शनिवार, 26 दिसंबर 2015

असहिष्णुता पर छिड़ा अजीबो-गरीब दंगल

डरे सिर्फ आमिर खान या उनकी पत्नी ही नहीं हैं, डर मैं भी गया हूं। और, इत्ता डर गया हूं कि सड़क चलते अगर कोई मुझसे कहीं का पता ही पूछने लगता है, तो 'घबराकर' बता नहीं पाता। मन में तुरंत यह 'डर' घर कर जाता है कि सही पता बताने के बावजूद अगला मुझे कहीं 'असहिष्णु' न समझ ले। असहिष्णुता के डर ने हमारे आस-पास ऐसा माहौल बना दिया है कि अब तो बाहर वालों की छोड़िए पत्नी की बात काट में ही डर लगता है। क्या पता कब पत्नी मुझे असहिष्णु घोषित कर गरिया दे!

असहिष्णुता पर छिड़ी तकरार दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। सड़क, चौराहे, दफ्तर, घर पर अब सामाजिक या परिवारिक मुद्दों पर बात कम असहिष्णुता पर बहस ज्यादा होती है। अब तो लोग फेसबुक, टि्वटर, वाह्ट्एप पर एक-दूसरे का हाल-चाल बाद में पूछते हैं, पहले असहिष्णुता के मुद्दे पर सामने वाले की 'राय' जानना चाहते हैं। अगले की राय अगर उनकी राय से मेल खाती है तो ठीक; नहीं तो दे गाली, दे गाली, दे गाली...।

यानी, असहमति का मतलब अब गालियां हो गई हैं। लोगों के बीच अपने नायकों के प्रति 'भक्तिभाव' जरूरत से ज्यादा ही बढ़ गया है। यही वजह है कि मैं किसी को भी किसी भी मुद्दे पर अपनी राय न देता हूं न उनकी राय लेता हूं। जो दिल में होता है, उसे लिखकर खुद को हल्का कर लेता हूं। आजकल का जमाना कुछ ऐसा ही है प्यारे- न किसी से हिलगो, न किसी को हिलगाओ। कानों में तेल डाले और आंखों पर पट्टी बांधे जो चल रहा है, यों ही चलते रहने दो।

डर के साथ-साथ असहिष्णुता अब 'मनोरंजन' या 'हिट' होने का सबब भी बनती जा रही है। जिनके कने कुछ नहीं है, वे असहिष्णुता पर ही बेतुके बयान दे-देकर मस्त फिरकी लेने में लगे हैं। टीवी चैनल वाले रात-दिन उन्हीं के बयानों पर डिबेट चला रहे हैं। डिबेट में भी खास कुछ होता नहीं। दो भिन्न पार्टियों के नेता आधा घंटे तक एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं। बेचारा दर्शक क्या करे, वो भी उनकी लड़ाई-भिड़ाई का असहिष्णुता के बहाने घर बैठे मनोरंजन करता रहता है। सड़क पर आनकर खुलकर बोल नहीं सकता। क्या पता कौन सी पार्टी या नेता उसे भी असहिष्णु घोषित कर दे।

पहले मैं रात में 'रंगीन सपने' आने से परेशान रहता था, अब मुझे 'असहिष्णुता' के सपने आते हैं। कल रात का सपना तो बहुत ही भयानक था। मैंने देखा कि पत्नी ने मुझे इस वजह से तलाक देने की घमकी दी है क्योंकि मैंने उसे आईफोन दिलवाने से मना कर दिया था। उसने तुरंत मुझे असहिष्णु पति कहते हुए तलाक देने की घमकी दे डाली। कल रात से मैं इत्ता डरा हुआ हूं कि आज का पूरा दिन 'तलाक के बाद मेरा क्या होगा' इसी सोच में बीत गया। हालांकि वो मात्र सपना ही था। पर पत्नी के मूड का क्या भरोसा कब सेंसेक्स की माफिक बदल जाए!

काबिल लोग हालांकि बार-बार यह कहकर 'सांत्वता' दे रहे हैं कि देश-समाज का माहौल जरा भी असहिष्णु नहीं है। यहां हर कोई 'आराम' से रह सकता है। हम एक 'सहिष्णु मुल्क' हैं। अफवाहों पर ध्यान न दें। मानना तो मेरा भी यही है कि असहिष्णुता जैसा यहां कुछ भी नहीं। मगर बयानवीरों का क्या कीजिएगा, वो तो पिद्दी भरी बात पर ही ऐसा करारा बयान दे डालते हैं कि भीतर तलक सुलग जाती है। बात-बात में तो पाकिस्तान चले जाने की धमकी दे डालते हैं। अब आप ही बताओ कि डर लगेगा कि नहीं? आखिर असहमति-आलोचना का भी तो 'सम्मान' होना चाहिए न। इस बात पर तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक अपनी मोहर लगा चुके हैं। किंतु दिलजलों कौन समझाए?

रही बात आमिर खान की तो उन्हें अपनी पत्नी की बात अपने तक ही सीमित रखनी चाहिए थी। काहे भरी सभा में यह सब उगल दिया। अगर ये सब उन्होंने असहिष्णुता पर फिरकी लेने या फिर अपनी आने वाली फिल्म 'दंगल' में मंगल करवाने के लिए कहा तो बात अलग है। मगर समाज का सेंटिमेंट भी तो उन्हें समझना चाहिए न। पहले माहौल कुछ और था, अब कुछ और है।

असहिष्णुता पर छड़ा दंगल चाहे कोई-कैसा भी एंगल ले ले पर हमें इस बात पर 'संतोष' करना चाहिए कि देश-समाज में 'सहिष्णु' लोग भी रहते हैं।

1 टिप्पणी:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 28 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!