मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जाने वाले साल को सलाम

...और कुछ घंटों बाद ये साल भी अलविदा कह लेगा। साल के साथ बिताए दिनों-लम्हों की यादें ही हमारे कने रह जाएंगी। खट्टी-मीठी बातें ही यादगार बनी रहेंगी। बिना किसी से शिकवा-शिकायत किए-रखे मेरे लिए तो ये साल 'मस्त' रहा।

मैंने तो साल भर दबाकर लिखा। लिखकर खूब कमाई की। पढ़ा भी खूब। हां, बुद्धिजीवियों की मंडली से दूर ही रहा। न किसी बुद्धिजीवि से मिलने गया, न किसी को घर बुलाया। जिंदगी को जित्ता 'आराम' से जिया और लेखन को जित्ता 'चैन' से किया जाए, उसी में मजा है। वरना खाली-पाली 'ठलुअई' करने में क्या जाता है।

देश के राजनीतिक माहौल ने 'मनोरंजन' को दोगुना कर दिया। कभी चुनावी मनोरंजन तो कभी नेताओं की आपसी तू-तू, मैं-मैं। कभी जुमलों की फेंका-फांकी तो कभी बयानों की फुलझड़ियां। देश के नेताओं ने पूरे साल इस बात का खास ख्याल रखा कि जनता के मनोरंजन में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। चाहे जन-हित में आ जाए।

साथ-साथ सहिष्णुता-असहिष्णुता पर बहस-विवाद भी 'धांसू' चली। गौरतलब ये रहा कि असहिष्णुता के डंक ने सबसे अधिक तथाकथित बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों, फिल्मी कलाकरों को ही 'परेशान' किया। हवाबाजी में कित्तों ने ही अपने सम्मान-पुरस्कार लौटा दिए। लेकिन आम आदमी को ये सब कहीं महसूस नहीं हुआ। उसे तो केवल अपनी रोजी-रोटी से ही मतलब रहा। सही भी है, बंदा जब महानता के ग्राफ से आगे बढ़ जाता है, तब उसके नखरे भी आला-दर्जे के हो जाते हैं। अपना तो मनोरंजन यहां भी जबरदस्त हुआ।

दिल्ली की हवा प्रदूषण ने खराब कर रखी है। इसीलिए केजरीवालजी ऑड-इवन का फार्मूला लेके आए हैं। ऑड-इवन के फार्मूले पर सहमतियां कम, आलोचनाएं अधिक हो रही हैं। जिनके कने एक ही कार है, वे बेचारे दफ्तर आने-जाने की परेशानियों से कैसे जूझेंगे ये सोच-सोचकर ही दुबले हुए जा रहे हैं। उधर कार कंपनियां ये उम्मीद बांधे बैठी हैं कि शायद हमारी सेल में और बृद्धि हो जाए। ऑड-इवन की आड़ में सब अपनी-अपनी जुगाड़ तलाश रहे हैं। ये मनोरंजन भी कम दिलचस्प न है प्यारे।

महंगाई की तल्खी भी पूरे साल छाए रही। न वो, न ये इत्ते वायदों के बाद भी महंगाई पर लगाम न कस सके। विपक्ष और जनता ने महंगाई पर कुछ दिन हंगामा काटा फिर सब शांत होकर बैठ गए। सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर मनोरंजन किया सो अलग।

अच्छा, मोदी विरोधियों ने भी साल भर जमकर अपना मनोरंजन करवाया। बेचारे हर वक्त इस जुगाड़ में लग रहे कि कब मोदीजी कुछ कहें और वे लपकर हाय-हाय करने में जुट जाएं। मोदीजी भी क्या खूब निकले, उन्होंने अचानक से पाकिस्तान पहुंचकर न केवल नवाज शरीफ बल्कि विरोधियों को भी चारों-खाने चित्त कर दिया। विरोधी अब घणी मुसीबत में हैं कि कहें तो क्या कहें। यह गुजरते साल का सबसे 'मनोरंजक सीन' रहा। क्यों प्यारे।

खैर, साल भर जो-जैसा घटा कुछ मीठा, कुछ कड़वा रहा। मगर मनोरंजन कायम रहा। मनोरंजन ही जिंदगी है। बाकी में क्या रखा है।

अब तो बस जाते हुए साल को 'सलाम' कहने का दिल है। और आने वाले साल का स्वागत।

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