शनिवार, 26 दिसंबर 2015

किस्मत हो तो सल्लू मियां जैसी

मां कसम खून खौल जाता है अगर मुझे कोई लेखक कहकर पुकार ले। मन करता है कहने वाले के मुंह में लाल मिर्ची भर दूं। और प्रोमिस लूं कि अब कभी मुझे वो लेखक कहकर नहीं बुलाएगा। चाहे गुंडा, मवाली, चोर, उचक्का कुछ कह ले मगर लेखक न कहे।

अब तो लेखक शब्द से ही मुझे एलर्जी-सी होने लगी है। दो-चार व्यंग्य-श्यंग्य क्या लिख दिए, यहां वहां क्या छप-छपा गए कि लेखक होने का ठप्पा लग गया। लेखक होकर कमाया क्या, यह कोई नहीं पूछता। न न इज्जत और नाम की बात न कीजिएगा। अमां, इज्जत और नाम तो बदनाम लोग खूब कमा लेते हैं। नाम के साथ-साथ 'धाक' जमाते हैं सो अलग। शहर और मोहल्ले में 'सिक्का' चलता है उनका। लोग भाई-भाई कहकर इज्जत के साथ बुलाते हैं।

और एक मैं हूं न ढंग से मोहल्ले वाले जाते हैं न शहर-परिवार वाले। कभी-कभी तो पत्नी तक फुक्का-लेखक कहकर मजाक उड़ा डालती है। ताना मारकर कहती है- 'तुम अपने लेखन के दम पर एक ढंग का फोन तक तो मुझे दिलवा न पाए। क्या खाक बड़े लेखक हो! अरे, तुमसे भले तो नेता-अभिनेता लोग हैं। देखा है कभी उनकी पत्नियों को कित्ते ऐश से रहती हैं। बात मुंह से निकलने की देरी होती है और चीज हाजिर। एक तुम हो, सुबह से लेकर रात तक पन्ने काले-नीले करते रहते हो और बदले में मिलता क्या है ठेंगा।'

हालांकि पत्नी के ताने चूभते बहुत विकट हैं पर कभी-कभी उसकी कही बात ठीक लगती है। यह बात सही है, लेखक आप चाहे कित्ते भी बड़े या वरिष्ठ क्यों न हो लो पर कमाई उत्ती नहीं हो पाती। अपवाद को जाने दें पर सच यही है। लेखक का स्टेटस लेखक से ऊपर कभी नहीं उठ पाता। भले ही अपनी पीठ खुद चाहे वो कित्ती ही थपथपा ले।

जब से सल्लू मियां के बरी होने की खबर पत्नी को लगी है, उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं। बता दूं- मेरी पत्नी सल्लू मियां की बहुत बड़ी फैन है। हमारे बेडरूम में मेरी जगह सल्लू मियां की फोटू टांगकर रखती है। उस दिन मुझे हड़काते हुए कह रही थी- 'देखा तुमने सल्लू मियां बच गए। बचते क्यों नहीं, आखिर रूतबे का कुछ तो असर होना था न। इसे कहते हैं, सिक्का जमाके चलाना। सबके सब देखते रह गए और सल्लू मियां बेदाग निकल आए।'

जरूरी समझते हुए पत्नी को बीच में टोकते हुए मैंने कहा- 'लेकिन ये हुआ गलत। न्याय सबके साथ समान होना चाहिए। भेदभाव नहीं।' पत्नी ने आंखे तरेरी और बोली- 'क्या न्याय-फ्याय की रट लगाए हुए हो। जमाना बहुत बदल गया है। अब सबकुछ 'पैसा' है। जिसके कने पैसा खरच करने की कुव्वत है, यहां बस वही टिका रह सकता है। पैसे में बहुत ताकत होती है। ज्यादा दूर क्यों जाते हो, अपने को ही देख लो न, लेखक बनकर नाम भले ही कमाया हो पर पैसा तो नहीं कमाया न। दुनिया 'आदर्शवाद' से नहीं, सिर्फ पैसे और पैसे से ही चलती है। बात कड़वी है मगर है खरी।'

प्रैक्टिकली पत्नी कड़वा मगर सही कह रही थी। सारा खेल है पैसे का ही। इधर सल्लू मियां के बरी होने पर मिठाइयां बांटी जा रही थीं। उनके प्रशंसक ढोल-ताशे बजा रहे थे। उधर पीड़ित परिवारों के दिलों पर क्या गजरी, कोई पूछने वाला नहीं। यही तो फर्क है अमीरी-गरीबी के बीच चलने वाले न्याय का।

इसीलिए तो कभी-कभी लगता है कि बेकार ही लेखक हो गया। इससे अच्छा तो नेता या अभिनेता होता। कम से कम नाम-पैसा-रूतबा सब जेब में तो होता। पत्नी भी खुश रहती। जिंदगी एकदम ताने और तनाव से मुक्त टनाटन चल रही होती। मगर सबकी 'किस्मत' सल्लू मियां जैसी थोड़े न होती है प्यारे। है कि नहीं...।

1 टिप्पणी:

अजय कुमार झा ने कहा…

हायो रब्बा ....तो आप भी मियाँ सलमान खान के सताए निकले ..बहुत बढ़िया जय हो