शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

दुनिया में हर कोई फेंक रहा है!

फेंकने में बुराई कोई नहीं। सहूलियत के हिसाब से आप कित्ता भी फेंक सकते हैं। फेंकने में न पैसे खरच होने हैं न दिमाग। बस जुबान को हिलाते रहना है। जुबान फेंकने में महत्ती भूमिका निभाती है।

मैंने तो ऐसे-ऐसे लोग देखे हैं, जो केवल अपने फेंकने के दम पर न सिर्फ लोगों के बीच ‘लोकप्रिय’ हैं बल्कि ठीक-ठाक पदों पर मस्ती कर रहे हैं। हालांकि कहने वाले उन्हें ‘शेखचिल्ली’ तक कह देते हैं मगर इससे उनकी सेहत पर फरक कोई नहीं पड़ता। उन्हें हर हाल में फेंकना है तो फेंकना है। उनकी दुकान जब फेंकने से ही चल रही है तो क्यों न फेंके।

यों, ज्यादा या कम हर कोई फेंकता है। बिन फेंके हम इस दुनिया-समाज में ‘सरवाइव’ कर ही नहीं सकते। फेंकने के मामले में अगर नेता का कोई जवाब नहीं होता तो पीछे बुद्धिजीवि भी नहीं रहता। फर्क बस इत्ता होता है कि नेता मैदान में जनता के बीच फेंकता और बुद्धिजीवि कागजों पर। आमो-खास को ‘रंगीन सपने’ दोनों ही दिखाते हैं। अगर इत्ता भी न करें तो बेकार है नेता का नेता और बुद्धिजीवि का बुद्धिजीवि होना।

फेंकने की कोशिश मैंने भी कई दफा की है। किंतु हर बार मेरा फेंकना पकड़ा गया। किसी और ने नहीं पत्नी ने ही पकड़ा। वैसे, यह ‘फैक्ट’ है- चाहे कोई कित्ता ही बड़ा ‘फेंकू’ क्यों न हो, अपनी पत्नी के आगे उसकी हर फेंक ‘बौनी’ ही साबित होती है। हां, फेंकने के मामले में वो लोग ‘सुखी’ होते हैं, जिनकी या तो पत्नियां नहीं होतीं या फिर जो पत्नियों की पहुंच से कोसों दूर रहते हैं। मुझ जैसा 24x7 पत्नी की निगरानी में रहने वाला पति फेंकने की सोचना तो छोड़िए हिम्मत भी नहीं कर सकता।

अपना दिल बहलाने के लिए फेंकू टाइप के व्यक्तियों का होना भी जरूरी है। अगर फेंकने वाले न हों तो दुनिया कतई ‘नीरस’ लगे। लंबी-लंबी फेंकने से जित्ता उनका चित्त प्रसन्न रहता है, उत्ता ही हमारा भी। हालांकि फेंकना ‘क्षणिक प्रवृत्ति’ है पर ‘मनोरंजन’ होने में क्या जाता है। जब आपका दिल ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ से बहल सकता है तो फेंकूओं की फेंकाहट से क्यों नहीं! दिल को बहलाते और मन को लगाते रहना चाहिए क्या मालूम जिंदगी की शाम कब, कहां, किस छोर पर खाक हो ले।

गड़बड़ बस वहीं हो जाती है जब हम फेंकूओं या शेखचिल्लियों को ‘सीरियसली’ ले लेते हैं। उनके फेंकने पर ‘खीझने’ जाते हैं। वे जुबान से ही तो फेंक रहे हैं, कोई पत्थर थोड़े न मार रहे। फेंकने दीजिए न। इत्ते पर भी आपको एतराज है तो अपने कान बंद कर लीजिए। बी-कूल डूड। जस्ट चिल्ल।

फेंकने वालों को सलाम ठोकिए और अपने काम पर चलिए।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

आइए, कैशलेस इकॉनोमी का लुत्फ उठाएं

लेस चीजों का अपना ही मजा है। एक तो ‘लेस’ में ‘एक्सिस’ का ‘झंझट’ नहीं रहता। लेस रहने में चीजें ‘फिट’ व ‘स्लीम’ रहती हैं। सेक्सी होने, लगने या दिखने के तईं अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर आप अपनी बॉडी में ‘लेस-वेट’ हैं तो हर भार से मुक्त हैं। जैसे कुछ साल पहले करीना कपूर ने एक फिल्म के वास्ते अपनी ‘बॉडी’ को ‘जीरो’ किया था। तब उनकी उस ‘जीरो-फिगर’ से मैं भी काफी प्रभावित रहा। कोशिश भी की अपनी बॉडी को जीरो बनाने की किंतु संभव न हो सका। दिल के अरमान फिलहाल दिल में ही हिलगे रह गए।

अब हमारी सरकार ऐसा ही कुछ हमसे भी चाहती है। 1000 और 500 के नोट बंद करने के बाद उसका सीधा-सा उद्देश्य देश के साथ-साथ इकॉनोमी को भी ‘कैशलेस’ बनाना है। सरकार चाहती है, प्रत्येक आम-ओ-खास सारे भुगतान ‘इ-पेमेंट’ के माध्यम से करे। अंटी में नोट न रख ‘प्लास्टिक मनी’ रखे। नोट के प्रति दशकों पुराना अपना ‘मोह’ त्याग दे। पूरी तरह से ‘डिजिटली-इनेविलड’ हो जाए। हालांकि इकॉनोमी और देश को कैशलेस करने का विचार है तो बहुत उम्दा लेकिन इसमें लोचे भी कुछ कम नहीं। हां, इसका समर्थन तो सब कर रहे हैं मगर अमल में लाने की हिम्मत कोई न कर पा रहा। हर किसी को बिना नोट के प्लास्टिक मनी पर निर्भर रहना मानो ‘क्लॉथलेस’ होने जैसा लग रहा है।

नोटबंदी के बाद से देश की राजनीति और कॉमरेड टाइप बुद्धिजीवियों के बीच जैसी तू-तू, मैं-मैं हुई है, उसने बहस या बातचीत के हर दरवाजे पर ताला ठोक दिया है। जो कैशलेस के हिमाइती नहीं हैं, उन्हें देश की इकॉनोमी गर्त में जाती दिख रही है। जो कैशलेस के समर्थक हैं, उन्हें देश उत्तर-आधुनिकता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। देश, समाज और इकॉनोमी दो पाटन के बीच फंस गई है। प्रश्न यही है कि जाएं तो जाएं कहां?

दरअसल, हमारी मनःस्थितियां थोड़ा डिफरेंट टाइप की रहती हैं। ‘चेंज’ से हम ‘घबरा’ से जाते हैं। विडंबना देखिए, हम नेचर में तो चेंज के हिमाइती हैं किंतु देश, समाज या इकॉनोमी में चेंज लाने से डरते हैं। भयभीत से रहते हैं अगर चेंज आ गया तो ‘परंपरागत चीजों’ का क्या होगा? अरे, परंपरागत चीजों को परंपराओं के हवाले कर आगे बढ़ने में मजा है। दुनिया इत्ती तेजी से जाने किन-किन बातों-चीजों में लेस पर लेस हुई चली जा रही है और एक हम हैं जो कैशलेस सोसाइटी या इकॉनोमी के चेंज से ही घबराए पड़े हैं।

अमां, एकदफा कैशलेस होके तो देखिए। जमाने भर के झाड़-झंकाड़ों से मुक्ति पा लेंगे। कैशलेस होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि न कोई हमसे उधार मांग सकता है न हम दे सकते हैं। जेब और बटुआ नोटों के बोझ से फ्री रहते हैं। साथ-साथ चोर बिरादरी भी चोरी का धंधा छोड़ कोई इज्जत के काम पर विचार करेगी।

जरा कल्पना करके देखिए, कैशलेस इकॉमोनी में पानी-पूरी वाला, रिक्शे वाला, ऑटो वाला, ठेले वाला, सब्जी वाला यहां तक की भिखारी भी जब आपसे कार्ड के माध्यम से पेमेंट मांगेंगे तो सीना फुलकर 56 से 98 इंजी चौड़ा हो लेगा। फिर हम भी दूसरे देशों से अपनी कैशलेस इकॉनोमी के चर्चे कर सकेंगे। अपना भी उदाहरण दे पाएंगे।

देश, समाज और लोगों के बीच चेंज ऐसे ही लाए जाते हैं। अगर हम उस दौर में कमप्यूटर से डर रहे होते न तो आज न हम विंडोज 10 पर होते, न हमारे हाथों में मोबाइल होता। जो लोग बात-बात में चेंज को गरियाते रहते हैं न, सच तो यह है कि वे ही सबसे ज्यादा चेंज का ‘उपभोग’ करने वाले होते हैं। खुद चौबीस घंटे फेसबुक, टि्वटर, वाट्सएप, आइ-फोन पर पिले रहेंगे पर बात जब समाज या इकॉनोमी में बदलाव की आती है तो इनके सीनों पर सांप-बिच्छू लोटने लगते हैं। दरअसल, बात-बात में विरोध करने वाले बेपेंदी के लोटे टाइप होते हैं। कब, किस वक्त, किसके पाले में जा लुढ़केंगे इनका कोई भरोसा नहीं रहता।

मगर कोई नहीं...। ‘मरता क्या न करता…’ की तर्ज पर विरोधी भी एक दिन कैशलेस इकॉनोमी की मुख्यधारा में आएंगे। जिंदगी का असली मजा तो लेस होने में ही है। बाकी तो बातें हैं बातों का क्या।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

रसिया टाइप व्यंग्य-लेखक

मैं मूलतः ‘रसिया’ टाइप व्यंग्य-लेखक हूं। इस बात की न मुझे ‘शर्म’ है न ‘अफसोस’। जो हूं, सो हूं। मेरे तईं खुद का होना कहीं ज्यादा मायने रखता है वनिस्पत किसी के मानने से। आप ही बताएं, व्यंग्य-लेखक में अगर रसिया टाइप लक्षण न होंगे तो क्या आलोचक में होंगे? आलोचक को 24x7 कभी भी देख लीजिए, हमेशा उसके माथे पर बल और सूरत पर पौने बारहा बजे होते हैं। कभी-कभार कोई सप ना देखकर हंसता हो तो हंसता हो किंतु मैंने तो कभी किसी आलोचक को हंसते-मुस्कुराते देखा नहीं।

पर मुझे क्या लेना-देना आलोचकों से। कौन-सी मेरी कोई किताब पुस्तक मेले में आनी है, जो मैं आलोचकों की ‘तेल-मालिश’ में जुटूं- समीक्षा के वास्ते। मुझे तो मतलब केवल अपने व्यंग्य-लेखन से है। बाकी साहित्य में कौन किसकी कहां-कहां बजा या बजवा रहा है, वे जानें।

वैसे, मैंने व्यंग्य की लाइन चुनके ठीक ही किया। यह एक ऐसी जगह है, जहां मूड एकदम ‘फ्रैश’ और ‘मस्त’ रहता है। न विचार का बोझ, न विचारधारा का झंझट। न भाषा में हटो-बचो, न गहराई के झगड़े। जो मन में आए, उसे व्यंग्य या वन-लाइनर की शक्ल देकर खींच डालो। व्यंग्यबाजी ऐसा नशा है, जो रात-दिन खोपड़ी को मदहोश किए रहता है। हरदम दिल यही करता है, रसिया बनके शब्दों का रस निचोड़ते रहो।

मुझे व्यंग्य खींचने में आनंद आता है इसीलिए खींचता हूं। खींचाई में यहां-वहां से थोड़ी-बहुत कमाई भी हो लेती है तो सोने पे सुहागा। यों भी, प्रत्येक लेखक को इत्ता प्रोफेशनल तो होना ही चाहिए। आफ्टरऑल लिखने में अपनी खोपड़ी खरच कर रहे हैं तो क्या पैसा भी न लेंगे। देखो जी, मुफत का लेखन जी का जंजाल टाइप होता है। जित्ता मुफत में लिखोगे उत्ता ही यूज किए जाओगे। खुद को और अपने लेखन को कतई प्रोफेशनलता के सांचे में ढाल लो फिर देखो मजा।

सच बोलूं तो मुझे व्यंग्य को बिना ‘ग्लैमरस’ बनाए मजा ही नहीं आता। व्यंग्य में ग्लैमर रजाई में रूई जित्ता ही जरूरी है। ग्लैमरता व्यंग्य को चटपटा एवं मसालेदार बनाए रखती है। ये क्या कि व्यंग्य लिख दिया और मस्ती भी नहीं मिली। व्यंग्य मूड को लाइट बनाने का काम करता है। व्यंग्य में भी अगर धीरता या गहराई का बोझा लाद देंगे तो भला कैसे चलेगा? व्यंग्य में रस की मात्र ही तो व्यंग्य लेखक को रसिया टाइप बनाए रखती है। व्यंग्य खींचने में इत्ती लिबर्टी भी न ली तो बेकार है व्यंग्य लेखक होना।

इसीलिए मेरी कोशिश हर दम यही रहती है कि व्यंग्य और वनलाइनर्स में मूड को लाइट और फ्रैश रखा जाए। ताकि पाठक पर वैचारिकता का अतिरिक्त बोझ न पड़े। गंभीरता-वैचारिकता के लिए साहित्य में तमाम कोने मौजूद हैं।

फिलहाल, अपना व्यंग्य लेखन तो हमेशा ऐसा ही चलेगा। बाकी सीनियर व्यंग्यकार अपनी खुद जानें।

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

दिसंबर, रजाई और देश

इत्ती सर्दी में बाहर निकलने का दिल न किया तो सोचा क्यों न रजाई के भीतर समाके ही दिसंबर में देश के हालातों को देखा-परखा जाए। यों भी, देश-दुनिया-जहान को देखने या चिंता करने का जो ‘आनंद’ रजाई में है कहीं और नहीं। रजाई के भीतर से सबकुछ अपना-अपना-सा लगता है।

यों तो दिसंबर में देश में बहुत कुछ घटा किंतु सब पर ‘हावी’ नोटबंदी ही रही। नोटबंदी के नशे ने हर खबर का भूत सिर से यों उतार दिया जैसे- ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ में मंदाकनी ने अपने कपड़े उतारे थे। हालांकि तब से अब तब समय की रेत पर से बहुत कुछ मिट चुका है, पर क्या कीजिएगा, इतिहास में एक दफा जो दर्ज हो जाता है फिर हो ही जाता है।

चलिए... खैर...।

दिसंबर में देश को करीना-सैफ से एक नया नन्हा मेहमान मिला। मगर नन्हें मेहमान के दुनिया में आते ही उसके ‘नाम’ पर ऐसी जूतम-पैजार मची, ऐसी जूतम-पैजार मची कि सारा का सारा सोशल मीडिया ही इस बहस में कूद लिया। कुछ उसके नाम के समर्थन में खड़े दिखे तो कुछ विरोध में। हर किसी ने बारी-बारी से अपनी ‘कथित विद्वता’ का प्रदर्शन फेसबुक-टि्वटर पर किया। कुछ आलोचक तो इत्ते ‘वीर’ निकले कि उन्होंने उस बेचारे नन्हे मेहमान के समूचे खानदान को ही ‘गलिया’ डाला। क्या कीजिएगा, सोशल मीडिया पर न किसी का हाथ पकड़ सकें हैं न जुबान रोक सकें। ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।‘

केवल नाम पर इत्ता दिमाग खरच करने से कहीं बेहतर होता कि वे लाइन में खड़े लोगों की मदद के लिए कुछ सार्थक करते।

दिसंबर में देश में आमिर खान की बहुचर्चित ‘दंगल’ भी रिलीज हो ली। फिल्म तो अपनी रिलीज से पहले ही अच्छी-खासी ‘चर्चे’ पा चुकी थी। फिल्म के बारे में अब तलक जो भी सुनाई या पढ़ाई में आया, लगभग सभी ने इसकी ‘तारीफ’ ठोकी है। अपना तो हमेशा से मानना रहा है कि हर अच्छी चीज की तारीफ होनी चाहिए। फिर भी, जिन्हें ‘दंगल’ की कामयाबी या तारीफ पर एतराज है, वे लंबी तानकर सोएं। बाहर ठंड बहुत है।

दिसंबर में देश में यहां-वहां से पकड़े गए गुलाबी नोटों की रंगत भी खूब तारी रही। नजरें जहां-जहां दौड़ीं गुलाबी नोटों की रंगत देखकर आंखे चौंधियां गईं। बताइए, हमारे देश के कथित अमीरों कने कित्ता नोट है। इत्ता कमाने के बाद भी नोट के प्रति उनकी भूख कम नहीं होती। किसी ने गुलाबी नोटों को अपने गुसलखाने में छिपाकर रखा तो किसी ने तहखाने में दबाकर। क्या चाय वाला, क्या भिखारी, क्या रद्दी वाला तक करोड़ों-करोड़ों के मालिक निकले। और एक मैं हूं। इत्ते सालों से कलम घिसाई कर रहा हूं फिर भी हाथ-पल्ले ‘घंटा’ कुछ नहीं आता। ऊपर से दिमाग का दही होता है सो अलग। हालांकि वे सब बदनाम जरूर हुए पर नाम भी तो खूब हुआ न। तिस पर भी लोग कहते हैं कि भारत गरीब मुल्क है। अमां, अपना देश तो अब भी ‘सोने की चिड़िया’ ही है। लेकिन चंद लोगों ने इस चिड़िया को अपने जाल में कैद कर रखा है।

दिसंबर में देश में राजनीतिक और नेताओं के बीच उठक-पठक और तू-तू, मैं-मैं भी खूब हुई। पर उस सब का जिक्र यहां करने बैठूंगा तो यह ‘व्यंग्य’ पूरा ‘उपन्यास’ बन लेगा। यों, राजनीति में हलचल 24x7 होती रहती है। इसमें क्या खोपड़ी खपाना।

दिसंबर का अंत करीब आते-आते एक अच्छी खबर मशहूर लेखिका नासिरा शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने की आई। नासिराजी को बधाईयां रहेंगी। उन्होंने जो भी लिखा कमाल लिखा। हां, कुछ साहित्यिक टाइप सयानों ने उनमें भी हिंदू-मुसलिम होने की दरार खोज ली। उन पर ‘मुसलिम लेखिका’ होने का तमगा जड़ दिया। लेखिका इससे आहत भी हुईं जोकि लाजिमी था। किंतु श्रेष्ठ काम के आगे ऐसी बौनी बातें या लोग लंबे समय तक टिके नहीं पाते। चिंता न कीजिए, एक दिन हवा में भाप बनकर ये लोग भी उड़ लेंगे। सो, बी-कूल डूड।

बाकी दिसंबर में देश एकदम ‘मस्त’टाइप ‘टनाटन’रहा। उधर सनी लियोनी का ‘रईस’ का आइटम नंबर ‘लैला मैं लैला…’खासी धूम मचाए रहा तो इधर पूनम पांडे का क्रिसमस पर यू-ट्यूब पर डाला पर अपना हॉट वीडियो।

चला-चली के बीच दिसंबर में देश पर फिलहाल सर्दी का ताप तारी है। और मैं अपनी रजाई में बैठा इन सबका आनंद ले रहा हूं।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

डिजिटल संता के झोले में डिजिटल गिफ्टस

चूंकि जमाना बहुत तेजी से ‘कैशलेस’ की तरफ बढ़ चला है तो इस दफा प्यारे संता के झोले में ‘पारंपरिक गिफ्टस’ न होकर ‘डिजिटल गिफ्टस’ होंगे! उम्मीद है, सदियों से चली आ रही परंपरा को इस बार संता तोड़ देगा। यों भी, पुरानी परंपराओं को टूट चाहिए भी ताकि समाज के बीच ‘यथास्थितिवादी’ की जड़ें मजबूत न हों। जब हम कलम से ‘की-बोर्ड’ और ‘टच-स्क्रीन’ पर आ सकते हैं तो क्या संता ‘डिजिटल गिफ्टस’ पर नहीं आ सकता? टाइम के साथ चेंज होने में ही भलाई है बंधु।

जब से कंप्यूटर, मोबाइल, वीडियो गेम, कार्टून चैनलस आदि-इत्यादि ने बच्चों के बीच खास जगह बनाई है, तब से उनका खिलौनों के प्रति चाव भी थोड़ा घटा है। बच्चे दिन-ब-दिन ‘हाई-टेक’ हो चले हैं। ‘इ-टेक्नॉलेजी’ या ‘डिजिटल नो-हाऊ’ को वो हम बड़ों से कहीं बेहतर समझते-जानते हैं। जित्ती देर में हम टच-स्क्रीन पर उंगलियां यहां-वहां नचा पाते हैं, उत्ती देर में तो वे टैक्स लिखकर वाट्सएप कर देते हैं। है न फर्क उनकी और हमारी ‘शार्पनेस’ में।

तो इसमें बच्चों को कोई हैरानी या परेशानी नहीं होनी चाहिए अगर इस बार संता के झोले में भिन्न-भिन्न टाइप के डिजिटल गिफ्टस मिलें। अजी ये तो संता का एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा ‘डिजिटाइजेशन’ को आगे बढ़ाने में। हो सकता है, इस बहाने सरकार संता को कुछ डिस्काउंट-इस्काउंट भी दे दे, उसकी डिजिटल प्रतिबद्धता के प्रति।

हां, इन डिजिटल गिफ्टस पर कुछ लोग आपत्ति जरूर जतला सकते हैं कि संता ये सब देकर बच्चों को बिगाड़ रहा है। उनका बचपना छिन रहा है। तो क्या...? न उनके कहने से बच्चे बिगड़ने वाले हैं न संता ही मानने वाला है। अमां, दुनिया इत्ती तेजी से निरंतर बदल रही है। सुनाई में आ रहा है कि कुछ सालों के भीतर मंगल पर इंसान का आशियाना भी संभव हो सकता है। फिर संता के हाई-टेक होने में क्या परेशानी?

और फिर संता भी अब कहां घर-घर जाकर बच्चों को गिफ्टस बांटता फिरता है। वो या तो अब बच्चों से ‘फेसबुक’ या ‘वाट्सएप’ पर मिल लेता है। वहीं उसे जो देना होता है दे देता है। इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में न अब संता, न बच्चों कने टाइम ही कहां बचा है। दोनों अपनी-अपनी लाइफ में जबरदस्त बिजी हैं। बच्चों पर पढ़ाई-करियर का बोझ है तो संता पर उम्र का।

अब थोड़ा संता को भी आराम करना चाहिए। सदियां हो गईं हर क्रिसमस पर गिफ्ट्स बांटते-बांटते। नए संता आ नहीं रहे। जो हैं भी उनमें उन संता जैसे गुण नहीं। वैसे भी संता चाहे घर-घर जाकर गिफ्टस बांटे या मोबाइल-इंटरनेट पर बच्चों के प्रति उसका स्नेह या प्यार भला कहां कम होने वाला है। संता क्लॉज और बच्चों का संग-साथ तो जन्म-जन्मांतर का है।

कुछ भी कहिए, डिजिटल होते संता मस्त लगते हैं। भिन्न-भिन्न रूप-रंगों में देखने को मिलते हैं। कभी डिजिटली हंसाते हैं तो कभी लाइफ का बहुत बड़ा मंत्रा हमारे मानस-पटल पर छोड़ जाते हैं। न केवल बच्चे बल्कि बड़े भी उन्हें उत्ता ही एंजॉव्य करते हैं। इसीलिए तो संता क्लॉज हर किसी का प्यारा-दुलारा होता है।

इस तेजी से डिजिटल होते समय में डिजिटल संता के डिजिटल-गिफ्टस हमारे लिए अलग ही आकर्षण का केंद्र होंगे। हां, थोड़ा गिफ्टस का स्वरूप जरूर बदल जाएगा पर उनमें छिपी भावनाएं बिल्कुल वैसी ही रहेंगी।

तो बच्चों के साथ-साथ पूरी दुनिया को अपने डिजिटल संता के डिजिटल गिफ्टस का आनंद लेने दें।


हैप्पी मैरी क्रिसमस।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

सर्दी और मफलर

मेरे मफलर को अक्सर मुझसे यही शिकायत रहती है कि मैं उस पर कभी कुछ नहीं लिखता। जबकि रजाई पर हर वक्त कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूं। रजाई पर मैं अब तक इत्ता लिख चुका हूं कि एकाध किताब आराम से तैयार हो जाए। लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि केवल रजाई ही मेरी ‘प्रिय’ है। मफलर भी मुझे उत्ता ही प्रिय है, जित्ता रजाई। बल्कि कहना चाहिए- अगर रजाई और मफलर न होते तो मैं व्यंग्य के अखाड़े में- इत्ते तगड़े पहलवानों के बीच- उतर ही न पाता।

बहरहाल, आज चर्चा-ए-फोकस रजाई पर न रहकर मफलर पर केंद्रित रहेगा। ताकि मेरा मफलर अपने भीतर किसी भी प्रकार का ‘इनफिरियोरटी कॉप्लेक्स’ न लाने पाए।

यों हर एक की लाइफ में कोई न कोई चीज महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। जैसे- केजरीवालजी के जीवन में मोदीजी के खिलाफ ‘टि्वटरबाजी’ और पूनम पांडेजी के जीवन में ‘बिकनी-प्रदर्शन’। ठीक ऐसे ही मेरे जीवन एवं व्यवहार में मफलर खास जगह रखता है। न.. न.. ऐसा कतई नहीं है कि मफलर की याद मुझे सिर्फ सर्दियों में ही आती है, बता दूं, मैं इससे रिश्ता भीषण गर्मियों में भी ऐसे ही बनाके रखता हूं। मेरा मफलर मल्टीपरपरज है, सर्दियों में गर्मी का अहसास, गर्मियों में ठंडी राहत देता है।

मुझे खूब ध्यान है, मैंने अपना पहला व्यंग्य मफलर और रजाई के साथ जुगलबंदी साधकर ही लिखा था। व्यंग्य के अखाड़े में कूदे मुझे 10-12 साल भले ही हो चुके हों मगर मैंने आज तलक अपनी रजाई और मफलर को खुद से जुदा नहीं किया। साये की मानिंद दोनों मेरे साथ रहते हैं। मफलर का तो आलम यह है कि मेरी सर्दियों की सुबह और रात मफलर की सरपरस्ती में ही गुजरती है। हालांकि कई दफा पत्नी ने भी मेरे मफलर-प्रेम पर विकट एतराज जताया है। पर उसको मैंने साफ बोल दिया- दुनियादारी एक तरफ, मफलर के प्रति अनुराग एक तरफ। इसमें कोई समझौता नहीं।

मुझे यह देखकर अच्छा लगता है कि आज के टोपी-वादी युग में लोगों ने मफलर के प्रति अपने ‘स्नेह’ को कम नहीं किया है। तरह-तरह के डिजाइनर मफलरों को फैशन का हिस्सा बना लिया है। जैसे सालभर में सर्दी वापसी करती है ऐसे ही मफलर भी। मफलर की वापसी सबसे सुखद अनुभव देती है सर्दियों में। केजरीवालजी ने तो मफलर पहनते-पहनते दिल्ली वालों को टोपी ही पहना दी। उन्होंने तो मफलर और टोपी दोनों को एक साथ नुकसान पहुंचाया।

किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरे तईं मफलर का महत्त्व हमेशा उत्ता रहेगा जित्ता कृश्न चंदर के लेखन में ‘गधे की वापसी’ और ‘एक गधे की आत्मकथा’ का। किश्न चंदर को पढ़के ही जानी थी पहली दफा ‘गधे की महत्ता’। मैं किश्न चंदर के गधे और अपने मफलर के बीच अद्भूत वैचारिक, व्यवहारिक एवं आत्मीय कॉम्बिनेशन देखता हूं।

मेरा प्रिय मफलर मुझे निरंतर ऊर्जा देता रहा है। हालांकि वक्त के साथ उसके रंग में थोड़ा फीकापन जरूर आया है पर गरमाहट बरकरार है। यह गरमाहट जित्ती मेरे साथ उसके रिश्ते की है, उत्ती ही उसकी मेरे प्रति वफादारी की भी। दुनिया या परिवार वाले चाहे जो कहते रहें लेकिन मैं मेरे मफलर का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। दिमाग में ढेरों टाइप के वन-लाइनर टाइप आइडियाज मफलर पहनके ही तो आते हैं मुझे। सच्ची।

उम्मीद करता हूं, मेरे इस लेख को पढ़ने के बाद मफलर ‘मेरे लिए कुछ नहीं लिखते…’ टाइप अपनी ‘शिकायत’ से बाहर आ चुका होगा। अपने सारे गीले-शिकवे मिटा चुका होगा।

हम तीनों रजाई, मफलर और मेरे बीच फिर से वही ‘जुगलबंदी’ बनेगी, जो अब तलक बनती चली आई है। आमीन।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

लुढ़कते रुपये को संभालिए हुजूर

लुढ़कने की स्वतंत्रता बेपेंदी के लोटे के पास पूरी रहती है। अपनी इच्छा एवं सुविधानुसार वो कहीं भी, किधर भी लुढ़क सकता है। उसके लुढ़कने पर न धरती फटती है न आसमान पर काले बादल छाते हैं। यों भी, लुढ़कना जिनकी नीयत में शामिल होता है वे अपनी ‘इज्जत’ की परवाह कभी नहीं किया करते।

किंतु यहां मसला जरा दूसरा है। यह लुढ़काहट किसी बेपेंदी के लोटे से नहीं, रुपये से जुड़ी है। रुपये का लुढ़कना न हमारी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भला है न सरकार की। यह दीगर बात है, रुपया जब भी, जिन भी हालातों में लुढ़का है, देश में ‘तूफान’ ही लेकर आया है। इस अप्रत्याशित तूफान में न जाने कित्ते ही उड़ व उजड़ लिए हैं। निशान यहां-वहां अब भी बाकी हैं।

पिछली सरकार में तो रुपया गिरा ही था, इस सरकार में भी खूब गिर रहा है। डॉलर रुपये के सिर पर सवार होकर ‘भरतनाट्यम’ कर रहा है। चूहे-बिल्ली की दौड़ में, अफसोस, बिल्ली आगे निकल गई है। ताजुब्ब है, रुपये के लुढ़कने की भनक न सरकार के कानों तलक पहुंच पाई है न आरबीई गर्वनर के। दोनों ही नोटबंदी को प्रसांगिक बनाने में इत्ता मशगूल हैं कि रुपया की तरफ से मुंह फेर लिया है। मानो- रुपया किसी मोहल्ले का आवारा मजनूं टाइप हो!

रुपये के स्वभाव से मैं ब-खूबी वाकिफ हूं। रुपया हर हालात में ‘खामोश’ ही रहता है। सेंसेक्स की मानिंद ज्यादा उछल-कूद नहीं किया करता। रुपये को अगर चोट लगती है तो बिना आह-ऊह-आऊच किए सह लेता है। मगर सहने की भी एक सीमा होती है प्यारे। आजकल जिस बुरे दौर से रुपया गुजर रहा है (ऐ खुदा! किसी दुश्मन को भी ये दिन न देखने पड़ें) उसके संकेत खतरनाक हैं। रुपया न घरों में चैन ले पा रहा है, न तिजोरियों में, न लाइनों में, न बैंकों में, न खासो-आम की जेबों में और न अर्थव्यवस्था के तरकश में। डॉलर के मुकाबले हमारा रुपया बड़ा मायूस और मजबूर नजर आ रहा है।

दरअसल, सीन बड़ा गड़बड़ हो लिया है। नोटबंदी के कोलाहल में रुपये की पीड़ा कोई सुन-समझ ही नहीं पा रहा। नोटबंदी पर दोनों तरफ से ऐसी विकट तलवारें खींची हुई हैं कि समर्थन करो तो ‘देशभक्त’ और विरोध करो तो ‘देशद्रोही’। क्या नेता, क्या बुद्धिजीवि हर किसी के सुर पल-पल में बदल-बिखर रहे हैं। सबको जनता को हो रहीं परेशानियों की चिंता है किंतु बाहर निकलकर कोई नहीं आ रहा जनता के साथ लाइनों में लगने को। बड़ी खामोशी के साथ रुपया नोटबंदी की नौटंकियों को देख अपने हालात पर मातम मना रहा है। लेकिन कहे किससे? किसी के पास वक्त ही नहीं। वित्तमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सब नोटबंदी की जय-जयकारों में बिजी हैं।

यों, लुढ़कते रुपये की हालत मुझसे नहीं देखी जाती। देखी जाए भी कैसे? आखिर यह रुपया ही है, जो हमारी नींव को अपने मजबूत कंधों पर रोके हुआ है। इसीलिए हर वक्त दुआएं करता रहता हूं, हमारे रुपये के कंधे यों ही मजबूत रहें। साथ-साथ सरकार भी समझे कि लुढ़कते रुपये की अनदेखी ज्यादा ठीक नहीं। सनद रहे, पिछली सरकार को रुपये की अनदेखी इत्ती भारी पड़ी कि वो सत्ता से ही बाहर हो ली।

जैसे- सवा सौ करोड़ देशवासी लाइनों में नजर आ रहे हैं, ठीक ऐसे ही, रुपया भी मुझे लाइन में खड़ा दिखाई दे रहा है। डॉलर अमेरिका में बैठकर तालियां बजा रहा है। उसे रुपये के यों निरंतर पिछड़ते जाने पर बड़ी खुशी है। मगर डॉलर की यह खुशी हमारे तईं चिंता का सबब है। रुपया लुढ़कता है तो देश के भीतर-बाहर से बहुत कुछ लुढ़कता-बिखरता रहता है। बाकी जज्बाती बातें एक तरफ पर यह दुनिया कायम रुपये की बुनियाद पर ही है। रुपया पास है तो हर खुशी अपनी। रुपया पास नहीं तो निल्ल-बटा-सन्नाटा।

हे! देश के नीति-निर्धारकों, नोटबंदी के शोर-गुल से जब फुर्सत पाओ तो एक नजर रुपये की सेहत पर भी जरूर डाल लेना। कहीं ऐसा न हो, उधर का तो नोट बच जाए, इधर का रुपया लुढ़कर जमींदोज न हो जाए!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

समझ नहीं पा रहे, उन्हें क्या मानें...!

प्यारे, मैं थोड़ा ‘कनफ्यूज’ हो लिया हूं। या कहूं, उन्होंने मुझे कनफ्यूज होने के लिए मजबूर कर दिया है। एक मैं ही नहीं, जिसने भी उन्हें सुना सब के सब ‘कनफ्यूजड’ हो रखे हैं। आपस में एक-दूसरे से कभी फोन कर तो कभी फेसबुक-वाट्सएप पर पूछ रहे हैं, क्या तुमने उन्हें सुना कि उन्होंने क्या कहा? विकट कनफ्यूजन।

मुझे ठीक-ठाक याद पड़ता है, पहले उन्होंने खुद को ‘प्रधान-सेवक’ बतलाया था। जनता की सेवा करने की तरह-तरह की कसमें खाईं थीं। खुल्ला कहा था- ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा।‘ छप्पन इंच का सीना चाहिए बोल्ड टाइप निर्णय लेने के लिए। तब जनता ने उनके आत्मविश्वास पर जोर-जोर से तालियां बजाईं थीं। अरे, किसी और को क्या कहूं, उनके छप्पन इंची सीने की बात सुनकर खुद मेरा सीना साढ़े सत्तावन इंची हो लिया था। उनके लहजे में कंप्लीट प्रधान-सेवक टाइप अदा दिख रही थी। लोग गद-गद हुए जा रहे थे। साथ-साथ प्रधान-सेवक अपने परिधानों के कारण भी देश से लेकर विदेश तक में तमाम सुर्खियां बटोर रहे थे।

चलिए, देश ने उन्हें प्रधान-सेवक स्वीकार किया। फिर एक दिन अचानक से उन्होंने खुद को ‘चौकीदार’ घोषित कर दिया। एकदम चुस्त-दुरुस्त चौकीदार। चौबीस घंटे देश के अंदर-बाहर पैनी निगाहें रखने वाला। दुश्मन को ललकार कर तुरंत ‘भिगी बिल्ली’ बना देने वाला। देश व जनता के भीतर एक बार फिर से आत्मविश्वास जागा कि उन्हें अब मजबूत चौकीदार भी मिल गया है। जनता फिर से खूब तालियां बजा-बजाकर अपने चौकीदार का उत्साह बढ़ाने लगी। एक पल को लगा कि दुखियारों के दुख अब ज्यादा दिनों तलक टिके न रह सकेंगे। जो काम 70 सालों में न हुए अब चुटकियों में हो जाएंगे।

हालांकि चौकीदार ने- देश-जनता के प्रति- अपने कामों को करने में कोई कसर न छोड़ी। वो तो अब भी जारी है। किंतु इस बीच भक्ति का ऐसा दौर शुरू हुआ कि लोगों की ‘देशभक्ति’ पर ही तरह-तरह के ‘सवाल’ उठाए जाने लगे। परिभाषा कुछ यों बन गई- जो तारीफ करे वो ‘भक्त’। जो असहमति जतलाए वो ‘अ-भक्त’। दबी-ढकी जुबान में चौकीदार ने भी भक्तों, अ-भक्तों से ये सब न करने की अपील की पर मानने वाले भला कहां माने हैं। खैर, चौकीदार अपने काम में लगा रहा। कभी देश में तो कभी विदेश में।

काफी दिनों तक- प्रधान-सेवक और चौकीदार की- प्रतीकात्मकता का सीन यों ही चलता रहा। कि अभी हाल अचानक से उन्होंने खुद को ‘फकीर’ घोषित कर डाला। मामूली-सा झोला लेकर चलने वाला फकीर। जनता फिर से हैरान-परेशान कि उन्हें प्रधान-सेवक माने या चौकीदार या फकीर? फकीर का जुमला ऐसा चला कि क्या सोशल मीडिया, क्या नुक्कड़-मोहल्ला हर जगह वायरल हो लिया। हर बंदा अपने ट्वीट या फेसबुक पोस्ट में पूछता हुआ मिला- अगर ये फकीर हैं तो वो प्रधान-सेवक और चौकीदार कौन थे? विकट टाइप कनफ्यूजन।

इस बीच फकीर ने चेतावनी दे डाली- काला धन रखने वालो को कि वो होश में आ जाएं। शालीनता से 50-50 का ऑप्शन चुन, काले को सफेद बना लें। यह सरकार गरीबों की है। गरीब को ही समर्पित है। हां, थोड़ी परेशानी है, चिंता की कोई बात नहीं, कुछ दिनों में दूर हो जाएगी। मुझ पर विश्वास रखें।

बाकी सब तो ठीक है लेकिन मेरा कनफ्यूजन ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा। बार-बार खुद से सवाल करने लग जाता हूं कि आखिर मैं उन्हें क्या मानूं? कल को अगर मेरी बेटी ने पूछ लिया कि पापा, वो प्रधान-सेवक हैं या चौकीदार या फकीर? बताइए, मैं उसको क्या उत्तर दूंगा। साहेब विकट ऊहापोह में डाल दिया आपने हमें। उप-नामों की ऐसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है कि समझ नहीं पा रहे- आपको क्या मानें, क्या न मानें।

बुधवार, 30 नवंबर 2016

आइए, कैशलेस हुआ जाए

सरकार तो अब कैशलेस होने की बात कह रही है, अरे, मैं तो बचपन से कैशलेस हूं। जैसे बचपन में जेब में कुछ नहीं हुआ करता था, सीन आज भी कुछ ऐसा ही है। तब पापा से मिलने वाले 10 पैसे में ‘जन्नत’ दिखा करती थी, आज हजारों भी मिल जाएं तो ठन-ठन गोपाल। इसीलिए तो मैं बगैर रुपए-पैसे सुकून की जिंदगी काटने में अधिक विश्वास रखता हूं।

सच कहूं तो नोटबंदी से मेरी जेब और सेहत पर खास कोई फर्क नहीं पड़ा है। जरूरत भर के पैसे जेब में रखता हूं। जेब जब खाली हो जाती है, चुप-चुप लाइन में लगकर रुपए निकाल लेता हूं। न ज्यादा झगड़ा-टंटा, न सरकार की बुराई-भलाई। कौन-सा अपने अंतिम समय में रुपए-पैसे मुझे संग लेके जाने हैं। खाली आया था, खाली हाथ ही जाऊंगा। फिर इत्ती मारा-मारी किसलिए।

वैसे, कैशलेस होने के फायदे ही फायदे हैं। अगर बंदा मेरी तरह कैशलेस है तो सोने पे सुहागा। गौरतलब है, नोटबंदी के इस मौसम में एक भी बंदा न मुझसे नोट बदलने आया है, न उधार-छुट्टा मांगने। यहां तक कि पत्नी भी अब रुपए-पैसे की बात नहीं करती। बल्कि जित्ते रुपए उसने जोड़ रखे थे, एक दिन सब के सब निकालकर मेरे सामने रख दिए और बोली- जाके इन्हें अपने खाते में डाल आओ। अब ये मेरे किसी काम के नहीं। मैं कैशलेस ही भली।

और तो और मेरे वो दोस्त भी कैशलेस हो लिए हैं तो रात-दिन अपने रुपए-पैसे दम मेरे सामने भरा करते थे। अब सरे-राह मिलते हैं तो नजरें छुपा जाते हैं। इत्ता पैसा ठिकाने कहां लगाएं? सरकार ने नोटबंदी करके मालदारों की नाक में इत्ती मोटी नकेल फंसा दी है कि उनसे न निकाले बन रहा है न हिलगाए। बेचारे सब के सब- कैश होने के बाद भी- कैशलेस हो गए हैं।

मुझे इस बात की बेहद राहत है कि मैं पहले की तरह अब भी अपने मोहल्ले में सिर उठाकर चल रहा हूं। जो लोग कभी मेरे कैशलेस होने का खुलेआम मजाक उड़ाया करते थे, आज बिंदास सलाम ठोकते हैं। अमां, जिंदगी में ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनसे ‘मोह’ पाला जा सकता है मगर कैश से तौबा-तौबा। अंटी में जित्ते नोट हों, हाथ-पैर भी उत्ते ही फैलाने चाहिए।

हां, लोगों को हो रहीं तकलीफों से इंकार नहीं मगर इस नोटबंदी ने प्रत्येक बंदे के भीतर कम में गुजारा करने की थोड़ी-बहुत आदत तो डाल ही दी। पहले जेब नोटों से भरी रहती थी, अब या तो कागजों से भरी होती या डेबिड-क्रेडिट कार्ड से। अब तो हर कोई बेताब-सा दिखता है कैशलेस हो जाने को। अखबारों-टीवी चैनलों पर तमाम विज्ञापन आ रहे हैं, कैशलेस होने की आदत डालिए। यहां तक कि सरकार का जोर भी कैशेलेस लेन-देन पर ही है।

आम नागरिक के भीतर अगर कैशलेस होने की व्यवाहारिता आ गई तो बेचारे चोरों का धंधा जरूर मंदा हो लेगा। फिर उन्हें भी कोई ऐसा जरिया खोजना पड़ेगा, जहां चोरी कैशलेस हो। चलो, हम सब के बीच कुछ तो बदलेगा। बदलने में ही भलाई है प्यारे।

कैशलेस जिंदगी जीके तो देखिए, कसम से, जन्नत से भी बढ़कर सुकून मिलेगा। साथ-साथ पैंट की जेबों को भी आराम मिलेगा। न वे जल्दी फटा करेंगी, न कटा।

तो आइए कैशलेस हुआ जाए।

रविवार, 20 नवंबर 2016

सोनम गुप्ता बेवफा (नहीं) है

प्रिय आशिको,
मैं सोनम गुप्ता। ओह! मुझको तो अपना नाम बतलाने की जरूरत ही नहीं। मैं तो सोशल मीडिया पर आजकल सोनम गुप्ता बेवफा है के संबोधन से जबरदस्त ‘ट्रेंड’ कर ही रही हूं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। ट्रेंड करवाने के लिए भाई लोग कुछ भी खोज या किसी को भी पकड़ लेते हैं। इस दफा मैं ही सही। खैर, कोई गम नहीं।

नोटबंदी के बाद जिस तरह से मेरे बेवफा होने के चर्चे खासो-आम हुए हैं- आपकी कसम- मुझे बहुत मजा आ रहा है। किस्म-किस्म के नोटों पर जब मैंने सोनम गुप्ता बेवफा है लिखा देखा, मेरा दिल तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। रातभर में मैं इत्ती ‘फेमस’हो गई, इत्ती तो शायद मैं ‘मिस वर्ल्ड’बन जाने के बाद भी नहीं होती! अब तो चौबीसों घंटे मेरे भीतर ‘सेलिब्रिटी’वाली फीलिंग छाई रहती है। आपका तहे-दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया।

लेकिन यहां मैं एक बात साफ कर दूं कि मैं बेवफा कतई नहीं हूं। हां, यह ठीक है कि मैं अपने बेवफा कहे या बनाए जाने को सोशल मीडिया पर ‘एन्जॉय’ जरूर कर रही हूं लेकिन बेवफाई से मेरा दूर-दूर तलक कोई नाता-वास्ता नहीं। अरे, बेवफा तो वो होगा न जो प्यार में धोखा देगा। प्यार में विश्वास को तार-तार करेगा। प्यार को समझने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु मैंने तो कभी- न निजी जीवन में, न सोशल मीडिया पर- किसी से प्यार किया ही नहीं। फिर बताइए, मैं बेवफा कैसे हो गई?

अगर 10, 100, 500, 2000 के नोटों या डॉलर पर लिख देने भर से ही मैं बेवफा घोषित हो जाती हूं तो ऐसी बेवफाई पर मुझे ‘हंसी’ ही आ सकती है। न.. न.. मेरे लिए यह रोने या खीझने का विषय बिल्कुल भी नहीं है। दुनिया-समाज में किस्म-किस्म के लोग होते हैं, जो चीजों या व्यक्तियों को केवल ‘एन्जॉयमेंट’की नजरों से ही देखते-परखते हैं। ऐसे महानुभावों पर ‘रिएक्ट’ करना खुद को भरी भीड़ में ‘बौना’साबित करने जैसा है। और, बौना मैं किसी कीमत पर होना नहीं चाहती।

हालांकि मेरी बेवफाई के बाबत मुझसे मेरी फ्रेंड्स और कॉलेज में कई बार पूछा गया। मैंने सबको मुस्कुराते हुए एक ही जवाब दिया- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।

फिर भी अगर आपको लगता है कि सोनम गुप्ता बेवफा है तो ये ही सही। सोशल मीडिया पर बेवफा होने जाने मात्र से न मेरा हीमोग्लोबिन, न मेरी प्लेटलेटस घट जानी हैं। यहां तो हर मोड़ पर कुछ न कुछ ‘ट्रौल’या ‘ट्रेंड’करता ही रहता है। लोग भी न अपनी अंदरूनी संतुष्टि के लिए क्या-क्या नहीं करते। आज सोनम गुप्ता है, कल को कोई और होगी।

सोशल मीडिया की कारिस्तानियों को अगर आप ‘दिल’ से लगा लेंगे तो बहुत मुश्किल होगी। यहां चीजों को या तो ‘एग्नोर’ कीजिए या ‘एन्जॉय’। जैसे मैं सोनम गुप्ता बेवफा है को खूब एन्जॉय कर रही हूं।

बुधवार, 16 नवंबर 2016

नोटबंदी की मार चोर हुए बेरोजगार

मेरे मोहल्ले के चोर लगभग ‘कंगाल’ होने की कगार पर हैं। नोटबंदी के कारण सबसे अधिक ग्रह उन्हीं के खराब हुए हैं। किसी को लूटने या कहीं चोरी करते वक्त इस बात की कोई ‘गारंटी’ नहीं रहती- अगले के पास ‘छुट्टे’ होंगे ही। यही वजह है, मोहल्ले में चोरी-चपाटी, छिना-छपट्टी की वारदातों में विकट कमी आई है। पुलिस भी राहत की सांस ले रही है, चलो- यहां-वहां की भाग-दौड़ बची।

लेकिन मेरा मन चोरों की इस हालत को देखकर खासा व्यथित है। हालांकि मैं कभी चोरा-चारी के पक्ष में नहीं रहा किंतु मेरा मानना है, रोजी-रोटी सबकी चलती रहती चाहिए। रोजी-रोटी चलेगी तब ही जब दुकान चलेगी। मगर यहां तो दुकान ही बंदी के समीप है। आलम यह है कि लोगों ने दुकान के अंदर तो छोड़िए उसके आस-पास तक से गुजरना बंद कर दिया है। अब बताइए, ऐसे में क्या चोर क्या ज्वैलर क्या कमाएगा, क्या खाएगा, क्या पहनेगा, क्या खर्च करेगा।

चलो हम-आप तो अपना दर्द किसी न किसी तरह मंत्री, अधिकारी या प्रधानमंत्री के सामने रख भी सकते हैं मगर बेचारे चोर तो अपनी तकलीफ किसी से कह भी नहीं सकते। वे तो यह भी कहने के नहीं रहे- नोटबंदी ने हमारे चोरी के रोजगार पर लात मार दी है अतः जल्दी से जल्दी हालात सामान्य किए जाएं। चोर को तो हमेशा अपने पकड़े जाने का खतरा रहता है न। चोरी-चकारी ही उसकी आय का एकमात्र माध्यम है, मोदीजी ने आजकल उस पर भी ताला जड़ दिया है।

चोरों की तकलीफ तो खैर समझ आती है लेकिन देश के कुछ नेता इत्ते ‘बौखलाए’ हुए से क्यों हैं? दिल्ली के मुख्यमंत्री से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पापाजी तक सब के सब नोटबंदी पर इत्ता नाराज हैं कि काटो तो खून नहीं। हमारे (सरजी) दिल्ली के मुख्यमंत्री तो मोदीजी को चौबीस घंटे का समय दे चुके हैं नोटबंदी पर पुनः विचार करने का। उनसे लाइन में खड़े आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही। मगर वे यह भी नहीं कह पा रहे कि भईया, तुम थोड़ी देर साइड में बैठकर आराम करो। थोड़ा पानी-शानी, चाय-शाय पी लो तब तक मैं तुम्हारी जगह लाइन में खड़ा हो लेता हूं। मगर नेता लोग तो अपने-अपने चेहरों को चमकाने कभी चार हजार के नोट बदलने तो कभी चेतावनी देने के बहाने चैनलों के कैमरों के आगे आनकर खड़े हो जाते हैं।

खैर, नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक हित हैं। पर बेचारे चोरों का क्या? वो तो ‘मुफ्त’ में ही निपट लिए। न कहीं चोरी करने से रहे, न किसी को लूटने से। बाकी का बचा दिन लाइन में खड़े होने में बीत जाता है। मुसीबत घणी है पर कहें किससे।

फिलहाल, मोहल्ले के एकाध चोर को मैंने समझाया कि लल्ला अपना चोरी-चकारी का पेशा छोड़ अब कोई अच्छा-सा काम-धंधा ढूंढ़ लो। उसी में तुम्हारी, तुम्हारे परिवार की भलाई है। मोदीजी का कोई भरोसा नहीं नोटबंदी के बाद आगे कौन-सी सख्त स्कीम ले आएं।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

जो जीता वही सिकंदर

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति होना मुबारक। बेशक उनसे सहमति रखिए या असहमति मुबारकवाद देना तो बनता है। यों भी, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव छोले-भटूरे खाते हुए तो नहीं न जीता है। अगले ने पूरी जान लगा दी इत्ता बड़ा चुनाव जीतने में। समाज और दुनिया में तूती केवल ‘जो जीता वही सिकंदर’ बनने वाले की ही बोलती है।

जानता हूं, डोनाल्ड ट्रंप न केवल कुछ अमेरिकनस बल्कि कुछ भारतीयों की भी पसंद नहीं हैं। वे उनके चरित्र और (खासकर भाषा) से बड़ी नफरत करते हैं। तो क्या...। यों तो दाग चांद में भी है फिर भी वो लोगों के दिलों के बेहद करीब है। प्रेमियों-प्रेमिकाओं का तो चांद फेवरिट है। हां यह सही है कि डोनाल्ड ट्रंप चांद नहीं हैं पर सितारे (स्टार) तो हैं ही।

सबसे अधिक हैरान मैं उन लोगों की राय जानकर हूं, जिन्हें सब्जी मंडी में पालक के भाव का पता नहीं और ट्रंप पर ज्ञान ऐसे पेल रहे हैं मानो बचपन में उन्होंने उन्हें गोद खिलाया हो। चलिए यहां की जाने दीजिए, खुद अमेरिकनस उनके बारे में कित्ता जानते हैं। पूरजोर विरोध और आलोचनाओं के बाद भी ट्रंप ने बाजी मार ही ली।

राय आप किसी के बारे में कैसी भी बनाने को स्वतंत्र हैं। जैसे- हमारे यहां 500-1000 के नोटों के बैन होने पर लोग सरकार और प्रधानमंत्री पर बना रहे हैं। कुछ खुश हैं तो कुछ इत्ते दुखी कि माथे पर दो इंच चौड़े बल डाल लिए हैं। न जाने देश में ऐसा क्या अनोखा-अजूबा टाइप घट गया कि बर्दाशत ही नहीं हो पा रहा।

वैसे, कायदा तो यही कहता है कि जो है उसे स्वीकार कीजिए। अगर स्वीकार नहीं कर सकते तो एक कोने या कोप भवन में बैठकर कोसा-कासी करते रहिए। लेकिन आपकी कोसाहट को यहां सुनने वाला कोई नहीं। यह दुनिया अपनी गति चलती है। नए को आत्मसात और पुराने को बीच राह में छोड़ देती है।

ओबामा अब अमेरिका के लिए इतिहास हैं। डोनाल्ड ट्रंप ही अब उनका भविष्य और वर्तमान हैं। यही बात यहां पुराने 500-1000 और नए 500-2000 के नोटों पर लागू होती है। बदलाव ऐसे ही आते हैं ‘अचानक’। जिंदगी का असली लुत्फ इसी ‘अचानक’ में हैं। चाहो तो मानो या फिर रौंदू बने रोते रहो। किसे परवाह।

यहां लोग केवल सिकंदर को पहचानते हैं। जो हार गया समझो मर गया। बाकी बातें हैं, बातों का क्या।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

500-1000 के नोट की उलझन

विकट उलझन में हूं। कुछ समझ नहीं पा रहा क्या करूं, क्या करूं। कभी दिल करता है, घर-शहर छोड़कर ऐसी जगह चला जाऊं जहां मुझे 500-1000 के नोट सपने में भी आएं। आलम यह है कि मैं 500-1000 के नोट देखकर हीडर’ जाता हूं।

नहीं.. नहीं.. ऐसा कतई नहीं है कि मेरे कनेजाली करेंसी’ है। अरे, मैं तो मिखारियों को दिए 500-1000 के नोट बदल-बदलकर परेशान हूं। चौंकिए मत, यह सच है। अक्सर ही ऐसा होता था, कभी राह चलते कोई मिखारी कुछ मांग लेता तो मैं झट्ट से 500-1000 का नोट निकालकर उसे दे देता। मेरे मोहल्ले के मिखारी- जब भी उन्हें जरूरत होती- मुझसे 500-1000 का नोट मांगकर ले जाया करते थे। यही वजह थी कि मैं केवल अपने मोहल्ले बल्कि पड़ोस के इलाकों में भी अच्छा-खासा फेमस था। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि दूसरे शहरों के मिखारी भी मुझसे भीख मांगने जाया करते थे। लेकिन निराश में किसी को नहीं किया करता था। आखिर इत्ता कमा मैं किसके लिए रहा हूं।

यों भी, भिखारियों को नोट देने में मुझे दिली-तसल्ली मिला करती थी। किसी मजबूर के काम आना कोई गुनाह हो नहीं। इसीलिए मैं जेब में कभी छोटे नोट रखता ही नहीं था। हमेशा बड़े (500-1000) के नोट ही रहते थे। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि छोटे नोट रखने से व्यक्ति के भीतरहीन भावना’ जाती है। और मैं ऐसा कभी नहीं चाहूंगा कि रुपए-पैसे को लेकर मेरे अंदर हीन भावना आए।

सबकुछ अच्छा खासा चल रहा था। लेकिन बीती रात मोदीजी द्वारा 500-1000 के नोट बंद होने का एलान होते ही मोहल्ले और आस-पड़ोस के मिखारियों का जमघट मेरे दरवाजे पर लगा हुआ है। हर मिखारी यह चाहता है कि मैं उसका 500-1000 का नोट चेंज कर छोटे नोट उसे दे दूं। जबकि कित्ती ही बार मैं उनको समझा चुका हूं कि मैं बैंक नहीं हूं। नोट चेंज करने के लिए बैंक जाओ। पर वे कुछ भी सुनने-समझने को तैयार नहीं। बस एक ही जिद्द पकड़े हुए हैं, चूंकि नोट आपने दिए थे, अतः बदलोगे भी आप ही।

अच्छी-खासी मुसीबत में फंस गया हूं। घर के बाहर जा सकता हूं, घर के अंदर रह सकता हूं। घर के अंदर रहता हूं तो बीवी ताने मारती है कि तुमने इत्ता रुपया मिखारियों में दान कर दिया और मैंने जब मांगा तो साफ मना कर दिया कि अभी नहीं है। ससुरा, मदद करना भी जी का जंजाल बन सकता है आज महसूस हो रहा है।

फिलहाल, सारे मिखारियों ने 500-1000 के नोट मेरे दरवाजे पर फेंक दिए हैं और चेतावनी दे गए हैं कि दो दिन के भीतर मैं उन्हें छोटे दे दूं। मैं बैंक हूं रिजर्व बैंक समझ नहीं पा रहा इत्ते नोट कहां खपाऊं। अजीब उलझन में डाल दिया मोदीजी आपने तो मुझे।

500-1000 की ऐसी हड्डी गले में आन फंसी है उगलते बन पा रही है निगलते।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

खामोश! आपातकाल आने को है

इस वक्त घर में दुबक के बैठे रहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई चारा नहीं। विद्रोह और विरोध करना मुझे आता नहीं। क्रांति मैं कर नहीं पाऊंगा। क्रांतिकारी बनने का मुझे शौक नहीं। हां, बहुत से बहुत मैं यह कर सकता हूं कि अपनी फेसबुक वॉल पर सरकार या बुद्धिजीवियों से सहमति-असहमति जताते हुए कुछ लिख भर दूं।

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, किसी ने मुझे बताया कि आपातकाल आने को है! कोई ऐसा-वैसा नहीं बड़ा भयंकर किस्म का आपातकाल आएगा। सच बोलूं- आपातकाल का नाम सुनते ही मेरी ‘घिघ्घी’ बंधना शुरू हो गई है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि क्या करूं, क्या न करूं। आखिर आपातकाल है कोई मजाक नहीं। सुना है, आपातकाल में लिखने से लेकर बोलने तक पर विकट टाइप का बैन लग जाता है। जिसने सरकार या नेता के खिलाफ जरा भी हिमाकत की, उसे तुरंत जेल में हवा खाने भेज दिया जाता है। पिछले आपातकाल में बहुत से सूरमाओं की पाजामे ढिले हुए थे। इससे भला कौन इंकार करेगा।

मैं इस चिंता में घुला-पिघला जा रहा हूं अगर आपातकाल आ गया तो मेरे लिखने (बोलने में मैं ज्यादा विश्वास नहीं करता) का क्या होगा? लेखन से जो ठीक-ठाक कमाई हो रही है, वो कैसे नियमित रह पाएगी? हालांकि मैं विद्रोही टाइप का लेखन नहीं किया करता फिर भी सरकार के दिमाग का क्या भरोसा कब में पलटी मार जाए। यों भी, सरकार ने अभी एक अति-क्रांतिकारी चैनल को चौबीस घंटे के लिए बैन किया ही है।

इस बैन के खिलाफ उठ रहीं ज्यादातर आवाजें वे हैं, जो वर्तमान सरकार के साथ ‘एडजस्टमेंट’ नहीं कर पा रहीं। बात-बात में उन्हें विचार और लोकतंत्र खतरे में जान पड़ता है। इस समय आपातकाल का हल्ला भी सबसे अधिक इन्हीं अति-क्रांतिकारियों ने मचाया हुआ है। मचाने दीजिए न, किसे परवाह है।

मुझे न एक पैसे का लेना अति-क्रांतिकारियों से है न देना बैन या सरकार से। मेरी इच्छा केवल इत्ती-सी है कि मेरे लेखन की गाड़ी बिन बाधा चलती रहे। एडजस्टमेंट तो मैं हर कहीं कर सकता हूं। बेवजह बुद्धिजीवि या प्रगतिशील बनने का मुझे शौक नहीं। जिन्हें सरकार या व्यवस्था से लड़ने-भिड़ने की बीमारी है, वे अपनी दुकानें सजाए रखें।


खैर, आपताकाल को जब आना होगा आ जाएगा। मुझे ज्यादा डर लगेगा तो मैं अपनी रजाई में दुबक जाऊंगा। यही ठीक भी रहेगा। कोशिश मेरी तब भी यही रहेगी कि अपनी लेखन की दुकान यों ही चलती रहे। बाकी तब की तब देखी जाएगी।

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

सब फेक हैं, एक आप ही नेक हैं

चूंकि ऐसा कहना बुद्धिजीवियों के बस का नहीं, नहीं तो वे देश की आजादी को ही ‘फेक’ बता देते। वे बुद्धिजीवि हैं कुछ भी कह-बोल सकने का ‘साहस’ रखते हैं इसीलिए उन्होंने सिमी आतंकियों के एन्काउंटर को ठां से ‘फेक’ बतला दिया।

अक्सर मैं सोचता हूं, हमारे देश के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों को ‘ज्ञान’ किस ‘सोर्स’ से प्राप्त होता है। देखिए न, इधर घटना घटती है उधर तुरंत उनकी प्रतिक्रिया आ जाती है कि फेक है, जांच होनी चाहिए, यह सरकार का सेट एजेंडा है आदि-इत्यादि। आजकल वैसे भी सरकार से उनका ‘छत्तीस का आंकडा’ चल रहा है तो हर बात, हर घटना, हर मुद्दे का विरोध तो बनता है न। अरे, उन्होंने तो पिछले दिनों हुए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की वैधता पर ही तमाम प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए थे।

ऐसा जान पड़ता है कि विरोध करने का कीड़ा देश के विपक्षियों-बुद्धिजीवियों के दिमाग में हरदम चहलकदमी करता रहता है। विरोध करते वक्त वे यह कतई नहीं देखते कि इससे देश के सम्मान को ठेस भी पहुंच सकती है। शायद इसीलिए देश उनके तईं बाद में, पहले विरोध, विरोध और विरोध है।

जब उनके दिलों-दिमाग में विरोध का इत्ता ही गुबार भरा पड़ा है तो फिर घर-परिवार के बीच कैसे ‘एडजस्ट’ कर पाते होंगे। जबकि घर का तो हर मसला उनकी निगाह के सामने से गुजरता होगा। मसलन- खाने का विरोध। कपड़ों का विरोध। नहाने-धोने का विरोध। आने-जाने का विरोध। नाते-रिश्तेदारों का विरोध। दाल में नमक के कम या ज्यादा होने का विरोध। आदि-इत्यादि। बेचारे घर वाले तो इन विरोधियों के कथित विरोध को सुनते-सुनते पक ही जाते होंगे न। हां (अपवादों को छोड़कर) जिनकी पत्नियां तेज-तररार होती होंगी, वे उनके फेक विरोध का जवाब ‘बेलन’ से ही देती होंगी।

चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं इसीलिए ऐसे लोगों को ‘बर्दाशत’ कर लेते हैं। यहां लिखने-बोलने की आजादी सबको मिली हुई है सो उन्हें सुन लेते हैं। कहीं किसी गैर-लोकतांत्रिक मुल्क में ये रहे होते तो पता चलता कि हर घटना को फेक ठहराना कित्ता भारी पड़ सकता है। पर हमें क्या, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।‘ अगर वे नहीं कहे-बोलेंगे तो बेचारे अंदर ही अंदर घुटते रहेंगे। यों भी, उनके कुछ भी कह या बोल देने से जो सच है वो बदल तो नहीं जाएगा न।

यही वजह है कि मैं फेक टाइप के बुद्धिजीवियों-विपक्षियों की संगत में आने से डरता हूं। हमेशा उनसे घणी दूरी बनाकर रहता हूं। इनका कोई भरोसा नहीं कब, किसे, कहां फेक ठहरा दें। या विरोध करने बैठ जाएं। आजकल कुछ अलग दिखने के वायरस ने देश के बुद्धिजीवियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।

चलिए। छोड़िए। बजाने दीजिए उन्हें फेक एन्काउंटर का ढोल। हमारे लिए तो यही राहत की बात है कि खूंखार आतंकियों को मार डाला गया है। बाकी बातें हैं बातों का क्या।

उनका प्रोफेशनल विरोधी होना

बात-बेबात विरोध करना उनकी ‘आदत’ नहीं अब ‘पेशा’ बन चुका है। उनका विरोध का यह पेशा आजकल टनाटन चल रहा है। गली-मोहल्ले या सभा-आयोजन में जब भी विरोध करने वाले की जरूरत पड़ती है, उन्हें बुला लिया जाता है। विरोध करने के बकायदा उन्हें पैसे मिलते हैं। यानी, वे ‘प्रोफेशनल-विरोधी’ हैं।

मुझे उनका प्रोफेशनल-विरोधी होना जरा भी अखरता नहीं। बल्कि इस ‘साहस’ के वास्ते मैं कई दफा उन्हें बधाईयां भी दे चुका हूं। मुझे ऐसे ही लोग पसंद हैं, जो अंदर और बाहर से एक जैसे रहते हैं। विरोध करना उनका पेशा है तो है। राजनीति में जब टिकट बांटना और काटना पेशा बन सकता है तो विरोध करना क्यों नहीं।

यों ही एक दिन मुझे वो सब्जी मंडी में मिल गए। हैलो-नमस्कार के बाद पांच-सात मिनट उनसे बातचीत भी हुई। मैंने उनसे पूछा- ‘यहां-वहां, इस-उस का विरोध करके आपको मिलता क्या है?’ उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘जी, पैसा। आजकल के जमाने में पैसा ही सबकुछ है। पैसा किसी की नौकरी करके भी कमाया जा सकता है और किसी का विरोध करके भी।‘ मैंने फिर से सवाल दागा- ‘ऐसा पैसा भला किस काम का जिसमें केवल विरोध ही निहित हो?’ पहले तो वे लंबी हंसी हंसे फिर बोले- ‘जनाब, शौकिया विरोधी होने से कहीं बेहतर है प्रोफेशनल विरोधी होना। मैं उन जैसे शौकिया विरोधियों टाइप नहीं जो केवल अपने ‘निजी हित’ के वास्ते किस के भी पाले में जाकर विरोध कर लेते हैं किंतु ऊपर से बड़े ‘लल्ला’ बने फिरते हैं। मैं शुद्ध प्रोफेशनल विरोधी हूं, आप मुझसे किसी भी पार्टी, नेता, विचारधारा, सिस्टम, कंट्री का विरोध करवा सकते हैं।‘

उनके इस खुले उत्तर के बाद अब कुछ बाकी नहीं रह गया था पूछना। अतः उनसे विदा लेते हुए मैं अपने, वे अपने रास्ते निकल लिए।

मगर हां प्रोफेशनल विरोध पर उनकी बात मुझे काफी जमी। बेशक विरोध हमारी मानसिकता में है किंतु उसका इस्तेमाल हम केवल अपने हित के वास्ते ही करते हैं। देख लीजिए न, आजकल जिस तरह से सरकार का विरोध बुद्धिजीवि और कथित प्रगतिशील मिलकर कर रहे हैं। आज उनकी निगाह में सब गड़बड़ हो रहा है मगर कल तक सब ठीक-ठाक था। विरोध करते-करते बेचारे इत्ते ‘दुबले’ हो गए हैं कि अब सेहत भी जवाब देने लगी है।

खैर मुझे क्या। मुझे तो उनका प्रोफेशनल विरोधी होना बेहद जंचा। मैं भी उनके पदचिन्हों पर चलने की सोच रहा हूं।

रविवार, 30 अक्तूबर 2016

पुरस्कार की व्यथा-कथा

मैं पुरस्कार हूं। मुझे बांटा-बंटावाया जाता है। मैं किसी के शो-केस की 'शोभा' बढ़ाता हूं तो किसी के साहित्यिक-सामाजिक सम्मान में बृद्धि करता हूं। मुझे हर किसी के द्वारा हाथों-हाथ लिया जाता है।

तिस पर भी मेरा 'दुखड़ा' यह है कि मुझे वक्त-बेवक्त 'ड्रम' की तरह 'बजाया' जाता रहता है। जिसे मैं मिलता हूं वो गा-गाकर मुझे बजाता है। जिसे मैं नहीं मिलता वो मुझे रो-रोकर बजाता है। जिसे मिलने वाला होता हूं- किंतु किसी कारणवश नहीं मिल पाता- वो मुझे गरिया-गरियाकर बजाता है। कुछ लोग मुझे लौटाकर अपनी वाह वाह की खातिर मुझे बजाते हैं। रही बात निर्णायक मंडल के सदस्यों की वे मुझे कित्ता और किस-किस तरह से बजाते हैं, इस एहसास को मैं महसूस करना भी नहीं चाहता।

मेरी जिंदगी बाहर से जित्ती सुनहरी और हरी-भरी आपको दिखती है, अंदर से यह उत्ती ही 'लफड़ों' भरी है। कभी-कभी तो इन लफड़ों को झेलते-झेलते मेरे फेफड़ें तक बोल जाते हैं। क्या करूं, झेलना पड़ता है। न झेलूं तो लोग कहेंगे पुरस्कार होकर नखरे दिखाता है। भला मेरे काहे के नखरे? सारे नखरे तो मुझे लेने, देने और ठुकराने वाले ही दिखला देते हैं।

अच्छा, पुरस्कार होकर मुझे ऐसा कभी लगा नहीं कि मैंने कोई बहुत बड़ा तीर मारा है। मेरा तरकश हमेशा खाली रहता है। तीर तो असल में वो लोग मारते हैं, जिन्हें मैं दिया-दिलवाया जाता हूं। विडंबना देखिए, मुझे ले लेने के बाद भी कुछ लोग कभी 'संतुष्ट' नहीं होते। हर वक्त हर किसी के सामने वे यही कहते-रोते पाए जाते हैं कि फलां पुरस्कार भी मुझे मिल जाता तो मेरे सम्मान में एक खिताब और जुड़ जाता। मानो- मैं कोई हार टाइप हूं कि एक मोती जड़ देने भर से उसकी सुंदरता बढ़ जाएगी।

साहित्य-राजनीति के सयानों ने मुझे दायरों में बांट रखा है। मेरा भी धर्म-जाति-संप्रदाय निर्धारित कर दिया है। मैंने ऐसे लोग भी खूब देखे हैं, जो अपने धर्म, अपनी जाति के लोगों को ही पुरस्कार देते-दिलवाते हैं।

बुरा न मानिएगा, मेरा सबसे अधिक 'नुकसान' किया है साहित्यिक बिरादरी वालों ने। अभी तलक कोई ऐसा साहित्यिक पुरस्कार न होगा, जो विवादों से परे रहा हो। हर साहित्यिक पुरस्कार पर कोई न कोई 'लफड़ा' जरूर होता है। लोगों को रचनाकार से इत्ती असहमतियां नहीं होतीं, जित्ती मुझसे होती हैं। जोड़-तोड़-जुगाड़ साहित्यिक बिरादरी वाले करें-करवाएं और गरियाया मुझे जाए। भला यह कहां की 'नैतिकता' है हुजूर?

देश हो चाहे विदेश मैं हमेशा हर साहित्यकार-लेखक के निशाने पर रहता हूं। कई साल पहले एक बड़े विदेशी साहित्यकार ने मुझे आलू की बोरी का गठ्ठर कह दिया था। बताइए, यह तो इज्जत है मेरी साहित्यकारों के बीच। फिर भी.. फिर भी.. मेरे वास्ते एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने को हर समय तैयार बैठे रहते हैं।

कभी-कभी तो मुझे लेखकों-साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों के ऊपर इत्ती हंसी, इत्ती हंसी आती है कि मन करता है अपनी हंसी का विडियो बनाकर इन सबको व्हाट्सएप कर दूं। ऐसे पढ़े-लिखे होने से क्या फायदा कि उस पुरस्कार की ही इज्जत न कर पाओ, जो पूरी दुनिया में तुम्हारी शान में चार-चांद लगा रहा है। तुमसे तो बे-पढ़े-लिखे ही अच्छे, जिन्हें न ढंग से पुरस्कार का पता होता है न साहित्य का।

वैसे मुझे (पुरस्कार) लेकर जित्ता रोया-राट हिंदी में मचता है, इत्ता अंगरेजी में नहीं। अंगरेजी साहित्य वाले एकदम मस्त रहते हैं। उनका जोर पुरस्कार से ज्यादा अपने लेखन पर रहता है। हिंदी की वनिस्बत वहां एक-दूसरे की टांग-खिंचाई भी कम है। मगर हिंदी लेखन के तो मसले ही निराले हैं। मुझे लेकर क्या कवि, क्या कहानीकार, क्या व्यंग्यकार, क्या समीक्षक, क्या आलोचक हर वक्त एक-दूसरे पर तोप ताने ही खड़े मिलते हैं। वैचारिक द्वंद्व यहां इस कदर हैं कि अच्छा-खासा बंदा भी पगला जाए।

देख रहा हूं आजकल कुछ कथित बुद्धिजीवि टाइप लोग एक कवियत्री की बोल्ड कविता पर घोषित हुए पुरस्कार के पीछे हाथ-पैर धोकर पड़ गए हैं। वे उस कविता तो कविता मान ही नहीं रहे। कह रहे हैं, कवियत्री ने कविता की भाषा को तोड़-फोड़के रख दिया है। अतः हम सब इस पुरस्कार के खिलाफ हैं।

अमां, जिन्हें होना है पुरस्कार या कवियत्री के खिलाफ हो जाएं इससे न फर्क मेरी सेहत पर कुछ पड़ने वाला न कवियत्री की। यह तो लोग हैं लोगों का काम है कहना।

मुझे तो अब आदत-सी पड़ गई है। कान खोलकर सुन लीजिए, मुझे गरियाकर आप मेरा नहीं अपना ही 'अहित' कर रहे हैं। मैं तो जैसा हूं हमेशा वैसा ही रहूंगा। शेष मर्जी आपकी।