सोमवार, 28 दिसंबर 2015

जो लिखा सर्वश्रेष्ठ लिखा

चंद रोज पहले एक परम-मित्र ने मुझसे पूछा- 'यार, साल 2015 का अपना लिखा कोई 'सर्वश्रेष्ठ' व्यंग्य बताओ? मैंने कहा- 'इत्ते लिखे व्यंग्यों में किसी एक को 'सर्वश्रेष्ठ' बताना मेरे तईं बहुत कठिन है। मेरे लिए मेरा लिखा सबकुछ सर्वश्रेष्ठ ही है। सर्वश्रेष्ठ से नीचे मैं कुछ लिखता ही नहीं।'

मेरी सुनकर मित्र थोड़ा सकुचाया-मुस्कुराया। फिर बोला- 'तूने तो अपने संपूर्ण लेखन को ही सर्वश्रेष्ठ करार दे दिया। यानी, अपना आकलन एवं मूल्याकंन खुद ही। गजब।' मैंने उसे समझाया- 'प्यारे, मैं अपने लेखन का आकलन या मूल्याकंन दूसरों से करवाने में यकीन नहीं रखता। 'बाल की खाल' न दूसरों की निकालता हूं, न खुद की निकालने देता हूं। सर्वश्रेष्ठ हूं। सर्वश्रेष्ठ से कमतर कुछ लिखता नहीं।'

अबकी दफा मित्र अपने माथे पर थोड़ा बल रखकर बोला- 'वाह! खुद को महान कहने का बड़ा शौक है तुझे। ऐसा तो कभी न परसाई, न जोशी, न प्रेमचंद, न रेणु ने अपने बारे में नहीं कहा। लोगों ने ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ और उनके लेखन को 'महान' बनाया।' मैंने उसकी गलती को सुधारते हुए कहा- 'पहली बात इत्ते बड़े-बड़े लेखकों से मेरी तुलना ही गलत है। उन्होंने अपना लिखकर महानता हासिल की, मैं अपना लिखकर कर रहा हूं। भले ही उन्होंने अपने लेखन को सर्वश्रेष्ठ न कहा हो पर मैं अपने बारे में कह रहा हूं। खुद के बारे में कुछ भी राय रखना, ये मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है मियां।'

मित्र लगभग खीझते हुए बोला- 'अगर ऐसा ही है तो तेरे लेखन में सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ है ही नहीं, जिसकी तू इत्ती तारीफ कर रहा है। तू एकदम 'कूड़ा' लिखता है। तेरे लेखन में न धीरता है, न गंभीरता, न ही सुंदरता।'

सच बोलूं तो मेरे लेखन पर खीझने वाले लोग मुझे बेहद पसंद हैं। इसीलिए मैं मेरे परम-मित्र की जली-कटी पर रत्तीभर नाराज न हुआ। इत्मिनान से जवाब दिया। 'प्यारे, तेरा तहे-दिल से शुक्रिया कि तुझे मेरा लिखा कूड़ा लगा। अब गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैं 'सर्वश्रेष्ठ कूड़ा' लिखता हूं! शायद यही वजह है कि मेरी अब तलक न कोई किताब है, न अंटी में कोई पुरस्कार। किताब और पुरस्कार के लिए जुगाड़ वे बैठाते हैं, जिन्हें अपने तईं किसी छोटे-बड़े सम्मान को हासिल करना होता है। मेरे लिए तो मेरा लिखा ही सबकुछ है। तेरे साथ-साथ पाठकों का धन्यवाद कि वे मुझे पढ़ते हैं। उनकी आलोचना और प्रशंसा दोनों के प्रति नतमस्तक हूं।'

लगे हाथ मैंने उसे ये भी बता दिया कि 'व्यंग्य में अगर गंभीरता और धीरता को घुसेड़ दूंगा फिर व्यंग्य किस काम का रह जाएगा? व्यंग्य का मतलब ही है, मीठी छुरी से मीठा वार करना ताकि सामने वाले की सुलगे तो मगर मीठास के साथ। इसी में व्यंग्य-लेखन का मजा है।'

लगा कि मेरे प्रवचनों सुनकर मित्र काफी पक गया है सो उसके मूड को थोड़ा 'लाइट' किया- 'चार बोतल वोदका, काम मेरा रोज का...' गाना दिखाकर। कुछ देर बाद मित्र मूड में आ गया और बोला- 'ये गाना भी तेरे लेखन जित्ता ही सर्वश्रेष्ठ है!' तुरंत सवाल दागा- 'यार, तू फिल्मों में गाने क्यों नहीं लिखता? बड़ा स्कोप है। कहें तो बात करवाऊं, मेरी जुगाड़ है वहां।'

मैंने कहा- 'नहीं प्यारे मैं मेरे व्यंग्य-लेखन से ही संतुष्ट हूं। चादर से बाहर पैर पसारने की आदत नहीं मुझे। तुझ जैसे सुधि पाठक मुझे पढ़कर राय दे देते हैं, मेरे तईं बहुत है। शिकायत किसी से रखता नहीं हूं। मस्ती के साथ जिंदगी और लेखन को जीता हूं। तेरे प्रपोजल का शुक्रिया।'

मित्र ने 'मेरी बात का बुरा न मानना यार...' कहते हुए मुझे 2016 की शुभकामनाएं देते हुए विदा ली। मैं भी उसे शुभकामनाएं देने के बाद अपने सर्वश्रेष्ठ लेखन में जुट गया।

2 टिप्‍पणियां:

मधु अरोड़ा ने कहा…

बिल्‍कुल सही आपकी सोच.... कूड़े को ही फटकना होता है, तब कहीं जाकर कुछ अच्‍छा मसाला मिलता है... बधाई....

Kavita Rawat ने कहा…

सलाहकार बहुतेरे मिल जाते हैं ....लेकिन जो सबकी सुने पर अपनी मन की करे, उसे ही सब याद करते हैं कई मौको पर ...उसे ही सराहते है .. देर सवेर