मजाक, अपनी हंसी, अपनी बतकही केवल अपने मन में ही रखता हूं। या फिर मूड हुआ तो पन्नों पर दर्ज कर देता हूं। मगर लिखा हुआ न किसी को दिखाता हूं, न कहीं छपने-छपाने भेजता हूं। क्या मालूम पढ़कर किस सियाने की भावनाएं आहत हो लें। यहां तो मेरे कने इत्ते पैसे भी नहीं कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर ला पाऊं। फुटकर लेखन से जो गाड़ी चल रही है, बस चल ही रही है।

हां, इस बात की इज्जात मैंने सबको दे रखी है कि कोई भी कैसा भी मजाक मुझसे खुलकर कर सकता है। गारंटी है न बुरा मानूंगा, न भावनाओं को आहत करूंगा। खुद की मजाक उड़ने से ज्यादा फर्क मुझे इसलिए भी नहीं पड़ता, यहां तो पूरी जिंदगी ही मजाक-मजाक में गुजरी है। ऐसे में कोई मजाक-प्रेमी मेरा मजाक उड़ाकर अपनी हसरत पूरी कर भी ले, तो खामखा क्या गुस्सा होना।

यों भी, मजाक करते और हंसते-हंसाते रहने से दिमाग और शरीर 'टनाटन' बना रहता है। भावनाएं काबू में रहती हैं। पर समझेगा कौन, यहां तो आहत होना अब फैशन का हिस्सा बनता जा रहा है। देखिए न, कुछ लोगों की तो भावनाएं मात्र स्याही फेंकने भर से ही आहत हो लीं। मन चाहे कित्ता भी काला क्यों न हो किंतु चेहरा काला नहीं होना चाहिए। कमाल है।

उधर किसानों के खेत सूखे पड़े हैं, इधर सियानों की आहत भावनाओं की खेती जमकर लह-लहा रही है। हर दूसरे दिन आहत भावनाओं से जुड़ा कोई किस्सा सामने आ ही जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे क्लास का कोई स्टूडेंट टीचर से जाकर ये शिकायत करे कि सर/मैडम सुरेश मुझे नकोच रहा है।

मजाक, आहत भावनाओं, सहिष्णुता-असहिष्णुता जैसे मसलों पर आपस में ही लड़ता-भिड़ता हमारा बौद्धिक वर्ग मुझे उन अपरिपक्व लोगों की तरह लगता है, जिनका एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल 'हल्ला' मचाना है। तब ही तो मजाक पर भी पहरेदारी इत्ती बढ़ गई है। कि, खामोश! किसी ने मजाक किया तो...।

सोमवार, 18 जनवरी 2016

शुक्रिया टि्वटर

शुक्र है, टि्वटर ने मुझे बचा लिया। 'अवसाद' में जाने से रोक लिया। न जाने क्या हाल होता मेरा?

जबकि हजार दफा कह चुका हूं, मुझे न कविता लिखने का शौक है, न पढ़ने का। मेरे लिए कविता 'काला अक्षर, भैंस बराबर' है। मगर लिंक ठेलने वाले कहां मानते हैं। जब भी फेसबुक खोलो इन-बॉक्स में पांच-दस लिंक (किस्म-किस्म की कविताओं के) पड़े मिल ही जाते थे। साथ में, शर्त ये भी रहती थी कि 'प्रतिक्रिया' जरूर दें। कुछ ने तो ये 'धमकी' तक दे डाली थी, अगर समय पर प्रतिक्रिया नहीं दी तो 'ब्लॉक' या 'अनफ्रेंड' कर देंगे।

मतलब, उलटा चोर कोतवाल को डांटे।

खैर, कुछ दिनों तक तो 'इग्नोर' ही किया। सोचा चलने दो जैसा चल रहा है। वर्चुअल फ्रेंड हैं, रियल नहीं। दो-चार शब्द 'तारीफ' के लिखने में अपने पास से क्या जाता है। अगला खुश होकर 'दुआएं' ही देगा। मगर पानी जब सिर के ऊपर से बहने की हिमाकत करने लगा फिर 'डिसाइड' किया कि अब फेसबुक और कथित कवियों की कविताओं से 'छुटकारा' पा ही लेना चाहिए। ऊपर वाले ने जैसे-तैसे करके मुझे एक दिमाग दिया है, उसे भी आड़ी-तिरछी कविताओं में घुसेड़े रहूंगा, तो कैसे चलेगा। दिमाग का क्या भरोसा! परेशान होकर एक दिन चलना ही बंद कर दिया तो। मैं तो 'बे-दिमाग' हो जाऊंगा।

मैं अपने दिमाग को कतई खोना नहीं चाहता हूं। जित्ता भी है, मेरा काम तो चला ही रहा है न। काफी है। गलत कहते हैं लोग कि दुनिया दिमाग वालों से चलती है। अगर दिमाग वालों के सहारे ही चल रही होती तो फेसबुक पर हर कोई कवि न होता। ऐसे-ऐसे भयंकर कवियों की कविताओं को पढ़ने के बाद खुद को 'गरियाने' का दिल न करता- रे बुड़बक तूने कविता पढ़ी ही क्यों?

मुझे लगता है, फेसबुक पर अस्सी फीसद अकांउट में सत्तर फीसद तो कवि ही होंगे! जिसे देखो वो फेसबुक पर कविता पेलने में लगा हुआ है। माना कि आपको कविता लिखने का शौक है। लिखें, खूब लिखें। मगर जिसे कविता पढ़ने का शौक ही नहीं, उसे तो लिंक न ठेलें। बार-बार इन-बॉक्स में घुस-घुसकर कविता न पढ़ने पर 'ब्लॉक' करने की धमकी तो न दें। आदमी की लाइफ में मुसीबतों का रायता क्या कम फैला हुआ है, जो बेतुकी कविताओं को पढ़के दिमाग का दही और बना ले।

इन्हीं सब कथित कवियों-कविताओं से 'परमानेंट मुक्ति' पाने के लिए मैंने फेसबुक का दामन त्यागकर टि्वटर का साथ पकड़ लिया। जब से टि्वटर पर आया हूं, कसम से बड़ी दिमागी शांति महसूस कर रहा हूं। सबसे खास बात यह है कि टि्वटर पर न कविता है, न कवि (अपवाद छोड़कर)। 140 शब्दों की लिमिट है। अब 140 शब्दों में नंगा क्या नहाएगा, क्या निचोड़ेगा।

अभी हमारे इलाके के कवि इत्ते महान नहीं हुए हैं कि 140 शब्दों में कविता पेल सकें। यहां तो कवि पांच-दस किलोमीटर से कम लंबी कविता लिखना खुद की 'तौहीन' मानता है। जब से फेसबुक आया है, तब से तो कवि हर विषय, हर मुद्दे पर कविता लिखने को यों तैयार बैठे रहतें हैं, जैसे पूनम पांडे कपड़े उतारने को।

टि्वटर पर बहुत 'आराम' है। यहां न तो कोई किसी की दीवाल फंदाता है, न झांकता। सब अपनी ढफली, अपना राग बजाने में व्यस्त रहते हैं। 'न तुम हमें जानों, न हम तुम्हें जाने' जैसा हिसाब-किताब रहता है यहां।

हां, टि्वटर पर 'वन-लाइनर' गजब के होते हैं। बंदा जो बात पांच-छह सौ शब्दों के व्यंग्य में नहीं कह पाता 140 शब्दों में खूब कह लेता है। मेरा तो मानना है कि भविष्य में सबसे ज्यादा व्यंग्य टि्वटर पर ही लिखा जाएगा। और वो भी चंद शब्दों में। टि्वटर के वन-लाइन पढ़के तबीयत हरी और दिमाग टेंशन-फ्री हो जाता है।

मैं तो लाख-लाख बार टि्वटर का 'शुक्रिया' अदा करता हूं कि उसने मुझे 'पकने' से बचा लिया। अगर टि्वटर न होता तो आज मैं भी बरेली के पागलखाने में पड़ा कविताएं ही पढ़ रहा होता।

रविवार, 17 जनवरी 2016

छपने के लिए बटरिंग न की है, न करूंगा

छपने-छपाने के बड़े मसले हैं। जहां कुछ छपने को भेजो, वहां से जवाब मिलना तो दूर की बात है, छपेगा भी या नहीं; यही पता नहीं चल पाता। केवल इंतजार करते रहो। इंतजार करते-करते मैटर भी पुराना हो लेता है। अब कोसते रहिए न छापने वाले को पर उसकी सेहत पर भला कौन-सा फर्क पड़ना है। वो बेचारा तो अपने आका के निर्देश का गुलाम ठहरा।

न जी न फर्क इससे कोई नहीं पड़ता कि आप कित्ता अच्छा या खराब लिखते हैं। फर्क इससे पड़ता है कि कुर्सी पर बैठे बंदे से आपके संबंध कैसे हैं। संबंध अगर मधुर हैं तो आपका लिखा घास-कूड़ा भी सिर आंखों पर। संबंधों में अगर तना-तनी है या अगला आपको पसंद ही नहीं करता, फिर तो आप ऐड़ी-चोटी तक का दम लगा लो, छप ही नहीं सकते।

ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। फिर भी अपवाद हर जहां होते हैं।

अच्छा, बटरिंग करना मेरी आदत नहीं। ठोक कर लिखता हूं। ठसक के साथ छपने को भेजता हूं। अगला छापता है तो बढ़िया। नहीं छापता तो उसकी मर्जी। अगले को बार-बार फोन करके छापने के लिए जी-हुजूरी करना मेरा स्वभाव नहीं। माल में दम होगा तो छपेगा। नहीं होगा तो पड़ा-पड़ा सड़ जाएगा।

यों भी मेरे लिए लेखन एक तरह से 'दुकानदारी' की तरह है। रोज माल बनाता हूं। रोज बेचने को बाजार में ले जाता हूं। माल अच्छा होता है तो बिकता है। अच्छा नहीं होता, नहीं बिकता। अफसोस करने से क्या फायदा? बिके माल का पैसा मेरे खाते में आते ही, उसे 'रात गई, बात गई' की तरह भूला देता हूं।

अपने लेखन में फोकट की गंभीरता-रचनात्मकता-कलात्मकता का राग मैं पालता नहीं। जैसा खोपड़ी में आ गया, लिख दिया। बाकी छापना, न छापना अगले की मर्जी पर निर्भर।

मैंने ऐसे तमाम बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों को देखा है, जो इधर कुछ भेजते ही संपादक की नाक में दम कर देते हैं फोन कर-करके। लिखते भले ही 'घासलेट' हों चूंकि बड़े नाम हैं तो छापना अगले ही मजबूरी है। इसलिए छपते भी हैं। जबकि उनसे कहीं बेहतर तो आजकल के नए लेखक लिख रहे हैं। मगर वरिष्ठ लेखक कहां जूनियर लेखकों का 'दम' मानने को तैयार होंगे। वो तो हमेशा अपनी वरिष्ठता की रस्सी में ही ऐंठे रहते हैं।

खैर कहिए कुछ भी किंतु लेखन का असली सुख अपनी मर्जी और शर्तें पर लिखने में ही है, मंटो की तरह। इस-उस की बटरिंग कर-कराके छपना भी कोई छपना है लल्लू।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

पुस्तक मेला और सेल्फी

पुस्तक मेला में लेखकों के बीच किताबों का 'क्रेज' कित्ता है, यह तो मैं नहीं जानता, मगर हां 'सेल्फी' का क्रेज खूब नजर आ रहा है। लेखकों की सेल्फियां फेसबुक पर छाई हुई हैं। लेखक जित्ती चर्चा अपनी या दूसरे के किताब की नहीं कर रहा, उससे कहीं ज्यादा सेल्फी की कर रहा है। बिन सेल्फी पुस्तक मेला में पुस्तक का लोकार्पण अधूरा है।

सेल्फी के प्रति दीवानगी अभी तलक नए-नए लड़कों-लड़कियों में ही देखने-सुनने को मिला करती थी। मगर अब लेखक लोग भी सेल्फी की गंगा में हाथ धोने को बेताब दिखते हैं। चलो अच्छा है, इस बहाने लेखकों के चेहरों पर हल्की-फुल्की मुस्कुराहट तो देखने को मिल जाती है। वरना तो हिंदी का लेखक 'मुस्कुराता' कम 'रोता' अधिक है।

हर लेखक की यह 'तमन्ना' होती है कि उसकी किताब पुस्तक मेला में जरूर आए। ताकि वो भी 'गर्व' के साथ कह सके कि इस दफा मेरी किताब भी पुस्तक मेला में फलां-फलां स्टॉल पर मौजूद रहेगी। नजर अवश्य डालें। फिर अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए फेसबुक से बेहतर प्लेटफॉर्म कौन-सा है भला।

लेखक लोग आजकल फेसबुक का इस्तेमाल पोस्ट लिखने में कम अपनी किताब की मार्केटिंग के लिए अधिक कर रहे हैं। बढ़िया है इस बहाने लेखकों को 'मार्केटिंग का महत्त्व' तो पता चल रहा है। वरना तो हिंदी का लेखक मार्केट से यों खार खाए बैठा रहता है, जैसे कुत्ता बिल्ली से।

फेसबुक पर छाईं पुस्तक मेला की सेल्फियों को देखकर साफ पता चल रहा है, जैसे ये 'पुस्तक मेला' न होकर कोई 'सेल्फी मेला' हो। क्या लेखक, क्या आम लोग सभी लगे हुए हैं अपनी गर्दन को दूसरे की गर्दन से आगे रखने में ताकि सेल्फी में उनका चेहरा भी आ सके। इस बात का जिक्र 'न' के बराबर हो रहा है कि फलां लेखक की किताब पर अन्य लेखकों की 'प्रतिक्रिया' क्या रही, क्रेज वरिष्ठ लेखकों के साथ सेल्फी का ज्यादा दिख रहा है। मानो, लोकार्पण तो केवल बहाना है, असली मकसद सेल्फी लेना है।

लेखक होने की परिभाषा अब थोड़ी बदल-सी गई है। अब आपको लेखक तब ही माना जाएगा, जब किसी बड़े-वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार के साथ (मय पुस्तक) आपकी सेल्फी होगी। बिन सेल्फी आप खुद को कित्ता ही बड़ा लेखक मानते-समझते रहिए पर बेकार है। सेल्फी वो सार्टिफिकट है, जिसे मोबाइल में लेकर आप यहां-वहां घूम-घामकर एक-दूसरे को दिखा सकते हैं। कि, देखो अब मैं भी बड़ा लेखक हो लिया हूं फलां वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार के साथ सेल्फी लेके।

इस दफा पत्नी की भी काफी जिद रही कि मेरी पुस्तक भी पुस्तक मेला में आए। मेरी किताब भी किसी बड़े प्रकाशक के बुक स्टॉल पर सजी मिले। पुस्तक लोकार्पण के वक्त मेरी सेल्फी भी बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों संग हो। अखबारों में मेरी किताब का जिक्र हो। आस-पड़ोस व नाते-रिश्तेदार मेरी किताब पर बधाईयां देने घर आएं।

लेकिन किताब के लिए मैंने ही मना कर दिया। क्या करना है किताब लाके। अपनी लेखन की दुकान बिन किताब ही 'टनाटन' चल रही है। अपनी किताब लाने का मतलब है खामखा की सरदर्दी मोल ले लेना। प्रकाशक से रॉयल्टी के लिए कौन लगड़ता-झगड़ता रहेगा। कौन समीक्षकों से चिरौरी करता फिरेगा कि मेरी किताब पर भी कुछ लिख दीजिए। कौन किताब को बेचने का झंझट मोल लेगा। किताब नहीं है तो सुकून है। किताब के साथ सम्मान-पुरस्कार की भी तो जुगाड़ करनी पड़ती है न। न यार न ये सब मुझसे न हो पाएगा।

मैं तो दूसरों की किताबों के लोकार्पण और उनकी सेल्फियों को देख-देखकर ही खुश हो लेता हूं। दूसरे की खुशी में मुझे अपनी खुशी नजर आ जाती है। और क्या चाहिए प्यारे।

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

सेंसेक्स का सेंटिमेंट

किसी को न हो मगर मुझे तो सेंसेक्स की हर वक्त 'फिकर' रहती है। जब भी सेंसेक्स को गिरते देखता हूं कसम से बड़ा 'दुख' होता है। मन करता है 'हथेली' लगाकर उसे संभाल लूं। लेकिन मेरे संभालने से भला कहां वो संभलने वाला है। जब गिरता है तो गिरता ही चला जाता है। फिर यह भी नहीं देखता कि उसकी गिरावट से दूसरों को कित्ती चोट पहुंच रही है।

बेचारा सेंसेक्स भी क्या करे? अपनी मर्जी से चल नहीं सकता। ग्लोबल सेंटिमेंट जैसे बनते हैं, उन्हीं के अनुरूप उसे चलना होता है। ग्लोबल मंदी और तेजी का समान प्रभाव रहता है उस पर। संवेदनशील इत्ता है अगर कोई जरा-सा छींक भी दे तो भर-भराकर यों लुढ़क पड़ता है मानो जलजला आ गया हो। इसमें कोई शक नहीं कि सेंसेक्स दिल का बहुत कमजोर है। कब, कहां, कैसे अटैक पड़ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता।

अब देखिए न, चीनी शेयर बाजार में आई भयंकर गिरावट का असर हमारे सेंसेक्स पर भी साफ दिखा। सेंसेक्स ने एक ही दिन पांच सौ प्वाइंट से अधिक लुढ़क कर जतला दिया कि वो चीनियों के गम में बराबर का शरीक है। क्या करे, गिरना उसकी मजबूरी है। नहीं गिरेगा तो अड़ोसी-पड़ोसी शेयर बाजार वाले ताने देंगे कि देखो कित्ता मतलबी है, गिरने में दोस्त का साथ भी नहीं दे सकता।

सेंसेक्स को क्या मालूम कि दोस्त के प्रति दरियादिली की भारी कीमत यहां निवेशकों को चुकानी पड़ती है। बेचारे जैसे-तैसे कर-कराके इस बाजार से कुछ कमा पाते हैं, सेंसेक्स क्षणभर में उनकी कमाई पर पानी फेर डालता है। सेंसेक्स तो गिरकर फिर भी उठ जाता है मगर उसकी मार खाया बंदा इत्ती आसानी से नहीं उठ पाता।

इसमें कोई शक नहीं कि सेंसेक्स न सरकार का सगा है न निवेशकों का। जब मूड में होता है तो खूब चलता है। नई-नई ऊंचाईयां लाघंता है। मगर जब बे-मूड हो जाता है फिर तो तगड़ी वाट लगाकर ही चैन लेता है। कभी-कभी तो मुझे पत्नी और सेंसेक्स के मूड में जरा-भी अंतर नजर नहीं आता। दोनों ही कब में खुश हो जाएं, कब में नाराज कुछ नहीं कहा जा सकता। भलाई इसी में हैं कि दोनों से 'उचित दूरी' बनाकर रखी जाए।

चीन की अर्थव्यवस्था भी हाथी के दांत जैसी होती जा रही है। दिखाने के लिए कुछ और खाने के लिए कुछ। जानकर पंडितों का कहना है कि चीनी अर्थव्यवस्था अपने विषम-दिनों में चल रही है। युआन को संभालने की कोशिशें तो खूब की जा रही हैं मगर वो काबू में नहीं आ पा रहा। अमां, चादर से बाहर पैर फैलाओगे तो ऐसे ही होगा। खुद तो बुरे दौर से गुजर ही रहे हो साथ में दुनिया भर के बाजारों को भी लपेट रखा है।

खबरें तो लगातार यही आ रही थीं कि 2016 सेंसेक्स की सेहत के लिए अच्छा साल रहेगा। किंतु यहां तो साल के पहले ही हफ्ते में सेंसेक्स की हालत बिगड़ गई। अभी तो पूरा साल शेष है। बाजार के सेंटिमेंट अगर ऐसे ही रहे फिर तो हमारा सेंसेक्स सेंटिमेंटल हो-होके न जाने कित्तों को निपटा देगा। बेगानी शादी में अबदुल्ला दिवाना।

सेंसेक्स की फिकर है तभी तो उससे ज्यादा कुछ नहीं कहता। पता चला समझाने के चक्कर में कहीं वो मुझ पर ही सीधा न हो ले। सेंटिमेंटल लोगों का कोई भरोसा न रहता कब में क्या कर जाएं। इसीलिए केवल विनती ही कर सकता हूं कि हे! प्यारे सेंसेक्स, अपने सेंटिमेंट पर काबू रखो। यों घड़-घड़ी बहक कर न लुढ़क जाया करो। बाकी तुम्हारी मर्जी।

बुधवार, 13 जनवरी 2016

बे-किताब ही प्रसन्न हूं

जब भी दिल्ली में पुस्तक मेला शुरू होता है, मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। दिमाग काम करना बंद कर देता है। न कुछ लिखने का मन करता है, न पढ़ने का। मित्र लोग सवाल पूछ-पूछ कर मेरी नाक में दम किए रहते हैं। कि, 'इस बार मेरी कौन-सी किताब आ रही है? किताब का लोकार्पण किस साहित्यकार से करवा रहा हूं? समीक्षा के लिए किताब किस लेखक या पत्रिका को भेजी है?'

जबकि मैं उन्हें पहले भी हजार दफा समझा चुका हूं कि मेरी कोई किताब-सिताब नहीं आ रही। चूंकि मैं साहित्य का आदमी नहीं हूं इसलिए साहित्यकारों से न दूर का कोई वास्ता है न करीब का। मेरा काम सिर्फ लिखना है। और मैं लिख रहा हूं। लिख इसलिए रहा हूं ताकि चार पैसों की कमाई को सके। लेखन में मुझे कोई 'बड़ा तीर' नहीं मारना। न चेतन भगत बनने का इरादा रखता हूं, न हरीशंकर परसाई। मैं जो हूं मेरे तईं ये ही बहुत है।

लोग कह तो बड़ी आसानी से देते हैं कि तुमने बहुत लिख लिया। अब ये सब किताब के रूप में आना चाहिए। किताब से ही तो लेखक को 'पहचान' मिलती है। बात सही है। मगर आज के दौर में किताब छपवाना कोई इत्ता 'सरल' थोड़े न है। मैं अब इत्ता बड़ा या महान लेखक भी नहीं हूं कि प्रकाशक मुझसे खुद कहेगा, जी हम आपकी किताब छापना चाहते हैं। आपको छापकर हम 'सम्मानित' फील करेंगे।

हां, अपनी अंटी से पैसा खरच कर किताब कहीं भी किसी से भी छपवाई जा सकती है। पहले किताब छपवाने में पैसा खरच करो। फिर उसकी मुफ्त कापियां लेखकों-मित्रों को डाक से भेजने में पैसा स्वाह करो। फिर समीक्षों-पत्रिकाओं से चिरोरियां करते फिरो कि किताब की समीक्षा जरा बढ़िया करके कर देना। किताब छपने के बाद फिर यहां-वहां जुगाड़ बैठाते रहो सम्मान-पुरस्कार के वास्ते। फिर प्रकाशक से रॉयल्टी के लिए जी-हुजूरी करो। रॉयल्टी समय पर न मिले तो लड़ाई-झगड़े।

न प्यारे न मुझसे न होने के ये दंद-फंद। अपने यहां किताब छपवाना पर्वत पर चढ़ाई करने से भी बड़ा और कठिन काम है। आज तलक मैंने कभी अपने बॉस की बटरिंग नहीं की, लेखक-प्रकाशक की क्या खाक करूंगा। बे-किताब जैसा हूं, ठीक हूं। किताब कहीं 'हिट' हो गई तो 'मशहूर' होने का झंझट। मशहूरियत भी न कभी-कभी जी का जंजाल बन जाती है प्यारे।

एक बात और; मेरे घर में पढ़ने-लिखने की 'बीमारी' सिर्फ मुझे ही है। मेरा लिखा मेरे घर में न पत्नी पढ़ना चाहती है, न बच्चे। गजब यह है कि शहर के ज्यादातर लोग तो यह भी नहीं जानते कि मैं लेखक भी हूं! पत्नी को तो मेरा लिखना खामखा पन्ने काले-नीले-पीले करना टाइप ही लगता है। वो तो साफ कह देती है, ऐसे लेखन से भी क्या फायदा, जिससे दमदार कमाई न हो सके।

इत्ता खरचा करके। दिमागी टेंशन को पालके किताब लाने का क्या फायदा? कल को कहीं अगर मैं निपट लिया तो न किताब का कोई मोल रहेगा, न रॉयल्टी का अता-पता। इसीलिए मुझे बिदआउट टेंशन लेखन करने में ज्यादा मजा आता है। इधर लिखा। उधर भेजा। जिधर छपा वहां से पैसे सीधा खाते में। जय श्रीराम।

देखते-देखते पुस्तक मेला भी अब 'सेल्फी मेला' में परिवर्तित होता जा रहा है। बड़े-बड़े लेखकों-साहित्यकारों संग सेल्फी लेना। उनके हाथों किताब का लोकर्पण करवाना। तुरंत 'आत्ममुग्धता' पाल लेना कि अब हम भी बड़े लेखक हो लिए।

मैं बे-किताब ही प्रसन्न हूं। जब दुकान ऐसे ही मस्त चल रही है, फिर किताब छपवाके झंझट क्यों मोल लेना?